जब भारतीयों ने एक पाकिस्तानी जनरल की बचाई जान, छोड़ देते तो हो जाती मॉब लिंचिंग
नई दिल्ली, 15 दिसंबर: 16 दिसंबर यानी गुरुवार को देश पाकिस्तान पर जीत की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है। बांग्लादेश को मुक्त कराकर भारतीय सेना ने किस तरह से पाकिस्तानी सेना को सरेंडर करवाया था, यह किस्से तो दुनिया जानती है और पाकिस्तान आजतक अपनी झेंप नहीं मिटा पाया है। लेकिन, अगर उस दिन भारतीय अधिकारी और भारतीय सेना नहीं होती तो सरेंडर पर दस्तखत करने वाले पाकिस्तान के टॉप मिलिट्री कमांडर नियाजी की जान भी नहीं बच पाती। युद्धबंदी होने के नाते भारतीय अधिकारियों और सैनिकों ने अपना फर्ज निभाया और बांग्लादेश के नागरिकों की उन्मादी भीड़ से उन्हें सुरक्षित निकाल लिया। यह किस्सा सरेंडर कार्यक्रम के दौरान मौजूद रहे एकमात्र भारतीय सिविलियन अधिकारी ने अपने संस्मरण में बताया है, जो उनकी बेटी के जरिए देश के सामने आया है।

16 दिसंबर, 1971 को रमना मैदान में क्या हुआ था ?
1971 में पाकिस्तान पर भारत की ऐतिहासिक जीत की गुरुवार को 50वीं वर्षगांठ है। 16 दिसंबर, 1971 को ही बांग्लादेश के ढाका स्थित रमना मैदान में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया था। जब पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी भारतीय सेना के सामने सरेंडर पेपर पर हस्ताक्षर कर रहे थे तो वहां पर सिर्फ एक ही सिविलियन अधिकारी एके रे मौजूद थे। उस समय वे विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान मामलों के संयुक्त सचिव थे। उस समय वही भारत सरकार, बांग्लादेश की निर्वासित सरकार, मुक्ति बाहिनी और भारतीय सेना के बीच की कड़ी थे। 2004 में रे का निधन हो चुका है। उस दिन रमना मैदान में पाकिस्तानी सेना के हथियार डालते वक्त वहां की जो परिस्थियां थी, उसके बारे में उन्होंने जो संस्मरण लिखा था, वह उनकी बेटी ने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ साझा किया है। यह किस्सा बताता है कि अगर भारतीय अधिकारी और भारतीय सेना ने पाकिस्तानी जनरल की जान नहीं बचाई होती तो उस दिन भीड़ उनके साथ क्या करने वाली थी।

उसी दिन कलकत्ता से ढाका पहुंचे
एके रे ने बताया है कि जब 16 दिसंबर, 1971 को दिन में 11 बजे उनके कलकत्ता वाले अस्थाई दफ्तर में लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा का फोन आया तो उनकी आवाज में किस कदर उत्साह था। उन्होंने बताया कि कैसे विदेश मंत्रालय के तत्कालीन सचिव एसके बनर्जी के निर्देश से वे कलकत्ता के दमदम एयरपोर्ट से भारतीय वायुसेना के विमान से अगरतल्ला पहुंचे और फिर वहां से एक एलुवेट (एक इंजन वाला हेलीकॉप्टर ) से ढाका के धानमंडी एयरपोर्ट पर उतरे। रनवे पर मिग-21 के हमले के निशान अभी भी मौजूद थे। वहां इन लोगों का स्वागत करने वालों में सबसे पहले मेजर जनरल (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बने) जेएफआर जैकब थे, चीफ ऑफ स्टाफ- ईस्टर्न कमांड, जो कि पहले ही पहुंच गए थे। एके रे की बेटी ने संस्मरणों के जरिए जो पाकिस्तानी सेना के सरेंडर की बात उनकी जुबानी बयां की है, उसके मुताबिक वह वहां पर एनडीसी (नेशनल डिफेंस कॉलेज) में अपने कोर्समेट रहे मेजर जनरल गंधर्व नागरा को देखकर वे बहुत खुश थे।

बांग्लादेश के एयरफोर्स चीफ के पास यूनिफॉर्म भी नहीं था
इसके बाद पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी की एंट्री होती है। वह अच्छे से आयरन की हुई यूनिफॉर्म पहने हुए थे और इत्र की खुशबू हवा में घोल रहे थे। ये लोग उन्हीं की कार में बैठे और रमना मैदान की ओर निकल पड़े। वहां पर एक साधारण सा टेबल और कुछ कुर्सियां रखी हुई थीं। लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा सरेंडर के बॉन्ड डॉक्यूमेंट के साथ पहुंचे थे। थोड़ी सी समस्या थी कि बांग्लादेश का प्रतिनिधित्व कौन करेगा। तीनों बटालियन के कमांडर- लेफ्टिनेंट कर्नल शफिउल्ला, खालिद मुशर्रफ और जिया-उर-रहमान ऐसी लोकेशन पर थे, कि उन्हें समय पर नहीं लाया जा सकता था। इसलिए विकल्प एक ही बचे थे। नए-नए बने बांग्लादेश एयर फोर्स के ग्रुप कैप्टन एके खोंडकर, जो कि इसके चीफ थे और मुजीबनगर में मौजूद थे। उनका यूनिफॉर्म तैयार नहीं था, इसलिए सामान्य कपड़ों में ही हमारे बीच आ गए।

भीड़ से कोई बोला- वही है.....नियाजी!!
रे के मुताबाकि मैदान में हमारे सिर्फ करीब 300 जवान थे (हालांकि, ढाका में 3,000 के करीब पाकिस्तान सैनिक थे) और वहां पर कुछ हजार लोगों की भीड़ तमाशबीन की तरह मौजूद थी, जिन्हें पता नहीं था कि वहां क्या होने वाला है। नियाजी ने सरेंडर दस्तावेज पर दस्तखत किए, हथियार नीचे डाल दिया, अपनी बेल्ट उतारी और बुरी तरह से रोने लगे। यह वही शख्स था, जिसके बारे में एक अमेरिकी महिला पत्रकार ने कराची से लिखा था, 'जब टाइगर नियाजी टैंक दौड़ाएगा, तो भारतीय अपनी जान बचाने के लिए भागेंगे।' तभी भीड़ से कोई चिल्ला पड़ा, 'वही है...#*#*#* नियाजी, ' और भीड़ उत्तेजित होने लगती है।

तो भीड़ जनरल नियाजी की लिंचिंग कर देती...
रे ने आगे जो कहानी बयां की है उसके अनुसार- नागरा, मैं और एक दर्जन दूसरे लोगों ने नियाजी के चारों और मानव श्रृंखला बनाई। नागरा ने उन्हें जीप में डाला और बिजली की रफ्तार से कैंट की ओर भागे। हमें नियाजी को बचाना था; वह अब युद्धबंदी थे। हमने वह नहीं किया होता जो किया, भीड़ नाजी की पीट-पीटकर जान ले लेती। मैं बेगम मुजीब से शिष्टाचार मुलाकात के लिए रुक गया। शेख हसीन भी वहीं थीं। सरेंडर के बाद ऐसा माहौल था कि कुछ भी बात करने में दिक्कत हो रही थी। उस क्षण को हर कोई जी लेना चाहता था। रुक-रुककर राइफल से फायरिंग की आवाजें आ रही थीं, यह जीत का उल्लास था। युद्ध में जीत का शंखनाद हो रहा था।
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