हिंदुओं और मुसलमानों ने जब दंगा करने के लिए मिलाया था हाथ

प्रिंस ऑफ वेल्स
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प्रिंस ऑफ वेल्स

आज से ठीक 100 साल पहले ग़ुलाम भारत के बॉम्बे (अब मुंबई) में एक ऐसा दंगा हुआ, जिसे भारतीय इतिहास के सबसे अलग तरह के दंगों में से एक माना गया.

इस दंगे में हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ने के बजाय एक साथ मिलकर लड़े थे. वहीं इनके विरोध में दूसरे समूह खड़े थे. इतिहासकार दिनयार पटेल आज के भारत को उस घटना से मिले सबक़ के बारे में बताते हैं.

बॉम्बे का ये दंगा नवंबर 1921 में हुआ. प्रिंस ऑफ वेल्स दंगे के नाम से भी जाने जानेवाले इस दंगे को वैसे अब भुला दिया गया है. पर आज जैसे बंटे हुए वक़्त में धार्मिक असहिष्णुता और बहुसंख्यकवाद को लेकर यह दंगा देश को कई अहम सबक़ देता है.

बॉम्बे दंगा
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बॉम्बे दंगा

असहयोग आंदोलन के समय हुआ ये दंगा

हिंसा की उन घटनाओं में आज़ादी की लड़ाई के एक हीरो, भावी ब्रिटिश सम्राट और पतनशील तुर्क सुल्तान कहीं न कहीं शामिल थे. साथ ही कई विचारधाराओं और लक्ष्यों, जैसे: स्वराज, स्वदेशी (आर्थिक आत्मनिर्भरता), बहिष्कार और पैन-इस्लामिज़्म को भी इसकी वजह बताया गया.

ब्रिटेन के प्रिंस ऑफ वेल्स (एडवर्ड आठवें) नवंबर 1921 में बहुत ख़राब वक़्त पर भारत के अपने साम्राज्य के शाही दौरे पर आए थे. देश में उन दिनों महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन चरम पर था. ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन के लिए वह आंदोलन 1857 के विद्रोह के बाद सबसे बड़ा ख़तरा था.

"हिंदू-मुस्लिम एकता" की वक़ालत करते हुए गांधी भारत के मुसलमानों के नेतृत्व में लड़े जा रहे ख़िलाफ़त आंदोलन में शामिल हो गए थे. इस आंदोलन के समर्थकों की चिंता थी कि प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य की हार के बाद ब्रिटेन वहां के सुल्तान को उनके पद से हटा देगा. असल में ये लोग सुल्तान को इस्लाम का वैध ख़लीफ़ा मानते थे.

सांप्रदायिक एकता के उस अनूठे दौर में हिंदुओं और मुसलमानों की एकता हो गई थी. और उस एकता ने बाक़ी अल्पसंख्यक समुदायों जैसे- ईसाई, सिख, पारसी और यहूदी के मन में बहुसंख्यक समुदायों के वर्चस्व को लेकर भय का भाव बिठा पैदा कर दिया था.

हालांकि गांधी ने कहा कि बाक़ी अल्पसंख्यक समुदायों को इससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं. उन्होंने घोषणा की, "हिंदू-मुस्लिम समझौते का मतलब ये नहीं कि बड़े समुदाय छोटे समुदायों पर हावी हो जाएंगे."

प्रिंस ऑफ वेल्स भारत के दौरे पर थे

उधर प्रिंस ऑफ वेल्स ने बिना ज़्यादा सोचे उम्मीद जताई थी कि उनकी उस यात्रा से लोगों में वफ़ादारी के भाव बढ़ेंगे और गांधी का आंदोलन असरहीन हो जाएगा. इसके जवाब में, कांग्रेस ने ब्रिटेन के आर्थिक साम्राज्यवाद के प्रतीक बन चुके विदेशी कपड़ों की होली जलाकर और हड़ताल करके बॉम्बे में प्रिंस का स्वागत करने का निश्चय किया.

लेकिन 17 नवंबर 1921 की सुबह बॉम्बे निवासियों की एक बड़ी तादाद ने इस हड़ताल का विरोध करते हुए जहाज से उतर रहे प्रिंस के स्वागत समारोह में भाग लिया. इन शुभचिंतकों में कई पारसी, यहूदी और एंग्लो-इंडियन थे.

अहिंसक बने रहने के गांधी के निर्देश के बावजूद, कांग्रेस पार्टी और ख़िलाफ़त आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने क्रोध भरी प्रतिक्रिया दी. बाद के दिनों में भारत की पहली महिला फ़ोटो जर्नलिस्ट बनीं होमाई व्यारावाला तब 8 साल की उम्र में उन घटनाओं की एक गवाह बनी थीं.

जब 2008 में मैंने उनका साक्षात्कार लिया तो उन्होंने याद किया कि पारसी स्कूली छात्राओं ने कैसे प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत में गरबा नृत्य किया था. लेकिन कुछ दिन बाद ही उन्हें बॉम्बे की सड़कों पर जबरदस्त हिंसक संघर्ष देखने को मिला. दंगा करने वालों ने सोडा बोतल की गोलियों का घातक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था. उन्होंने पारसियों की शराब दुकानों को निशाना बनाते हुए उन पर पथराव किए और दुकानें जलाने की धमकी दी.

दंगों के हालात को बयान करता एक पोस्टर
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दंगों के हालात को बयान करता एक पोस्टर

पारसी और ईसाई बने निशाना

उससे पहले गांधी ने असहयोग आंदोलन में शराबबंदी को भी शामिल करने की बहुत कोशिश की थी. उन्होंने शराब के व्यापार पर असर रखने वाले पारसी समुदाय से आग्रह किया था कि अपनी मर्जी से वे शराब दुकानें बंद कर दें.

हिंसा ने बॉम्बे को हिलाकर रख दिया. हिंदू और मुस्लिम समुदाय के दंगाइयों ने पारसियों के आर्थिक प्रभुत्व और राष्ट्रवादी राजनीति के उनके प्रतिरोध के प्रतीक शराब की दुकानों को जमकर निशाना बनाया. उन्होंने भूतल पर खुले शराब की दुकान वाले पारसियों के एक आवासीय भवन को जलाने की धमकी दी. और उन्हें तब बख़्शा जब दुकानदार ने शराब के स्टॉक को पास के एक नाले में बहा दिया.

हालांकि पारसी और एंग्लो-इंडियन लोग भी केवल निर्दोष और पीड़ित नहीं थे. उनमें से कइयों ने लाठी या बांस और बंदूक लेकर हिंसा में शामिल हो गए. उन्होंने खादी कपड़े पहने हुए लोगों पर हमले किए और "गांधी टोपी मुर्दाबाद" के नारे लगाए. कांग्रेस से जुड़े पारसी या ईसाई लोग दोनों पक्षों के निशाने पर आ सकते थे.

इन हिंसक वारदातों पर गांधी ने तेज़ी से प्रतिक्रिया व्यक्त की और विभिन्न समुदायों के नेताओं को शांति क़ायम करने के लिए एक साथ लेकर आए.

अनशन पर बैठे गांधी
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अनशन पर बैठे गांधी

गांधी का पहला अनशन

इन सांप्रदायिक दंगों के ख़िलाफ़ 19 नवंबर को उन्होंने अपना सबसे पहला अनशन शुरू किया. उन्होंने निश्चय जताया कि ये हिंसा जब तक बंद नहीं होती तब तक वो कुछ नहीं खाएंगे-पीएंगे. और उनकी इस रणनीति ने अपना असर दिखाया. 22 नवंबर तक उनके आसपास विभिन्न समुदायों के लोग उनसे उपवास तोड़ने का अनुरोध कर रहे थे.

लेकिन प्रिंस ऑफ वेल्स के दंगों ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया. उन्होंने एलान किया, "हमने स्वराज का स्वाद चख लिया है." उन्हें कड़े मन से माना कि इस दंगे ने बहुसंख्यकों के हिंसक वर्चस्व को लेकर छोटे अल्पसंख्यक समूहों में भय की भावना को सही ठहराया है. इसलिए जैसे ही बॉम्बे इस हिंसा से उबरी, गांधी ने उन अल्पसंख्यकों का भरोसा जीतने के लिए तेजी से काम किया.

उन्होंने कांग्रेस और ख़िलाफ़त के कार्यकर्ताओं को अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर ज़ोर देने के निर्देश दिया और नुक़सान को भरने के काम में जुट गए. गांधी ने एलान किया कि बहुसंख्यक समुदायों पर अल्पसंख्यक समुदायों के हितों को सुरक्षित रखने की अनिवार्य ज़िम्मेदारी है. उन्होंने बैठकों और कांग्रेस के प्रकाशनों में अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों को अहम राजनीतिक मौक़े दिए.

दंगे पर एक अख़बार की ख़बर
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दंगे पर एक अख़बार की ख़बर

बाद में सभी धर्मों की एकता पर ज़ोर

सबसे उल्लेखनीय बात ये हुई कि गांधी ने ''हिंदू-मुस्लिम एकता'' के नारे को "हिंदू-मुस्लिम-सिख-पारसी-ईसाई-यहूदी एकता" से बदल दिया. हालांकि ये एक बोझिल नारा था लेकिन इसका असर हुआ. इसने छोटे अल्पसंख्यक तबक़ों को ये समझाने में मदद दी कि आज़ाद भारत में उन्हें जगह मिलेगी.

इस दंगे में कम से कम 58 लोग मारे गए. वहीं बॉम्बे की छह शराब दुकानों में से एक पर हमला हुआ. प्रिंस ऑफ वेल्स के लिए ये दंगे उनके दौरे की अशुभ शुरुआत थी. भारत में कई जगह उनका स्वागत हमलों या हत्या करने की धमकियों से हुआ.

लेकिन गांधी की अडिग कूटनीति के चलते ही इस दंगे को अब भुला दिया गया. उन्होंने यह तय किया कि इन दंगों से बॉम्बे हमेशा के लिए घायल न हो जाए. और ऐसा करके वो बहुसंख्यकवाद का भय दूर करने में सफल रहे.

एक अख़बार की सुर्ख़ी
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एक अख़बार की सुर्ख़ी

इस दंगे से हमें आज क्या सीखना चाहिए?

ये चीज़ आज के भारत के लिए एक सबक है. प्रिंस ऑफ वेल्स के दंगों ने बताया कि सांप्रदायिक हिंसा काफ़ी हद तक राजनीति की उपज है. ये पुराने और न पाटे जा सकने वाले धार्मिक मतभेदों के परिणाम नहीं हैं.

1921 के राजनीतिक हालात ने हिंदुओं और मुसलमानों को दूसरे संप्रदायों के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ने को प्रेरित किया. लेकिन कांग्रेस-ख़िलाफ़त गठबंधन के टूटने के कुछ साल बाद, हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के ख़िलाफ़ कहीं बड़ी हिंसक झड़पें करने लगे.

उस घटना से एक और सीख मिलती है. वो ये कि बहुसंख्यकवाद बड़ी चंचल और बोझिल चीज़ है. ये कैसे बदल जाए इसका अनुमान नहीं लगा सकते.

शायद इसीलिए गांधी ने अल्पसंख्यकों के बहुत छोटे तबक़े को भी सहन करने पर ज़ोर देने के बजाय बहुसंख्यकवाद को दूर करने के लिए लंबी लड़ाई की.

गांधी ने 100 साल पहले एक चेतावनी दी थी: यदि आज बहुसंख्यक दूसरों पर अत्याचार करने के लिए एकजुट हो जाता है, तो "कपट या झूठी धार्मिकता के दबाव में ये एकता एक दिन टूट जाएगी."

(हाल में दादाभाई नौरोजी की जीवनी लिखने वाले दिनयार पटेल एक लेखक हैं.)

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