बीजेपी के खिलाफ मजबूत विकल्प नहीं दे पाने के लिए जिम्मेदार कौन?
नई दिल्ली- पिछले साल कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद जब जेडीएस-कांग्रेस सरकार के शपथग्रहण समारोह में तमाम मोदी विरोधी दल के नेता एकजुट हुए, तो लगा कि 2019 में बीजेपी को रोकने का सियासी इंतजाम हो गया है। लेकिन, लोकसभा चुनावों की तारीखों के ऐलान के बाद जो सीन दिख रहा है, उससे लगता नहीं कि मोदी या बीजेपी विरोधी खेमा विपक्षी एकता को लेकर ज्यादा संजीदा है। क्योंकि, बीजेपी के खिलाफ एक महागठबंधन की चर्चा चाहे जितनी बार भी की गई हो, लेकिन हकीकत यही है कि धरातल पर अधिकतर राज्यों में त्रिकोणीय मुकाबले की ही संभावना नजर आ रही है। कई सर्वे और विपक्ष के कुछ कद्दावर नेताओं के कबूलनामे में इसका अंजाम भी नजर आ रहा है।

मुलायम और पवार का संकेत
देश की मौजूदा राजनीति में मुलायम सिंह यादव और शरद पवार सबसे पुराने और धुरंधर राजनेता हैं। अगर, यह कुछ सोच-समझकर बोलते हैं, तो उसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने सालों तक चुनावी राजनीति से कन्नी काटने के बाद इस बार फिर से चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। लेकिन, तारीखों का ऐलान होते ही वे अपनी घोषणा से पीछे हट गए और ये कह दिया कि "संसदीय चुनाव के बाद बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है और उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगियों को साथ लेना पड़ सकता है।" ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, 16वीं लोकसभा के आखिरी सत्र में समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने सदन में नरेंद्र मोदी की ओर देखकर कहा था कि 'हम सरकार नहीं बना पाएंगे, इसलिए, मैं चाहता हूं कि आप दोबारा प्रधानमंत्री बनें। आप सबको साथ लेकर चले हैं।' क्या पवार और मुलायम को ये नहीं पता होगा कि वो जो कह रहे हैं, उसका मतलब क्या है? निश्चित रूप से उन्हें पता है और उन्होंने जो कुछ भी कहा है, वह मौजदा परिस्थितियों और अपने अनुभव के आकलन के आधार पर ही कहा होगा।

ओपनियन पोल के नतीजे
दिग्गज विपक्षी नेताओं की राय की पुष्टि चुनाव तारीखों की घोषणा के बाद हुए 3 सबसे ताजा चुनावी ओपिनियन पोल भी कर रहे हैं। इन सब में कमोबेश एनडीए यानी बीजेपी गठबंधन को विपक्षी दलों से काफी आगे दिखाया गया है। मसलन इंडिया टीवी-सीएनएक्स ओपिनियन पोल के मुताबिक लोकसभा की 543 सीटों में से भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए(NDA) को 285 सीटों पर जीत मिल सकती है, जबकि कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए (UPA) को 126 और बाकियों को 132 सीटें मिलने का अनुमान है। जबकि, सी-वोटर के सर्वे में में एनडीए(NDA) को 264, यूपीए (UPA) को 141 और बाकियों को 138 सीटें दी जा रही हैं। एक तीसरा सर्वे न्यूज नेशन का भी है, जिसमें एनडीए को 270, यूपीए को 134 और बाकियों को 139 सीटें दी जा रही हैं। यानी ये सारे पोल मुलायम और शरद पवार की भावनाएं ही व्यक्त करती हैं।

विपक्ष की बंटी हुई लड़ाई
एनसपी के दिग्गज शरद पवार ने खुद को चुनावी लड़ाई से भले ही पीछे कर लिया हो, लेकिन महागठबंधन की एक छतरी के नीचे ज्यादा से ज्यादा दलों को जुटाने की उम्मीद नहीं छोड़ी है। दरअसल, पवार की चिंता ये है कि महाराष्ट्र में भी एनडीए के खिलाफ सीधा मुकाबला मुश्किल हो चुका है। वहां डॉक्टर अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर ने एआईएमआईएम के अलावा कुछ और छोटे दलों को मिलाकर वंचित बहुजन अघाड़ी का गठन कर एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन और बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के खिलाफ सभी 48 सीटों पर लड़ने का ऐलान कर दिया है। त्रिकोणीय मुकाबले की यही स्थिति सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से लेकर, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड, राजस्थान,केरल और दिल्ली जैसे राज्यों में भी देखने को मिल रही है।

कांग्रेस का एजेंडा
कांग्रेस अभी तक इस प्रभाव से उबर नहीं पाई है कि वो कभी देश की इकलौती सबसे बड़ी पार्टी हुआ करती थी। आज की तारीख में बीजेपी ने अपनी उपस्थिति पूरे भारत में दर्ज करा ली है। कांग्रेस के नीति निर्धारकों को लगता है, अगर हर राज्य में छोटे दलों से समझौता करके उनके लिए मैदान छोड़नी पड़ गई, तो उतना आंकड़ा जुटा पाना मुश्किल होगा, जो गांधी-नेहरू परिवार के वारिश राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी दिला सके। इसलिए, जिन राज्यों में वो दूसरी विपक्षी पार्टियों से मजबूत स्थिति में है, वहां तालमेल से कन्नी काट रही है।

तृणमूल कांग्रेस का एजेंडा
टीएमसी नेता ममता बनर्जी अपना माइंडगेम चल रही हैं। उन्हें लगता है कि वो पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में ज्यादातर अपने दम पर जीतने का माद्दा रखती हैं। पिछली बार अगर उनके पास 34 सांसद थे और अबकी बार उतना भी आ गया, तो त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में वो प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार बन सकती हैं। इसलिए, वो कांग्रेस के साथ तालमेल की भी कभी इच्छुक नहीं रहीं।

बहुजन समाज पार्टी का एजेंडा
बीएसपी सुप्रीमो मायावती को भले ही दो चुनावों में धूल फांकनी पड़ी हो, लेकिन हकीकत ये है कि उनका वोट बैंक उनके साथ मजबूती से जुड़ा रहा है। पिछले दोनों चुनावों में राजनीतिक समीकरण ऐसे बने कि उनका वोट बैंक उन्हें सीटें दिलाने में नाकाम रहा। अबकी बार उनकी पार्टी बीएसपी यूपी की सिर्फ 38 सीटों पर चुनाव लड़ रही है,लेकिन उसका तालमेल समाजवादी पार्टी से हुआ है। यानी मौजूदा हालात में मायावती अपना बेस्ट परफॉर्मेंस देने की उम्मीद रख रही होंगी। अगर गैर-बीजेपी सरकार बनने की बारी आई और माया के पास आंकड़े रहे और अखिलेश का साथ रहा, तो वो पीएम पद की सबसे मजबूत दावेदार होंगी, इस बात में कहीं कोई शक की गुंजाइश नहीं है। इसलिए, माया ने कांग्रेस से कहीं भी तालमेल नहीं करने का ऐलान कर दिया है।

आम आदमी पार्टी का एजेंडा
आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपना कार्ड खेल रहे हैं। वो दिल्ली में कांग्रेस से समझौता इस शर्त पे चाहते हैं कि उन्हें पंजाब और हरियाणा में भी सीटों की गारंटी मिले। क्योंकि, पंजाब में उन्हें बीजेपी और कांग्रेस से ज्यादा अपने संगठन से ही लड़ना पड़ रहा है। हरियाणा में भी उनकी पार्टी की दावेदारी की पोल खुल चुकी है। जबकि, कांग्रेस को लगता है कि दिल्ली में केजरीवाल के कमजोर होने का मतलब उसकी बढ़त होगी। पंजाब और हरियाणा में वो वैसे ही आम आदमी पार्टी से काफी ज्यादा मजबूत स्थिति में है। नतीजा गठबंधन के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं।

लेफ्ट फ्रंट का एजेंडा
इस पूरी सियासी चौकड़ी में वामपंथी दलों की ज्यादा हैसियत ही नहीं बच गई है। एक के बाद एक चुनाव में उनका ग्राफ सिमटता जा रहा है, इसलिए विपक्ष के नाम पर राजनीतिक दल उन्हें साथ तो रखते हैं, लेकिन ज्यादा तबज्जो नहीं देते। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में तो वो कांग्रेस से तालमेल चाहते हैं, लेकिन केरल में एक-दूसरे के सियासी दुश्मन बने बैठे हैं। बड़ी बात ये है कि साधारण से साधरण मतदाता भी आज इन बातों को समझने लगे हैं। सोशल मीडिया ने उन्हें बहुत बड़ा साधन उपलब्ध कराया है।
जबकि, बीजेपी और एनडीए की स्थिति इससे बहुत अलग है। उसने अपने साथियों को काफी हद तक फिर से एकजुट कर लिया है। यूपी,महाराष्ट्र,झारखंड और असम में उसने नाराज सहयोगियों को मनाया भी है और दूर जा चुके दलों को पास भी बुला लिया है।












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