जस्टिस UU Lalit कौन हैं ? देश के अगले CJI बन सकते हैं, तीन तलाक समेत उनके ऐतिहासिक फैसले जानिए

नई दिल्ली, 4 अगस्त: भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमना ने देश के अगले सीजेआई के लिए सरकार को सुप्रीम कोर्ट वरिष्ठतम जज जस्टिस यूयू ललित के नाम की सिफारिश की है। जस्टिस ललित का भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर कार्यकाल काफी छोटा रहने वाला है। आइए जानते हैं कि वह कैसे सुप्रीम कोर्ट के जज बने, उनकी बेंच ने क्या-क्या अहम फैसले सुनाए। उनके रिटायरमेंट के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन जज हो सकता है। सीजेआई के सचिवालय को बुधवार रात साढ़े 9 बजे ही कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू की ओर से जस्टिस रमना से अपने उत्तराधिकारी के नाम की सिफारिश करने का अनुरोध प्राप्त हुआ था।

जस्टिस यूयू ललित हो सकते हैं देश के 49वें सीजेआई

जस्टिस यूयू ललित हो सकते हैं देश के 49वें सीजेआई

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज जस्टिस यूयू ललित देश के अगल चीफ जस्टिस बनने की ओर अग्रसर हैं। उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश सीजेआई जस्टिस एनवी रमना ने की है, जो इसी महीने रिटायर हो रहे हैं। जस्टिस यूयू ललिल सुप्रीम कोर्ट के कुछ उन ऐतिहासिक फैसलों के हिस्सा रहे हैं, जिनमें से मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक की कुप्रथा को अवैध और असंवैधानिक ठहराने का निर्णय शामिल है। जस्टिस यूयू ललित की नियुक्ति भारत के अगले चीफ जस्टिस के तौर पर होने के बाद वह ऐसे दूसरे व्यक्ति होंगे, जो सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं और देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए हैं। इससे पहले 1971 में देश के 13वें सीजेआई बनने वाले जस्टिस एसएम सीकरी ऐसे पहले व्यक्ति थे, जो सीधे वकील से मार्च 1964 में सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त किए गए थे। सीजेआई जस्टिस एनवी रमना 26 अगस्त को रिटायर हो रहे हैं और नियुक्त होने पर जस्टिस ललित 27 अगस्त को नए सीजेआई के रूप में शपथ ले सकते हैं।

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    जस्टिस यूयू ललित कौन हैं ?

    जस्टिस यूयू ललित कौन हैं ?

    9 नवंबर, 1957 को जन्मे जस्टिस यूयू ललित का वकील के तौर पर जून, 1983 में पंजीकरण हुआ था। उन्होंने दिसंबर 1985 तक बॉम्बे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस की। जनवरी, 1986 में वे वकालत के लिए दिल्ली शिफ्ट हो गए और अप्रैल, 2004 में वे सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील के तौर पर नामित हुए। बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन केस में ट्रायल के लिए उन्हें सीबीआई का स्पेशल पब्लिक प्रोसेक्यूटर नियुक्त किया गया। सीजेआई के तौर पर जस्टिस ललित का कार्यकाल दो महीने से थोड़े ही ज्यादा का रहेगा। क्योंकि, 8 नवंबर, 2022 को वह रिटायर होने वाले हैं। जस्टिस ललित के बाद सबसे वरिष्ठ जज में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का नाम है। सीजेआई के तौर पर उनका कार्यकाल बहुत ही लंबा यानी दो साल का हो सकता है।

    तीन तलाक पर फैसला सुनाने वाली बेंच का हिस्सा रहे

    तीन तलाक पर फैसला सुनाने वाली बेंच का हिस्सा रहे

    जस्टिस यूयू ललित जज बनने से पहले प्रसिद्ध सीनियर वकील थे। सुप्रीम कोर्टके जज के पद पर उनकी नियुक्ति 13 अगस्त, 2014 को की गई थी। उसके बाद आए सुप्रीम कोर्ट के तमाम ऐतिहासिक फैसलों का वह भी हिस्सा रहे हैं। उनके ऐतिहासिक फैसलों में अगस्त, 2017 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ के 3-2 के बहुमत से आए मुसलमानों में तत्काल 'तीन तलाक' वाली कुप्रथा को 'शून्य', 'अवैध' और 'असंवैधानिक' घोषित करने वाला फैसला भी शामिल है। पांच जजों वाली उस संविधान पीठ के तत्कालीन सीजेआई जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर फैसले को 6 महीने रोकने के पक्ष में थे और सरकार को इस संबंध में कानून बनाने के लिए कहना चाहते थे, लेकिन जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस यूयू ललित ने उस कुप्रथा को संविधान का उल्लंघन करने वाला करार दिया था।

    श्री पद्मनास्वामी मंदिर पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला

    श्री पद्मनास्वामी मंदिर पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला

    एक और ऐतिहासिक फैसले में जस्टिस ललित की अगुवाई वाली बेंच ने केरल के ऐतिहासिक श्री पद्मनास्वामी मंदिर के प्रबंधन का अधिकार त्रावणकोर के राजसी परिवार के पक्ष में दिया था। अदालत ने फैसला दिया था कि मंदिर के शेबैत का अधिकार वंशक्रम से जुड़ा होना चाहिए। श्री पद्मनास्वामी मंदिर देश के सबसे धनाढ्य मंदिरों में शामिल है। इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के 2011 के फैसले को पलट दिया था, जिसने राज्य सरकार को ट्र्स्ट बनाकर मंदिर का कंट्रोल उसके हाथों में देने का फैसला सुनाया था।

    स्किन-टू-स्किन टच मामले पर अहम निर्णय

    स्किन-टू-स्किन टच मामले पर अहम निर्णय

    इसके अलावा एक पॉक्सो केस में स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट मामले में भी जस्टिस ललित की अगुवाई वाली बेंच का फैसला देश के सामने एक नजीर है। इसमें अदालत ने फैसला दिया था कि 'यौन इरादे' से किसी बच्चे का शरीर छूना या किसी तरह का शारीरिक संपर्क करना प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (पॉक्सो) ऐक्ट की धारा 7 के तहत 'यौन हमला' है और स्किन-टू-स्किन टच होना ही आवश्यक नहीं है। इस फैसले के साथ ही सर्वोच्च अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के स्किन-टू-स्किन टच वाले विवादित फैसले को पलट दिया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अगर आरोपी और पीड़ित के बीच सीधा स्किन-टू-स्किन टच नहीं हुआ है तो यह पॉक्सो कानून के तहत यौन हमला नहीं माना जाएगा।

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