नज़रिया: तीन तलाक़ पर फ़ैसला जो भी हो, नज़ीर कायम होगी

तीन तलाक़ के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई शुरू हो गई है, फ़ैसले पर टिकी सबकी निगाहें.

मुसलमान
Getty Images
मुसलमान

सुप्रीम कोर्ट के किसी भी फ़ैसले के बारे में कुछ भी कहते हुए ज़रा डर ही लगता है, कहीं अनजाने में कुछ ऊंच नीच ना हो जाए.

आजकल गर्मी बहुत ज़्यादा है और इसी हफ़्ते उच्चतम न्यायालय ने कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस करनन और फ़रार कारोबारी विजय माल्या को अदालत की अवमानना का मुज़रिम क़रार दिया है.

जस्टिस करननन को जेल की सज़ा सुनाई गई है जबकि माल्या को अभी सज़ा सुनाई जानी बाक़ी है.

इसलिए ज़रा एहतियात. लेकिन रहा भी नहीं जाता. क्योंकि मसला फौरी तीन तलाक़ का है. अदालत का जो भी फ़ैसला होगा, उससे भारत में हर मुसलमान की ज़िंदगी सीधे तौर पर प्रभावित होगी.

फूलवती के मुकदमे ने कैसे खोला 'तीन तलाक़' का पिटारा?

तीन तलाक़ पर सुनवाई कर रहे ये 'पंच परमेश्वर'

या तो मुसलमान मर्द पहले की तरह आसानी से तलाक़ देते रहेंगे या फिर हर काम को आसान बनाने के इस डिज़िटल दौर में तलाक़, 'लाल फ़ीताशाही' का शिकार हो जाएगी.

लेकिन ये संजीदा मसला है और बात बराबरी की है. औरतों और मर्दों के अधिकार बराबर हैं या नहीं और होने चाहिए या नहीं, या ये विवाद अपने धर्म पर अमल करने की आज़ादी के दायरे में आता है?

दोनों की ही गारंटी भारतीय संविधान में दी गई है.

संविधान की गारंटी

बात ज़रा पेचीदा भी है और विवादास्पद भी, अदालत में संविधान का जिक्र तो होगा ही, लेकिन साथ ही माननीय न्यायाधीश क़ुरान और हदीस की तफ़्सील भी सुनेंगे.

और जितना इस फ़ैसले को याद रखा जाएगा, शायद उतना ही फ़ैसला सुनाने वाली संवैधानिक बेंच को भी. जिसमें पांच सीनियर न्यायाधीश शामिल हैं और पांचों के मजहब अलग हैं.

तलाक़ के मसले तो कई बार अदालत में पहुंचे होंगे लेकिन इसकी क्या संभावना है कि दुनिया की किसी भी अदालत में कभी कोई ऐसी बेंच बनाई गई होगी जिसमें पांच धर्मों की नुमाइंदगी हो. हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर सिख हैं, जस्टिस कुरियन जोसेफ़ ईसाई, जस्टिस रोहिंटन नरीमन पारसी, जस्टिस यूयू ललित हिंदू और जस्टिस अब्दुल नज़ीर मुसलमान हैं.

तलाक़ वाली महिलाएं
Getty Images
तलाक़ वाली महिलाएं

बेंच मुख्य न्यायाधीश बनाते हैं और ये उन्हीं का हक़ है.

अब दो बातें हो सकती हैं, या तो महज संयोग है या उन्होंने सोच समझकर ये फ़ैसला किया है. सुप्रीम कोर्ट में काफी विविधता मौजूद है, इसलिए ये संयोग भी हो सकता है. लेकिन अगर दोनों विकल्प में से एक को चुनना हो तो मैं दूसरे को चुनूंगा.

अब बात ज़रा ख़तरे के दायरे में आ जाती है और मुझे अहसास है कि दिल्ली में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस पार कर रहा है.

इंसाफ़ का होना और दिखना

आगे शायद ये सवाल भी उठेंगे कि क्या भविष्य में बेंचों को गठित करते समय इसी तरह मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जजों के धर्म को भी ध्यान में रखा जाएगा?

माना जाता है कि न्यायाधीशों के अपने निजी विचार, और उनकी पसंद नापसंद, उनके फ़ैसलों को प्रभावित नहीं करते और वे ये शपथ भी लेते हैं कि अपने कर्तव्य का निर्वाहन करते समय वे सिर्फ़ भारतीय संविधान का ख़्याल रखेंगे.

ट्रिपल तलाक़
Getty Images
ट्रिपल तलाक़

लेकिन क़ानून का एक बुनियादी उसूल ये है कि इंसाफ़ सिर्फ़ होना ही नहीं चाहिए बल्कि ऐसा लगना भी चाहिए कि इंसाफ़ किया जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच गर्मियों की छुट्टियों में रोज़ाना इस मामले की सुनवाई करेगी, जस्टिस खेहर जल्दी ही रिटायर होने वाले हैं और ये उनके लंबे करियर का सबसे अहम और मशहूर मामला साबित हो सकता है.

फ़ैसला जो भी हो, एक नज़ीर कायम होगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+