क्या गढ़चिरौली में माओवादियों का समर्थन घट रहा है

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ईंटों से बनी दीवार और टीन की छत. एक कमरे का ये घर आज भले ही खाली हो पर यह कभी जनजातीय समुदाय के एक युवा दंपति का आशियाना हुआ करता था.

26 साल के सुखदेव वड्डे और उम्र में उनसे कुछ साल छोटी नंदा ने कभी इस आशियाने में अपनी बेटी के पैदा होने का जश्न सादगी से मनाया था. आज यह किसी खाली गोदाम की तरह दिखता है.

सुखदेव महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और उनकी पत्नी नंदा छत्तीसगढ़ के बस्तर के कोंटा से थे. दोनों गढ़चिरौली शहर के पास के छोटे से घर में रहा करते थे.

साल 2015 में मेरी उनसे मुलाकात हुई थी. उन्होंने बताया था कि दोनों की शादी परिवारों की मर्ज़ी से साल 2014 में हुई थी. यह एक अंतर कबीलाई शादी थी.

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माहौल बदला

सुखदेव और नंदा कभी सीपीआई माओवादी के लड़ाके हुआ करते थे, जो कभी पुलिस बलों से सशस्त्र लोहा लेते थे. उनका जीवन जंगलों में बीता था.

उन्होंने मुझे बताया था कि इस दौरान दोनों में प्यार हुआ और पहले के जीवन से उनका मोहभंग होने लगा. वो दोनों अपना परिवार बढ़ाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बच्चे को जन्म देने का फ़ैसला किया.

ये दोनों अकेले नहीं हैं. इनकी तरह क़रीब 150 जोड़े जो कभी बंदूकधारी लड़ाके हुआ करते थे, आज साधारण ज़िंदगी जी रहे हैं.

सिर्फ़ परिवार बढ़ाने की चाहत ही नहीं, कई अन्य कारणों से महाराष्ट्र के सुदूर पूर्वी जंगलों का माहौल बदला है. आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच जंगलों में कभी इन माओवादियों का सिक्का चलता था.

क़रीब तीन दशक तक ये राज्य सरकार और पुलिस बलों के लिए चुनौती बने रहे.

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पुलिस का दावा

बीते रविवार और सोमवार को गढ़चिरौली पुलिस के नक्सल विरोधी अभियान में सी-60 कमांडों ने अपने दो दिनों के ऑपरेशन में 37 माओवादियों को मार गिराने का दावा किया है.

मारे गए माओवादियों में उनके दो अधिकारी भी शामिल थे.

पुलिस ने दावा किया कि 'गढ़चिरौली के भामरागड़ के कसनसुर गांव के बोड़िया जंगल में चलाए गए अभियान में कई माओवादियों को मार गिराया गया है, जिनमें से 16 के शव बरामद कर लिए गए हैं.'

यह इलाका महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा पर पड़ता है. सोमवार को पुलिस ने दावा किया कि जिमलागट्टा क्षेत्र में उन्होंने छह माओवादियों को मार गिराया है.

एक दिन बाद मंगलवार को इंद्रावती नदी से अन्य कथित माओवादियों के शव मिलने की बात भी कही गई. जहां से ये शव मिलने का दावा किया गया था, वो उस जगह से काफ़ी नज़दीक था जहां रविवार को ऑपरेशन चलाया गया था.

कुल मिलाकर दो दिनों में पुलिस ने 37 माओवादियों को मार गिराने का दावा किया, जो संख्या के हिसाब से अभी तक सबसे ज़्यादा है.

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आंकड़ों से समझें बदलाव

मारे गए कथित माओवादियो में से कुछ की पुष्टि हो चुकी है जबकि बाकियों की पहचान की जा रही है. भामरागढ़ के सूत्रों के मुताबिक बीते सप्ताह गढ़चिरौली के दक्षिणी इलाके में पुलिस ने अभियान चलाए थे. वहां पेट्रोलिंग भी की गई थी.

पुलिस का यह दावा माओवादियों के इलाके में उनकी सबसे बड़ी सेंध मानी जा रही है. दो दिनों के अंतराल में इतने माओवादी कभी नहीं मारे गए.

ज़िला पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक 2013 से 2017 के बीच कुल 76 माओवादियों को निष्क्रिय किया गया. साल 2013 में सबसे अधिक 27 माओवादी मारे गए थे.

इसी साल ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बल के 25 जवान भी मारे गए थे. आंकड़ों के मुताबिक क़रीब 200 माओवादियों ने इस दौरान आत्मसमर्पण भी किया था.

गिरफ़्तारी के वक्त कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण भी किया था जिसका बखान पुलिस अपनी सफलता के रूप में करती आई है.

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बदलाव के कारण

महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक सतीश माथुर ने सोमवार को इस सफलता को ख़ुफ़िया तंत्रों की सफलता बताया.

ऐसा कहा जा रहा है कि माओवादी अब पुनर्वास की तरफ़ बढ़ रहे हैं. प्रेम संबंध और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के काल में संगठन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वो ये कदम उठा रहे हैं.

बदल रहे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक माहौल के चलते भी सशस्त्र आंदोलन कमज़ोर हो रहा है.

सीपीआई माओवादी की केंद्रीय समिति के सितंबर 2013 के एक दस्तावेज़ में कहा गया है, "पिछले कुछ सालों में लगातार हो रही गिरफ़्तारियों के चलते महाराष्ट्र में आंदोलन कमज़ोर हुए हैं. देशभर में भी आंदोलन कमज़ोर हुए हैं."

पीपल गुरिल्ला लिबरेशन आर्मी की सक्रियता और विस्तार भी घटा है. लोगों की भर्ती में कमी आई है. संगठन छोड़कर जाने वालों की संख्या भी घटी है.

ख़ुफ़िया सूचनाओं के चलते भी सशस्त्र संघर्ष घटा है और स्थानीय लोगों की माओवादियों के प्रति ख़िलाफ़त के चलते संगठन की ताक़त कम हो रही है.

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क्या है सी-60?

गुरिल्ला रणनीति का मुकाबला करने के लिए महाराष्ट्र पुलिस ने एक विशेष दल की स्थापना की, जिसमें स्थानीय जनजाति को शामिल किया.

1992 में बने इस विशेष दल में 60 स्थानीय जनजाति समूह के लोगों को शामिल किया गया. धीरे-धीरे दल की ताकत बढ़ती गई और नक्सलियों के ख़िलाफ़ इनके ऑपरेशन भी बढ़ने लगे.

दल में शामिल जनजाति समूह के लोगों को स्थानीय जानकारी, भाषा और संस्कृति की जानकारी के चलते ये गुरिल्ला लड़ाकों से लोहा लेने में सफल रहे.

2014, 2015 और 2016 में में सी-60 के कमांडों को कई ऑपरेशन में सफलता प्राप्त हुई.

जब सुखदेव और नंदा की शादी हो रही थी, तब उनके साथ कभी लड़ने वाले कई लड़ाके उनकी खुशी में शामिल हुए थे. एक लड़ाके से पारिवारिक ज़िंदगी की उनकी शुरुआत भले ही छोटी लगती हो पर ये सरकारों की रणनीति सफलता के रूप में देखी जा रही है.

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