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Who is Madan Mitra: 'भगवान राम मुसलमान' ये बोलने वाले TMC नेता मदन मित्रा कौन? बयान ने बढ़ाई ममता की टेंशन

TMC Leader Madan Mitra Controversy: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर धार्मिक बयानबाज़ी को लेकर गरमा गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले मदन मित्रा के एक बयान ने व्यापक विवाद खड़ा कर दिया है।

मदन मित्रा पर आरोप है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से भगवान राम को "मुसलमान" बताया और यह सवाल भी उठाया कि "भगवान राम का सरनेम क्या है?" उनके इस बयान को हिंदू संगठनों और विपक्षी दलों ने आस्था का अपमान बताया है।

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मदन मित्रा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब राज्य में पहले से ही धार्मिक और भाषाई मुद्दों पर सियासत तेज़ है। सोशल मीडिया पर उनके बयान के वीडियो और क्लिप तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिसके बाद राज्य की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। आइए जानते हैं कौन है टीएमसी नेता मदन मित्रा...

Who is Madan Mitra: कौन हैं मदन मित्रा?

दक्षिण कोलकाता से आने वाले मदन मित्रा का जन्म एक जमींदार और कारोबारी परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1970 के दशक में की। शुरुआती दौर में वह पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियरंजन दासमुंशी के असिस्टेंट रहे। लंबे समय तक दासमुंशी के साथ काम करने के दौरान मदन मित्रा ने दक्षिण कोलकाता में अपनी पहचान बनाई और छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई।

करियर के शुरुआती वर्षों में वह कांग्रेस के छात्र संगठन से जुड़े और संगठनात्मक राजनीति में कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं। हालांकि समय के साथ कांग्रेस के भीतर उनकी स्थिति कमजोर होती गई और वह पार्टी के भीतर विरोधी खेमे में गिने जाने लगे।

कांग्रेस से TMC तक, 'मदनदा' की पहचान

1990 के दशक में मदन मित्रा दक्षिण कोलकाता में कांग्रेस के एक प्रभावशाली चेहरे बन चुके थे और वाम मोर्चा को कड़ी चुनौती दे रहे थे। इसी दौर में उन्होंने टैक्सी ड्राइवर यूनियन की शुरुआत की और कोलकाता के मशहूर SSKM सरकारी अस्पताल में यूनियन पर पकड़ मजबूत की। जनता के बीच वह धीरे-धीरे "मदनदा" के नाम से मशहूर हो गए। साल 1998 में उन्होंने ममता बनर्जी की नवगठित तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया, जो उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

विवादों से गहरा नाता

मदन मित्रा का राजनीतिक करियर विवादों से अछूता नहीं रहा।

  • 2024 में कोलकाता लॉ कॉलेज गैंगरेप केस पर दिया गया बयान, जिसमें उन्होंने पीड़िता को लेकर सवाल उठाए, पार्टी के लिए भारी असहजता का कारण बना।
  • 2012 के पार्क स्ट्रीट रेप केस में भी उनके बयान को पीड़िता को दोषी ठहराने वाला माना गया, जिसकी कड़ी आलोचना हुई।
  • 2025 की शुरुआत में उन्होंने खुद अपनी पार्टी पर पैसों के लेन-देन और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, बाद में उन्हें इस बयान के लिए माफी मांगनी पड़ी।

मदन मित्रा का नाम शारदा चिट फंड घोटाले में भी प्रमुख रूप से सामने आया। दिसंबर 2014 में उन्हें CBI ने गिरफ्तार किया था। करीब 22 महीने जेल में रहने के बाद सितंबर 2016 में उन्हें जमानत मिली।

ममता बनर्जी की चुप्पी पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब तक इन बयानों पर चुप क्यों हैं। विपक्ष का आरोप है कि न तो मदन मित्रा के बयान की निंदा की गई है और न ही उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई की गई है। BJP नेताओं का कहना है कि यदि यही बयान किसी अन्य दल के नेता ने दिया होता, तो TMC सड़क से लेकर विधानसभा तक विरोध करती।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस को आगामी चुनावों में अपने पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगने का डर है, और इसी वजह से पार्टी के कुछ नेता लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं, जो एक खास समुदाय को संदेश देने के तौर पर देखे जा रहे हैं।

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