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जब पाकिस्तानी सैनिक राज कपूर के लिए लाए जलेबी- विवेचना

राज कपूर के बारे में कहा जाता था कि वो जो कुछ भी करते थे, उसके पीछे कोई न कोई कारण ज़रूर होता था. उनके दिमाग़ में हर तरह की सूचनाओं का भंडार रहता था. उनकी आंखें और कान हर तरफ़ लगे रहते थे.

राज कपूर का मानना था कि किसी भी रचनात्मक काम के पीछे हर तरह की नकारात्मक भावनाओं जैसे डर, बेइज़्ज़ती, हार, किसी अपने का खो जाना, संबंधों का टूटना बहुत ज़रूरी हैं. इन सबसे जीवन के प्रति हमारी समझ मज़बूत होती है और रचनात्मकता समृद्ध होती है.

राहुल रवैल भारत के जानेमाने फ़िल्म निर्देशक हैं. उन्हें कई फ़िल्मों में राज कपूर के साथ बतौर सहायक निर्देशक काम करने का मौक़ा मिला. हाल ही में उन्होंने राज कपूर पर एक दिलचस्प किताब लिखी है- 'राज कपूर: द मास्टर एट वर्क'. इसमें उन्होंने राज कपूर के जीवन के उन पक्षों पर अपनी नज़र दौड़ाई है, जिस पर अभी तक कम लोगों की ही नज़र गई.

राहुल रवैल बताते हैं, "मैंने 12वीं कक्षा के बोर्ड के इम्तेहान दिए ही थे कि एक दिन मेरे बचपन के दोस्त ऋषि कपूर का फ़ोन आया कि डैड आज से 'मेरा नाम जोकर' के सर्कस के दृष्यों की शूटिंग शुरू कर रहे हैं. ये शूटिंग आज़ाद मैदान में होनी है. अगर तुम कुछ कम कपड़े पहने सेक्सी रूसी कलाकारों को देखना चाहते हो, तो वहाँ पहुंच जाओ."

"मैं तुरंत वहाँ पहुंच गया. शुरू में उन रूसी लड़कियों ने मुझे आकर्षित ज़रूर किया, लेकिन जब मैंने राज अंकल को नज़दीक से काम करते देखा तो मैं सब कुछ भूल गया. उन्हें काम करते देख मैं पूरी तरह से मंत्रमुग्ध हो गया. उनको देख कर ऐसा लगा कि जैसे कोई संगीतकार बिना म्यूज़िक शीट के किसी सिंफ़्नी का संचालन कर रहा हो."

राहुल रवैल राज कपूर से इतने प्रभावित हुए कि अगले 15 दिनों तक लगातार वो 'मेरा नाम जोकर' की शूटिंग देखने पहुंचे. उन्हें उच्च शिक्षा के लिए कनाडा जाना था, लेकिन उसमें अभी सात महीने बाक़ी थे. उन्होंने अपने पिता से पूछा कि क्या वो इस खाली समय में राज कपूर के साथ बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम कर सकते हैं?

उनके पिता उन्हें राज कपूर के पास ले कर गए. राज कपूर उन्हें अपने साथ रखने के लिए तैयार हो गए. उस दिन के बाद से ही राज कपूर उनके उस्ताद और दोस्त बन गए. कुछ दिनों बाद ही राहुल रवैल को अंदाज़ा हो गया कि राज कपूर न सिर्फ़ विलक्षण सोच के मालिक हैं, बल्कि उन जैसी ज़िंदगी जीने वाले लोग इस दुनिया में न के बराबर हैं.

राज कपूर पर फ़िल्म निर्देशक राहुल रवैल की लिखी एक किताब हाल में ब्लूम्सबरी इंडिया से प्रकाशित हुई है.
Bloomsbury India
राज कपूर पर फ़िल्म निर्देशक राहुल रवैल की लिखी एक किताब हाल में ब्लूम्सबरी इंडिया से प्रकाशित हुई है.

'बॉबी' के वितरक को सरेआम नंगा किया

रमन नाम के एक साहब राज कपूर की फ़िल्मों के लिए तमिलनाडु में वितरक हुआ करते थे. जब उनका देहांत हो गया तो उनके बेटे बाबू ने उनका काम संभाल लिया.

जब 'बॉबी' हिट हो गई और उससे मिलने वाले लाभ के पैसों को बाबू ने राज कपूर के पास नहीं पहुंचाया तो वो नाराज़ हो गए. एक रात जब राज कपूर अपने घर लौट रहे थे, उन्होंने अचानक अपने ड्राइवर से कहा कि गाड़ी घुमाओ और रमन साहब के घर चलो.

राहुल रवेल बताते हैं, "राज साहब अपनी कार से उतरे और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे 'बाबू, बाबू.' बाबू दौड़ते हुए बाहर आए. शोर सुनकर उनके सारे पड़ोसी भी ये ड्रामा देखने के लिए अपने घर से बाहर निकल आए. बाबू उस समय सिर्फ़ दक्षिण भारतीय लुंगी 'मुंडू' पहने हुए थे. उनके बदन पर कुछ भी नहीं था."

"राज कपूर बिना कोई समय बरबाद करते हुए चिल्लाए, 'मेरे 'बॉबी' का प्रॉफ़िट कहां है?' बाबू ने जवाब दिया, 'मेरे पास सुरक्षित पड़ा है.' राज कपूर चिल्लाए, 'तुम्हारे पास है? मेरे पास क्यों नहीं है? तुम्हें उसे रखने का क्या हक़ है?' बाबू ने जवाब दिया, 'हम कल दे देगा आपको.' राज कपूर ने आव देखा न ताव, बाबू की लुंगी खींच ली. बाबू अपने सारे पड़ोसियों के सामने बिल्कुल नंग-धड़ंग खड़े थे. राज कपूर ने कहा, 'कल सुबह पैसे लेकर आओ और अपनी लुंगी वापस ले कर जाओ'."

बस स्टैंड पर राज कपूर

एक बार तड़के तीन बजे राहुल रवैल के पड़ोसियों ने उन्हें जगा कर कहा कि राज कपूर बाहर कुछ आवारा कुत्तों के साथ खेल रहे हैं. रवैल उन्हें ढ़ूंढ़ने निकले, लेकिन राज कपूर उन्हें नहीं मिले.

तभी उनका ड्राइवर उनकी कार लेकर उनके घर आया. ड्राइवर ने बताया "राज साहब कार से नीचे उतर गए हैं. पहले वो कुत्तों से खेलते रहे. फिर मुझसे बोले कि तुम गाड़ी ले कर घर जाओ. मैं पैदल ही घर जाउंगा."

राहुल रवैल ने ड्राइवर से उनकी गाड़ी ली और राज कपूर को ढ़ूंढ़ने निकल गए.

राहुल रवैल बताते हैं, "मैं इधर-उधर देख रहा था, तभी मैंने राज कपूर को एक बस स्टैंड पर खड़े देखा. जब मैंने उनसे रुककर पूछा कि आप यहां क्या कर रहे हैं, तो उन्होंने ग़ुस्से से जवाब दिया- 'बस स्टैंड पर कोई क्या करता है? बस का इंतज़ार न?' मैंने उनको ये कहकर मनाने की कोशिश की कि बस साढ़े पांच बजे से पहले चलना नहीं शुरू करती. लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं हुआ."

"राज कपूर ने कहा कि मैं सुबह साढ़े पांच बजे तक इंतज़ार करूंगा, लेकिन जाउंगा बस से ही. उन्होंने ग़ुस्से से कहा- 'अब तुम अपनी शक्ल मुझे मत दिखाओ. मैंने तुम्हें बर्ख़ास्त कर दिया है. मैंने उनको शांत करने के लिए गाड़ी आगे बढ़ा दी. सड़क का एक चक्कर लगाने के बाद जब मैं वापस लौटा तो वो बस स्टैंड पर नहीं थे. ये सोचते हुए कि उन्होंने कैब ले ली होगी, मैं सांताक्रूज़ की तरफ़ बढ़ने लगा."

"थोड़ी देर में मैं देखता क्या हूँ कि राज कपूर एक टैक्सी में आगे की सीट पर ड्राइवर और एक और शख़्स के बीच बैठे हुए हैं. उन्होंने अपने दोनों हाथ उन दोनों के कंधों पर रखे हुए थे और उनके सिर पर एक गमछा बंधा हुआ था. जब मैं उस टैक्सी की बगल में पहुंचा तो मैंने देखा कि राज कपूर एक गाना गा रहे थे- सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन."

सिनेमा के प्रति राज कपूर का जुनून

राहुल रवैल ने बताया, "11 साल बाद उन्होंने ये गाना अपनी फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली' में इस्तेमाल किया. घर पहुंचने के बाद राज कपूर ने उन दोनों को गले लगाया और बिना टैक्सी का किराया दिए अपने घर के अंदर चले गए. मैंने उस टैक्सी वाले से पूछा कि तुम्हारा कितना बिल हुआ, तो उसने हँस कर जवाब दिया, 'अरे साहब! राज कपूर गाड़ी में बैठ गया तो बिल काहे का'."

"अगले दिन राज कपूर के सेक्रेटरी का फ़ोन मेरे पास आया कि राज साहब ने कहा है कि आप घर पर आ जाइए और खाना भी यहीं खाइए. मैंने पिछली रात का कोई ज़िक्र नहीं किया, लेकिन राज कपूर ख़ुद ही बोले, 'मुझे याद है कि मैं तुम्हारे घर आया था. मुझे ये भी याद है कि मैं बस स्टॉप पर खड़ा था और टैक्सी में घर लौटा था और तुम मेरे पीछे-पीछे आए थे. बताओ तुमने टैक्सी वाले को कितने पैसे दिए?' मैंने कहा- 'उसने पैसे नहीं लिए.' राज कपूर का अगला सवाल था, 'उन लोगों को वो गाना पसंद आया?' ये उनकी रचनात्मकता का सबसे बड़ा उदाहरण था. रात को वो शराब के नशे में थे लेकिन इसके बावजूद सिनेमा के प्रति उनके जुनून ने उनका साथ नहीं छोड़ा था."

गुलशन राय से ज़बानी जंग

जब राज कपूर ने 'मेरा नाम जोकर' बनाई तो गुलशन राय ने लगभग उसी समय एक फ़िल्म बनाई जिसका नाम उन्होंने 'जॉनी मेरा नाम' रखा. उनकी फ़िल्म का नाम 'मेरा नाम जोकर' से बहुत मिलता-जुलता था और वो उससे पहले रिलीज़ हुई और काफ़ी सफल भी हुई थी. इसकी तुलना में 'मेरा नाम जोकर' कुछ ख़ास नहीं कर पाई थी.

उन दिनों फ़िल्मों के नामों को लेकर काफ़ी मज़ाक प्रचलित थे. चार साल बाद जब राज कपूर ने 'बॉबी' बनाई तो वो काफ़ी बड़ी हिट साबित हुई. एक पार्टी में जब राज कपूर की मुलाकात गुलशन राय से हुई तो उन्होंने उनसे कहा, "क्यों, जब मैंने 'मेरा नाम जोकर' बनाई तो तूने 'जॉनी मेरा नाम' बना ली? अब मैंने 'बॉबी' बनाई है तो तू कौन सी फ़िल्म बनाएगा, टॉबी?"

बॉर्डर पर सैनिकों से मुलाक़ात

'बॉबी' की शूटिंग के दौरान राज कपूर कश्मीर में कुछ शॉट ले रहे थे. जब वो सेना की एक चौकी से गुज़रे तो उनके रास्ते में एक बैरीकेड लगा था. वहां तैनात सैनिकों ने उनसे कहा कि इससे आगे जाने की इजाज़त नहीं है. तो राज साहब ने कहा कि तुम अपने कमांडर को बुलाओ और उनसे कहो कि राज कपूर आए हैं.

कमांडर ने आकर न सिर्फ़ राज कपूर का अभिवादन किया, बल्कि उनके लिए दो जीपों की व्यवस्था की ताकि उनकी टीम को भारत-पाकिस्तान सीमा तक ले जाया सके.

राहुल रवैल बताते हैं, "जब हम सीमा पर पहुंचे तो सारे जवान हमारा इंतज़ार कर रहे थे, क्योंकि उन्हें पहले ही वायरलेस से बता दिया गया था कि राज कपूर वहां आ रहे हैं. उन लोगों ने हमारे लिए पकौड़ों और समोसों का इंतज़ाम किया था. आधे घंटे बाद जब हम वापस चलने के लिए तैयार हुए तो उन्होंने हमसे कहा, 'सर थोड़ी देर और रुक जाइए. हमने पाकिस्तानी सैनिकों को रेडियो पर बता दिया है कि राज कपूर यहां तशरीफ़ लाए हैं. वो आपसे मिलने यहां आ रहे हैं.' थोड़ी देर बाद हमने देखा कि पाकिस्तानी सैनिकों से भरी दो जीपें वहां पहुंची. वो हमारे लिए जलेबियां और मिठाइयां लाए थे. हम ये देखकर बहुत भावुक हो गए कि पाकिस्तानी सैनिकों के बीच भी राज कपूर उतने ही लोकप्रिय थे."

फ़िल्म बॉबी का एक दृश्य
RK Films and Studios
फ़िल्म बॉबी का एक दृश्य

गोलगप्पे, दोसा और फ़िल्टर कॉफ़ी के शौक़ीन

राज कपूर खाने-पीने के बहुत शौक़ीन थे. शाम के ठीक 6 बजे वो चेंबूर स्टेशन जाया करते थे, जहा वो एक गोलगप्पे वाले के खोमचे से गोलगप्पे खाया करते थे. उसके बगल में एक दक्षिण भारतीय रेस्तरां था, वहां वो डोसा और मेंदूवड़ा खाया करते थे. फिर वो पास के एक दूसरे रेस्तरां जा कर फ़िल्टर कॉफ़ी पिया करते थे.

राहुल रवैल कहते हैं, "राज कपूर का ये रूटीन कभी भंग नहीं होता था. अगर उन्हें उस समय किसी शख़्स से मिलना भी होता, तो वो अपना रूटीन नहीं तोड़ते थे और उस शख़्स को भी गोलगप्पे खाने के लिए आमंत्रित कर देते थे. कल्पना करिए कि आप राज कपूर से मिलने आए हैं और आप उनसे बातें करते हुए सड़क पर खोमचे वाले से गोलगप्पे खा रहे हैं."

पाव के बीच जलेबी रखकर सैंडविच बनाते

आरके स्टूडियो बंबई (आज का मुंबई) का अकेला स्टूडियो था, जो शाम 6 बजे 'हाई टी' सर्व करता था. राज कपूर इसे टिफ़िन कहकर पुकारते थे. इसमें डोसा, वड़ा, सैंडविच, रोल्स, जलेबी और कोई न कोई मिठाई ज़रूर होती थी. आरके स्टूडियो के खाने को राजाओं का खाना कहा जा सकता था.

राहुल रवैल बताते हैं, "एक-एक चिकन, मटन और मछली की डिश तो होती ही थी. ऊपर से केंकड़े, झींगे, कलेजी और कबाब भी हुआ करते थे. इसके अलावा, तरह-तरह की दाल, सब्ज़ियां और कम से कम तीन क़िस्म का मीठा होता था. हम सब साथ बैठ कर एक जैसा खाना खाते थे."

अंतिम एडिटिंग के समय राज साहब पूरी तरह से वेजिटेरियन बन जाते थे और शराब को हाथ भी नहीं लगाते थे. राज कपूर को खाने के साथ प्रयोग करने का भी बहुत शौक था.

राहुल कहते हैं, "मैंने उन्हें पाव के बीच मक्खन लगा कर उसमें जलेबी भरकर खाते हुए देखा है. मैं उनसे पूछता था कि सर आप किस तरह जलेबी सैंडविच खा सकते हैं. वो मेरी तरफ़ मुस्करा कर देखते और मीठी सैंडविच को टोमेटो सॉस में डुबो कर उसे खा जा जाते."

12 बोतलों की शराब का किया परीक्षण

जब राहुल रवैल की शादी रीता से हुई तो फेरे सुबह हुए. ज़ाहिर है उस वक्त राज कपूर भी वहां मौजूद थे. पहले तो वो इस बात पर नाराज़ हुए कि सारा खाना वेजेटेरियन था. बाद में शादी की दावत दी गई तो उनकी पत्नी और दूसरे मेहमान राज कपूर को देख कर दंग रहे गए.

राहुल को याद है, "राज कपूर हमारी शादी में एक टिफ़िन लेकर आए. मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा कि राज अंकल कर क्या रहे हैं? वो रसोई में गए और हर खाने को चखा और अपने टिफ़िन में भर लिया. बाद में वो अपने घर ले जाकर उन्होंने खाना खाया."

"इसके बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी विस्की कहाँ हैं? मैंने कहा- 'आपके लिए ब्लैक लेबेल की 12 बोतलें अलग से रखवा दी हैं. मैंने उन्हें खोला नहीं है ताकि आप ही उन्हें खोल कर अंदाज़ा लगा सकें कि उनमें से कौन-सी असली ब्लैक लेबेल है.' वो बार में गए और मेरे दोस्त से कहा कि सभी 12 बोतलों से शराब का नमूना अलग-अलग गिलासों में भरो. उन्होंने हर गिलास से एक-एक सिप ली और फिर बोले कि पाँचवी बोतल की शराब असली है. फिर उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से प्लास्टिक की एक बोतल निकाली और उसमें उस बोतल की आधी शराब भर कर अपने ड्राइवर से बोले, 'इसे गाड़ी में रख दो.' फिर उन्होंने मेरे दोस्त से कहा कि इस बोतल की बाक़ी शराब राहुल के लिए है. इसकी एक बूँद भी किसी को सर्व न की जाए."

राज कपूर पर किताब लिखने वाले फ़िल्म निर्देशक राहुल रवैल
Bloomsbury India
राज कपूर पर किताब लिखने वाले फ़िल्म निर्देशक राहुल रवैल

चुपके से सैंडविच की फ़िलिंग खा जाने की आदत

राज साहब को घुड़दौड़ देखने का भी बहुत शौक़ था. इसलिए नहीं कि वो घोड़ों पर दांव लगाते थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें रेसकोर्स मे मिलने वाले स्नैक्स बहुत पसंद थे.

राहुल रवैल बताते हैं, "जब दौड़ शुरू होने वाली होती थी और सब लोग बाज़ी लगाने वहां चले जाते थे, राज कपूर वहां रखी सैंडविच खोलकर उसके अंदर भरी फ़िलिंग खा जाते थे और सैंडविच को वैसे ही प्लेट पर रख देते थे, जिससे ये लगे कि उसे छुआ नहीं गया है. जब मैंने उन्हें ऐसा करते देखा तो मुझे विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने मेरी तरफ़ देख कर कहा, तुम मुझे घूर क्यों रहे हो? तुम्हें मालूम नहीं कि आजकल मैं डाइटिंग कर रहा हूं."राज कपूर डेकेन एक्सप्रेस ट्रेन से पुणे जाना पसंद करते थे. हालांकि उन्हें कार से पुणे जाने में उससे कम समय लगता, लेकिन वो वहां ट्रेन से जाना ही पसंद करते थे, क्योंकि उन्हें ट्रेन में परोसा जाने वाला खाना बहुत पसंद था. यही नहीं, जहां-जहां ट्रेन रुकती थी वहां-वहां प्लेटफ़ॉर्म पर उतरते थे और फिर वहां मिल रहा खाना भी खाते थे.

ताशकंद में राज कपूर की लोकप्रियता

राज कपूर भारत से अधिक कम्युनिस्ट देशों में लोकप्रिय थे और अभी भी हैं. वर्ष 2007 में जब रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, नितिन मुकेश और राहुल रवैल राज कपूर पर शो करने ताशकंद गए तो वहां राहुल का परिचय राज कपूर के सहायक निर्देशक के तौर पर करवाया गया.

जब वो एक स्थानीय बाज़ार में कुछ ख़रीदारी के लिए गए तो राज कपूर के बेटों और सहयोगियों को देखने वहां भारी भीड़ जमा हो गई थी.

राहुल रवैल बताते हैं, "भीड़ में से एक बूढ़ी औरत ने मेरे पास आकर मुझसे पूछा, क्या आप राज कपूर के सहायक रहे हैं? एक अनुवादक ने उनके सवाल का मेरे लिए अनुवाद किया. जब मैंने इसका जवाब 'हाँ' में दिया तो उन्होंने मुझसे फिर पूछा, 'इसका मतलब ये हुआ कि आपको राज कपूर को छूने का मौक़ा मिला होगा?' मुझे ये सवाल थोड़ा अजीब-सा लगा, लेकिन जब मैंने इसका भी जवाब 'हाँ' में दिया तो वो औरत मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर रोने लगी. उन्हें देख कर मेरी आँखें भी भर आईं. ऐसा अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ था."

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