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जब पुर्तगालियों ने हिंदुस्तान का इतिहास बदल कर रख दिया

By Bbc Hindi

आठ जुलाई 1497, शनिवार का दिन, वो दिन जिसे पुर्तगाल के शाही ज्योतिषयों ने बड़ी सावधानी से चुना था.

राजधानी लिस्बन की गलियों में जश्न का सा माहौल है. लोग जुलूशों की शकल में समंदर किनारे का रुख कर रहे हैं जहां चार नए नकोर जहाज़ एक लंबा सफ़र शुरू करने के लिए तैयार खड़े हैं.

शहर के तमाम शीर्ष पादरी भी चमकीले लिबास पहलने आशीर्वाद देने पहुंच गए हैं और समूह गान कर रहे हैं भीड़ उनकी आवाज़ से आवाज़ मिला रही है.

बादशाह रोम मैनवल इस मुहिम में व्यक्तिगत दिलचस्पी ले रहे हैं. वास्को डी गामा के नेतृत्व में चारों जहाज़ लंबे समुद्री सफ़र के लिए ज़रूरी नए उपकरणों व ज़मीनी और आसमानी नक़्शों से लैस हैं. साथ ही साथ उन पर उस दौर के आधुनिक तोपें भी तैनात हैं.

जहाज़ के 170 के क़रीब नाविकों ने बिना आस्तीन वाली क़मीज़ें पहन रखी हैं. उनके हाथों में जलती हुईं मोमबत्तियां हैं और वो एक फ़ौजी दस्ते की तरह जहाज़ों की तरफ़ धीमे-धीमे मार्च कर रहे हैं.

ये लोग उस मंज़र की एक झलक देखने और मल्लाहों को विदा करने पहुंचे हैं. उन की आंखों में ग़म और ख़ुशी के मिले जुले आंसू हैं. वो जानते हैं कि सालों लंबे इस सफर पर जाने वालों में से बहुत से, या शायद सभी, वापस नहीं आ सकेंगे.

उससे बढ़कर उन्हें ये भी अहसास है कि अगर सफ़र कामयाब रहा तो यूरोप की एक खुरदुरेपन में बसा एक छोटा सा देश पुर्तगाल दुनिया के इतिहास का एक नया पन्ना उलटने में कामयाब हो जाएगा.

इतिहास की नई करवट

ये अहसास सही साबित हुआ. दस माह और बारह दिन बाद जब ये जहाज़ी बेड़ा हिंदुस्तान के साहिल पर उतरा तो उस की बदौलत यूरोप की समुद्री तन्हाई ख़त्म हो गई, दुनिया की विपरीत दिशाओं में बसे पूर्व और पश्चिम पहली बार समुद्री रास्ते से न सिर्फ़ एक दूसरे से जुड़े बल्कि टकरा गए.

अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर आपस में जुड़कर एक जलमार्ग बन गए और दुनिया के इतिहास ने एक नई करवट बदली.

दूसरी तरफ़ ये किसी यूरोपीय देश की ओर से एशिया व अफ़्रीका में उपनिवेश स्थापित करने की पहल भी साबित हुआ जिसके कारण दर्जनों देश सदियों तक बदतरीन हालात की चक्की में पिसते रहे और जिससे निकलने की ख़ातिर वो आज भी हाथ-पैर मार रहे हैं.

इस वाक़ये ने दक्षिण एशिया के इतिहास को भी यूं झिंझोड़ दिया कि आज हम जो ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, वास्को डि गामा के उस सफ़र के बग़ैर उसकी कल्पना भी मुमकिन नहीं थी. उस ऐतिहासिक सफ़र की बदौलत दक्षिण एशिया बल्कि तमाम एशिया पहली बार मक्का, आलू, टमाटर, लाल मिर्च और तम्बाकू जैसी फ़सलों से परिचित हुआ जिनके बग़ैर आज की ज़िंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती.

पुर्तगालियों ने दक्षिण एशिया की संस्कृति को किस तरह प्रभावित किया? उसकी मिसाल हासिल करने के लिए जब आप बाल्टी से पानी उडेल कर साबुन से हाथ धोकर तौलिए से सुखाते हैं और अपने बरामदे में फीते से नाप कर मिस्त्री से एक फालतू कमरा बनवाते हैं और फिर नीलाम घर जाकर उस कमरे के लिए अलमारी, मेज़ और सोफ़ा ख़रीद लाते हैं और फिर चाय पोर्च में डाल कर पीते हैं तो एक ही वाक्य में पुर्तगाली के 15 शब्द आप इस्तेमाल कर चुके होते हैं.


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भारत में असाधारण दिलचस्पी

ये पुर्तगाल की हिंदुस्तान तक पहुंचने की पहली कोशिश नहीं थी. पश्चिमी यूरोप का ये छोटा सा देश कई अर्सों से अफ़्रीका के पश्चिमी तटों की नक़्शाबंदी कर रहा था और उस दौरान सैकड़ों नाविकों की क़ुर्बानी भी दे चुका था.

आख़िर यूरोपी पुर्तगाल को हिंदुस्तान में इस क़दर दिलचस्पी क्यों थी कि वो उस पर अपने इतने संसाधन झोंकने के लिए तैयार था?

अभी कुछ ही साल पहले 1453 में उस्मानी सुल्तान मेहमद द्वितीय ने कांस्टेंटिनोपल (आज का इस्तांबुल) पर क़ब्ज़ा करके यूरोप की बुनियाद हिला दी थी. अब पूर्व से अधिकतर व्यापार उस्मानियों या फिर मिस्र के ज़रिए ही संभव था जो हिंदुस्तान और एशिया के दूसरे इलाक़ों में मिलने वाले उत्पादों ख़ासतौर पर मसालों पर भारी कर वसूल करते थे.

दूसरी ओर यूरोप के अंदर भी वेनिस और जेनेवा ने एशिया के साथ ज़मीनी रास्तों से सफ़र वाले व्यापार पर एकाधिकार क़ायम कर रखा था जिससे दूसरे यूरोपीय देशों ख़ास तौर पर स्पेन और पुर्तगाल को बड़ी परेशानी थी. यही वजह है कि वास्को डी गामा के सफ़र से पांच साल पहले स्पेन ने क्रिस्टोफ़र कोलंबस के नेतृत्व में पश्चिमी रास्ते से हिंद्स्तान तक पहुंचने के लिए एक अभियान रवाना किया था.

लेकिन पुर्तगालियों को मालूम था कि कोलंबस की मंसूबाबंदी कच्ची और उनकी जानकारी कम है और वो कभी भी हिंदुस्तान नहीं पहुंच पाएंगे. वाक़ई कोलंबस मरते दम तक समझते रहे कि वो हिंदुस्तान पहुंच गए हैं वो दुर्घटनावश एक नया महाद्वीप खोज बैठे.

अलबत्ता पुर्तगालियों को अपनी खोजों और पिछले समुद्री अभियानों से मालूम हुआ था कि अगर अटलांटिक सागर में दक्षिण की ओर सफ़र किया जाए तो अफ़्रीका के लटकते हुए दामन के नीचे से हो कर हिंद महासागर तक पहुंचा और एशिया से व्यापार में बाक़ी यूरोप का पत्ता काटा जा सकता है.

रास्ते में पेश आने वाली बेपनाह मुश्किलों के बाद वास्को डी गामा यूरोप के इतिहास में पहली बार अफ़्रीका के दक्षिणी साहिल को छूने में कामयाब हो गए. हालांकि हिंदुस्तान अभी भी हज़ारों मील दूर ता और उसका सही रास्ता पहचानना अंधेरे में सुई तलाशने जैसा था.

ख़ुशक़िस्मती से उन्हें केन्या के तटीय शहर मालिंदी से एक गुजराती मुसलमान व्यापारी मिल गया जो हिंद महासागर से ऐसे परिचित था जैसे अपनी हथेली की लकीरों से.

उस वाक़्ये के पांच सदियों बाद भी अरब के जाहज़ी उस गुजराती व्यापारी की नस्लों को कोसते हैं जिसने 'फ़िरंगियों' पर हिंद महासागर का राज खोल कर यहां स्थापित हज़ारों साल के व्यापारिक ताने-बाने को छिन-भिन्न कर दिया.

उसी नाख़ुदा की रहनुमाई में 20 मई सन 1498 को 12 हज़ार मील के सफ़र और दल के दर्जनों लोगों को गंवाने के बाद वास्को डी गामा आख़िरकार हिंदुस्तान में कालीकट के साहिल तक पहुंचने में कामयाब रहे.

उस ज़मानों के यूरोप की हिंदुस्तान से बेख़बरी का अंदाज़ा इस से लगाएं कि कालीकट में निवास के दौरान वास्को डी गामा हिंदुओं को कोई गुमराह ईसाई फिरक़ा समझते रहे. पुर्तगाली नाविक मंदिरों में जाकर हिंदू देवियों की मूर्तियों को बीवी मरियम और देवताओं को ईसाई औलिया समझकर उनके सामने झुकते रहे.


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समंदरी राजा का दरबार
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कालीकट के 'समंदरी राजा' कहलाए जाने वाले ने अपने महल में वास्को डी गामा का ज़बरदस्त स्वागत किया. बरसती बारिश में वास्को डी गामा को छतरी लगी पालकी में बिठाकर बंदरगाह से दरबार तक लाया गया. लेकिन ये ख़ुशगवारी उस वक़्त तल्ख़ी में बदल गई जब उस ज़माने की परंपरा के मुताबिक वास्को ने राजा को तोहफ़े पेश किए (लाल रंग की हैट, पीतल के बर्तन, चंद किलो चीनी और शहद) वो इस क़दर मामूली निकले की मेहमानदारी के वज़ीर ने उन्हें राजा को दिखाने से इनकार कर दिया.

इसका नतीजा ये निकला कि स्थानीय अधिकारी वास्को डी गामा को किसी अमीर देश के शाही यात्री के बजाए समुद्री लड़ाकू समझने लगे.

समुद्री राजा ने वास्को डी गामा की ओर से व्यापारिक कोठियां स्थापित करने और पुर्तगाली व्यापारियों का टैक्स माफ़ करने की अपील रद्द कर दी. हालात यहां तक पहुंच गए कि स्थानीय लोगों ने हल्ला बोल कर कई पुर्तगालियों को मार डाला.

वास्को डी गामा के गुस्से का कोई ठिकाना ना रहा. उसके जहाज़ों में जो तोपें तैनात थीं उसका समुद्री राजा के पास कोई जवाब नहीं था. उन्होंने कालीकट पर बम्बारी करके कई इमारतें और शाही महल तबाह कर दिए और समंदरी राजा को देश के भीतरी हिस्सों में भागने पर मजबूर कर दिया.

राजनयिक विफलता अपनी जगह, लेकिन कालीकट में तीन माह रहने के दौरान यहां की मंडियों से बेशक़ीमती मसाले इतनी तादाद में और इतने सस्ते मिले कि उसने जहाज़ के जहाज़ भरवा दिए.

पूरी ईसाई दुनिया के लिए मसाले

वास्को डी गामा का वापसी का सफ़र बेहद मुश्किलों भरा रहा. आधा दल बीमारियों और एक जहाज़ तूफ़ान का शिकार हो गया. आख़िरकार लिस्बन से रवाना होने के ठीक दो साल बाद दस जुलाई 1499 को 28 हज़ार किलोमीटर का सफर तय करने के बाद जब पुर्तगाली बेड़ा वापस लिस्बन पहुंचा (वास्को डी गामा अपने बाई की बीमारी की वजह से एक द्वीप पर रुक गए थे) तो उसका ज़बरदस्त स्वागत किया गया. ये अलग बात है कि 170 के दल में से सिर्फ़ 54 लोग ही ज़िंदा लौट सके थे.

शाह मैनवल द्वितीय ने ये बात सुनिश्चित की कि तमाम यूरोप को उसकी कामयाबी की ख़बर तुरंत मिल जाए. उन्होंने स्पेन की महारानी इसाबेला और शाह फर्डीनांड को ख़त लिखते हुए धार्मिक कार्ड खेलना ज़रूरी समझा- "ख़ुदा के करम से वो व्यापार जो इस इलाक़े के मुसलमानों को मालदार बनाती है, अब हमारी सल्तनत के जहाज़ों के पास होगा और ये मसाले तमाम ईसाई दुनिया तक पहुंचाए जाएंगे."

लेकिन सवाल ये था कि एक छोटा सा देश हज़ारों मील दूर से बड़े पैमाने पर स्थापित व्यापारिक नेटवर्क कैसे तोड़ पाने की उम्मीद रख सकता है?

पुराने व्यापारिक रास्ते

वास्को ने कालीकट में अपने निवास के दौरान मुसलमानों के कम से कम पंद्रह सौ जहाज़ गिने थे. लेकिन उसने एक दिलचस्प बात भी नोट की थी- ये जहाज़ अकसर और अधिकतर निहत्थे हुआ करते थे. हिंद महासागर में होने वाला व्यापार आपसी सहयोग के उसूलों पर स्थापित था और राजस्व इस तरह तय किया जाता था कि दोनों पक्षों को फ़ायदा हो.

पुर्तगाल उन उसूलों पर काम नहीं करना चाहता था. उसका मक़सद ताक़त के ज़रिए अपना एकाधिकार क़ायम करके तमाम दूसरे पक्षों को अपनी शर्तों पर मजबूर बनाना था.

जल्द ही पुर्तगाल का ये मंसूबा सामने आ गया. वास्को डी गामा के पहुंचने के छह महीने अंदर अंदर जब पेद्रो अल्वारेज़ काबराल के नेतृत्व में दूसरा पुर्तगाली बेड़ा हिंदुस्तान की ओर रवाना हुआ तो उस में 13 जहाज़ शामिल थे और उसकी तैयारी व्यापारिक अभियान से ज़्यादा जंगी कार्रवाई की थी.

हर मुमकिन फ़ायदा

काबराल को पुर्तगाली बादशाह ने जो लिखित सलाह दी उससे उनकी महत्वकांक्षा स्पष्ट हो जाती है-

"तुम्हें समंदर में मक्का के मुसलमानों का जो भी जहाज़ मिले उस पर हर संभव कोशिश करके क़ब्ज़ा करो, और उस पर लदे माल और सामान और जहाज़ पर मौजूद मुसलमानों को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करो. उन से जंग करो और जितना तुमसे हो सके उन्हें नुक़सान पहुंचाने की कोशिश करो."

इस सलाह की रोशनी में सशस्त्र बेड़े ने कालीकट पहुंच कर मुसलमान व्यापारियों के जहाज़ों पर हमले करके माल लूट लिया और जहाज़ों को यात्रियों और नाविकों समेत आग लगा दी.

इसी पर चिंता न करते हुए काबराल ने कालीकट पर दो दिन तक बमबारी कर के शहर के लोगों को घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया. यही वजह है कि जब वो कोचीन और कन्नूर की बंदरगाहों पर उतरा तो वहां के राजाओं तक ख़बरें पहले ही पहुंच चुकी थीं, इसलिए उन्होंने पुर्तगालियों को उनकी शर्तों पर व्यापारिक ठिकाने क़ायम करने की अनुमति दे दी.


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काबराल के मसालों से लदे जहाज़ जब वापिस पुर्तगाल पहुंचे तो जितना जश्न लिस्बन में मनाया गया उससे ज़्यादा मातम वेनिस में मना.

एक इतिहासकार लिखते हैं- "ये वेनिस के लिए बुरी ख़बर है. वेनिस के व्यापारी सही मायनों में मुश्किलों में घिर गए हैं."

गन बोट व्यापार

ये भविष्यवाणी सही साबित हुई. जब 1502 में वेनिस के जहाज़ एलेक्ज़ेंड्रिया के बंदरगाह पर पहुंचे तो पता चला कि वहां मसाला न होने के बराबर है, जो है भी उसकी क़ीमतें आसमान पर पहुंच गई हैं.

अगली बार जब वास्को डी गामा ने हिंदुस्तान का सफ़र किया तो उनके तेवर कुछ और थे. उन्होंने अफ़्रीका के पूर्वी तट के शहरों के बिना वजह और अंधाधुंध बमबारी का निशाना बनाया और उगाही वसूल की. वहां से जाने से पहले उसने मुसलमान व्यापारियों को व्यापार न करने देने का वादा भी लिया.

गन बोट डिप्लोमेसी बल्कि गन बोट व्यापार की इससे बेहतर मिसाल मिलना मुश्किल है.

हिंदुस्तान के सफ़र के दौरान जो जहाज़ उसके रास्ते में आया, वो लौट कर डुबा दिया गया. उस दौरान हाजियों का एक 'मीरी' नाम का जहाज़ उसके हाथ लग गया जिस पर चार सौ यात्री सवार थे जो कालीकट से मक्का जा रहे थे.

वास्को डी गामा ने यात्रियों को बांध कर जहाज को आग लगा दी. चश्मदीदों के मुताबिक जलते हुए जहाज़ के सिरे पर औरतें अपने बच्चों को हाथ में उठाकर रहम की भीख मांग रहीं और वास्को डी गामा अपने जहाज़ से तमाशा देखते रहे.

मालाबार के साहिलों पर आज भी 'मीरी' जहाज़ की तबाही के नोहे पढ़े जाते हैं. वास्को डी गामा का स्पष्ट मक़सद पूरे इलाक़े में पुर्तगाल की दहशत फैलाना था.

वास्को अपने मक़सद में पूरी तरह कामयाब रहा. ये ख़बरें समुद्री रास्तों पर यात्रा करते हुए हिंद महासागर के दूर दराज़ इलाक़ों में पहुंच गईं. हिंदुस्तान के तटीय शहरों के पास बेहतरीन पुर्तगाली तोपों और पुर्तगालियों के आक्रामक रवैये का कोई जवाब नहीं था. उनके पास अब व्यापार की चाभियों को वास्को के हवाले करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.

ये अंधाधुंध आक्रामकता पश्चिमी अपनिवेशवादियों के क़ायम होने की व्यवहारिक मिसाल थी. स्थानीय राजाओं के लिए ये बात अविश्वस्नीय थी कि कोई किसी को समंदर में सफ़र करने से कैसे रोक सकता है?

समुद्री डाकू

एशिया में वास्को डी गामा के ये तरीक़े व्यापार के बजाए समुद्री लूट समझे गए लेकिन यूरोप में ये रोज़मर्रा की बात थी. पुर्तगाल दूसरे यूरोपीय देशों से ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा, व्यापार में फ़ौजी ताक़त के इस्तेमाल और दख़ल और फ़ौज़ी ताक़त में नई-नई तकनीक के इस्तेमाल के आदी थे.

ये तमाम पूरे हिंद महासागर पर पुर्तगाल के एकाधिकार की शुरुआत थी. स्थानीय राजाों ने हर संभव मुक़ाबला करने की कोशिश की लेकिन हर मुठभेड़ में उन्हें हार ही मिली. जिसका नतीजा ये निकला कि आने वाली डेढ़ सदियों में पुर्तगालियों ने कन्नूर, कोचीन, गोवा, मद्रास और कालीकट के अलावा कई दूसरे तटीय इलाक़ों में समंदर पार ताक़त के दम पर अपनी हक़ूमत क़ायम कर ली और वहां अपने वायसराय और गवर्नर तैनात कर दिए.

दूसरे यूरोपीय देश ये तमाम खेल बड़ी दिलचस्पी से देख रहे थे और यही काम बाद में नीदरलैंड्स, फ्रांस और आख़िरकार अंग्रेज़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में दोहराया और पुर्तगालियों को उन्हीं के खेल में शिकस्त देकर न सिर्फ़ हिंदुस्तान बल्कि पूरे हिंद महासागर पर क़ब्ज़ा कर लिया. सिर्फ़ गोवा और दमन और दीव के इलाक़े दक्षिण एशिया की आज़ादी तक पुर्तगालियों के पास रहे. आख़िरकार दिसंबर 1961 में भारत ने फौज़ भेज कर ये इलाक़े पुर्तगालियों के क़ब्ज़े से आज़ाद किए.

व्यापारिक नेटवर्क

लेकिन इससे पहले क़रीब डेढ़ सदियों तक पुर्तगाली हिंदुस्तान से गरम मसाला, अदरक, इलायची, लोंग और कपड़ा, मलाया से दालचीनी, चीन से रेशम और बर्तन यूरोप ले जाते और वहां से उसके साथ ही वो यूरोपीय शराब, ऊन, सोना और दूसरे उत्पाद एशिया के अलग-अलग हिस्सों में बेचने लगे. यही नहीं, बल्कि वो ऐशिया और अफ़्रीका के अलग-अलग हिस्सों के बीच व्यापारिक गतिविधियों पर भी क़ाबिज़ हो गए और दूसरे तमाम व्यापारियों से भारी राजस्व वसूलने लगे.

इसी दौरान अमीरीकी महाद्वीप की खोज हो चुकी थी और वहां स्पेन के अलावा ख़ुद पुर्तगाल और दूसरे यूरोपीय देश ने नए उपनिवेश स्थापित करना शुरू कर दिया था.

पुर्तगालियों ने उसी नई दुनिया से मक्का, आलू, तम्बाकू, अनानास, काजू और लाल मिर्च लाकर इनका हिंदुस्तान और ऐशिया के दूसरे हिस्सों में परिचय करवाया. आज बहुत से लोगों को लाल मिर्च हिंदुस्तानी खाने का अहम हिस्सा मालूम होती है लेकिन पुर्तगालियों से पहले यहां के लोग इससे परिचित नहीं थे.

साझा ज़बान

लेकिन पुर्तगालियों के भारत के साथ संबंध सिर्फ़ सैन्य और व्यापारिक ही नहीं रहे बल्कि भारत की संस्कृति और सभ्यता भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी.

पुर्तगाली भाषा कई सदियों तक हिंद महासागर के बंदरगाहों की साझा ज़बान रही. यहां तक की डच, फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों तक को भारत आने के बाद पहले-पहले भारतीयों से पुर्तगाली सीखनी पड़ी.

पुर्तगाली पेंटिंग
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पुर्तगाली पेंटिंग

चाहें वो सिराजुद्दौला को शिकस्त देने वाले लॉर्ड क्लाइव भी स्थानीय हिंदुस्तानियों के साथ पुर्तगाली भाषा में ही बात करते थे. पुर्तगाली भाषा का असर स्थानीय भाषाओं पर भी पड़ा. यही वजह है कि दक्षिण एशिया की 50 से ज़्यादा भाषाओं में पुर्तगाली शब्द पाए जाते हैं.

हमने ऊपर हिंदी और उर्दू ज़बान में इस्तेमाल किए जाने वाले पुर्तगाली शब्दों का ज़िक्र किया था. ऐसे ही कुछ और शब्दों मे चाबी, पादरी, गिरजा, अंग्रेज़, अंग्रेज़ी, पीपा, पासन, गोदाम, इस्त्री, काज, परात, भत्ता, पगार, अलफ़ानसो (आम), पपाया, मारतोड़, तम्बाकू, बम्बा, मस्तूल शामिल हैं.

मुग़लों को समंदर से दिलचस्पी नहीं थी

1526 में जब बाबर ने हिंदुस्तान में मुग़ल सल्तनत की नींव डाली उस समय तक पुर्तगाल तमाम तटीय इलाक़ों पर क़दम जमा चुका था. हालांकि मुग़ल मध्य एशिया के सूखे इलाक़ों से आए थे और उन्होंने समंदर का मुंह तक नहीं देखा था. इसलिए उन्होंने समंदरी मामलों को कोई अहमियत नहीं दी. पुर्तगालियों ने मुग़लों से राजनयिक रिश्ते स्थापित कर लिए और अकबर, जहांगीर और शाहजहां को तरह-तरह के तोहफ़े भेजते रहे.

ख़ास तौर पर यूरोपीय पेंटिंग ने मुग़लों को प्रभावित किया और उनका असर मग़ल दौर की कला पर भी नज़र आया.

दक्षिण एशिया को पुर्तगालियों की एक और देन के बग़ैर ये रिपोर्ट अधूरी ही रहेगी. हम सब बॉलीवुड के सुनहरे दौर के संगीत के प्रशंसक हैं. इस संगीत के प्रचार में गोवा से आने वाले पुर्तगाली मूल के संगीतकारों का बड़ा हिस्सा है जिन्होंने हिंदुस्तानी संगीत डायरेक्टरों को म्यूज़िक अरेंजमेंट और आर्केस्ट्रा का इस्तेमाल सिखाया.

आज भी अगर आप शंकर जय किशन, एसडी बर्मन, सी राम चंदर, ओपी नैयर, लक्ष्मीकांत प्यारे लाल जैसे संगीतकारों की फ़िल्में देखें तो 'म्यूज़िक अरेंजमेंट' के टाइटल तले आपको गोंज़ालवेज़, फ़र्नांडो, डीसूजा, डीसिलवा जैसे कई पुर्तगाली नाम नज़र आएंगे जो एक गुज़रे हुए दौर की दास्तान सुनाते हैं.

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English summary
When the Portuguese changed the history of India

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