चायनीति: जब दरवाजे पर आई इंदिरा गांधी को चाय पिलाने से कर दिया इनकार

कभी चाय बेचने वाले नरेन्द्र मोदी एक पुराने ट्वीट को लेकर चर्चा में हैं। वे अपनी पॉलिटिकल ब्रांडिंग के लिए चाय का तब से इस्तेमाल कर रहे हैं जब प्रधानमंत्री भी नहीं बने थे। चाय केवल चाय नहीं। जैसे इसके कई फ्लेवर हैं वैसे इसके कई रूप भी हैं। एक चाय की प्याली से सुबह की शुरुआत होती है। लेकिन अगर वही चाय की प्याली सियासी हो तो अक्सर उसमें तूफान भी उठ जाते हैं। चाय की प्याली में तूफान का मतलब बात का बतंगड़। राजनीति में चाय के अजब-गजब किस्से हैं। एक बार तो एक 'चायवाले' ने इंदिरा गांधी को चाय पिलाने से ही इंकार कर दिया था। यहां तक कि उसने पानी तक के लिए नहीं पूछा था। एक दफा तो चाय की प्याली में ऐसा तूफान उठा कि केन्द्र की सरकार ही गिर गयी।

जब थकी हुई इंदिरा गांधी को हुई चाय की तलब

जब थकी हुई इंदिरा गांधी को हुई चाय की तलब

बात 1978 की है। असम में विधानसभा का चुनाव था। इंदिरा गांधी लोकसभा चुनाव हार कर राजनीतिक हाशिये पर चली गयीं थीं। इमरजेंसी के अत्याचारों के कारण उनके खिलाफ जनता में गुस्सा था। अधिकतर लोग इंदिरा गांधी से परहेज करने लगे थे। लेकिन दूसरी तरफ इंदिरा गांधी अपनी राजनीति की बिखरी हुई पारी को फिर से जमाने में लगी थीं। वे असम में कांग्रेस आई को जीत दिलाने के ख्याल से चुनाव प्रचार के लिए गयीं थीं। उनके साथ प्रणब मुखर्जी भी थे। उन्होंने राष्ट्रपति रहते 2016 में ये किस्सा सुनाया था। एक दिन चुनाव प्रचार में भागदौड़ से इंदिरा गांधी काफी थक गयीं थीं। उनकी इच्छा चाय पीने की हुई। उन्होंने प्रणब मुखर्जी को चाय़ की तलब के बारे में बताया। उस समय उनका काफिला एक छोटे से गांव में था। आसपास कोई चाय की दुकान नहीं थी। कुछ दूर जाने पर एक छोटी सी चाय की दुकान मिली। लेकिन वहां धूल और गंदगी देख कर प्रणब मुखर्जी की हिम्मत नहीं हुई वे इंदिरा गांधी को चाय पीने के लिए कहें। कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री की इच्छा का सवाल था।

जब इंदिरा गांधी को न चाय मिली न पानी

जब इंदिरा गांधी को न चाय मिली न पानी

प्रणब मुखर्जी सोच में पड़ गये कि वे अपनी नेता को कैसे चाय पिलाएं ? पूर्व प्रधानमंत्री यहां-वहां, जैसे -तैसे तो चाय नहीं पी सकती थीं। तब उन्हें ख्याल आया कि नजदीक में ही एक चाय बागान का मालिक रहता है जो कांग्रेस का समर्थक है। प्रणब मुखर्जी उसे व्यक्तिगत रूप से जानते थे। वह कई बार उनसे मिला भी था। चाय बागान के मालिक के यहां जाएंगे तो सबसे अच्छी चाय भी मिल जाएगी। उन्होंने कांग्रेस के किसी नेता से पूछ कर चायबागान मालिक के घर का पता मालूम किया। उनकी कारों का काफिला बागान मालिक के बंगले पर पहुंचा। लेकिन चायबागान मालिक को पहले ही इस बात की जानकारी मिल गयी थी। उसने अपने बंगले का दरवाजा बंद कर लिया था। प्रणब मुखर्जी ने कई बार दरबान को कहा। दरवाजा खटखटाया। लेकिन वह बाहर नहीं निकला। इस असभ्यता को देख कर प्रणब मुखर्जी हैरान रह गये। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि इंदिरा गांधी के सामने ऐसी तौहीन होगी। चाय की कौन कहे, थकी-मांदी इंदिरा गांधी को एक ग्लास पानी भी नसीब नहीं हुआ। सभी को यूं ही वापस लौटना पड़ा। बाद में उस चाय बागान मालिक ने कांग्रेस के नेताओं का बताया था कि अगर उसे कोई इंदिरा गांधी के साथ देख लेता तो वह मुसीबत में फंस जाता। उसे डर था कि इंदिरा समर्थक होने के आरोप में उसे प्रताड़ित किया जा सकता था। 1978 वह दौर था जब इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों पर कानून का शिंकजा जोर से कसा हुआ था। कांग्रेस का कहना था कि जनता सरकार राजनीतिक बदले के तहत ये कार्रवाई कर रही है।

जब चाय के प्याली में उठे तूफान से गिर गयी सरकार

जब चाय के प्याली में उठे तूफान से गिर गयी सरकार

1991 में चाय की प्याली में ऐसा तूफान उठा कि चंद्रशेखर सरकार ही गिर गयी थी। भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद वीपी सिंह की सरकार गिर गयी थी। कांग्रेस के सहयोग से चंद्रशेखर ने नयी सरकार बनायी। कांग्रेस ने सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। मार्च 1991 में राजीव गांधी के निवास, 10 जनपथ के बाहर हरियाणा के दो पुलिसकर्मी चाय पीते हुए मिले। हरियाणा में उस समय ओमप्रकाश चौटाला की सरकार थी। देवीलाल और उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला चंद्रशेखर के साथ थे। तब कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के इशारे पर हरियाणा की पुलिस राजीव गांधी की जासूसी कर रही है। पुलिस वाले अगर चाय पीते हुए नहीं मिलते तो शायद ये हंगामा खड़ा नहीं होता। नाराज राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया। तब इस बात की चर्चा उड़ी थी कि ओमप्रकाश चौटाला के भाई रंजीत सिंह ने कांग्रेस को इस जासूसी का भेद बता दिया था। कहा जाता है रंजीत सिंह इस बात से नाराज थे कि उनके पिता देवीलाल ने उनके बड़े भाई ओमप्रकाश चौटाला को क्यों अपना उत्तराधिकारी बना दिया। राजीव गांधी ने जासूसी विवाद को इतना तूल दिया कि आखिरकार चंद्रशेखर सरकार गिर गयी। यानी चाय ने राजनीति में बड़े- बड़े गुल खिलाये हैं।

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