नज़रिया: परेश रावल ने जो कहा वो मामूली बात नहीं है

परेश रावल का मक़सद जितना अपना क्रोध या क्षोभ व्यक्त करना न था, उतना मानवाधिकार विरोधी वातावरण बनाना था.

परेश रावल
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"अरुंधति रॉय को सेना की गाड़ी के आगे बाँध देना चाहिए बजाय पत्थर चलाने वालों के." क्या परेश रावल ने ग़ुस्से में यह वाक्य कह दिया? लेकिन ग़ुस्सा किस चीज़ पर? क्या कल या परसों अरुंधति रॉय ने कुछ कह दिया है जिसे परेश रावल बर्दाश्त न कर सके?

दरअसल, पाकिस्तानी मीडिया ने बताया कि अरुंधति रॉय ने हाल में श्रीनगर में एक जगह यह कहा है कि सेना की तादाद सात लाख से बढ़ाकर सत्तर लाख करके भी भारत घाटी में अपना मक़सद पूरा नहीं कर सकता. लेकिन वे एक अरसे से वहाँ गई भी नहीं हैं, यह उनके क़रीबी बताते हैं. फिर भी यह ख़बर काफ़ी थी कि परेश रावल का क्रोध का बाँध टूट जाए.

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परेश रावल एक अभिनेता हैं और नाटकीय ढंग से उन्होंने क्रोध व्यक्त किया. वे चाहें तो कह सकते हैं कि यह सिर्फ़ रूपक था, अरुंधति रॉय का अर्थ व्यक्ति अरुंधति नहीं, हरेक मानवाधिकार कार्यकर्ता है, या वह जो कश्मीर में भारतीय सेना की कार्रवाई की किसी भी तरह आलोचना करता है.

लेकिन रावल की बात में कुछ और दिक़्क़तें हैं. मसलन, महीने भर पहले कश्मीर में मेजर गोगोई ने जिस शख़्स को अपनी जीप के आगे बाँध कर कई किलोमीटर घुमाया, वह पत्थर चलाने वालों में न था.

अरूंधति की जगह सागरिका ?

फ़ारूक़ अहमद डार के साथ जो सलूक सेना ने किया उससे यही साबित हुआ कि भारत कश्मीरियों में फ़र्क़ नहीं करता और कश्मीरी होना भर भारतीय सेना की नज़र में एक तरह का गुनाह है.

लेकिन हम रावल के सुझाव पर बात कर रहे हैं. अगर वे रॉय पर ही नाराज़ थे तो फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ये क्यों कहा कि रॉय की जगह सागारिका घोष को भी लिया जा सकता है?

इसी से मालूम होता है कि यह अरुंधति के ख़िलाफ़ सहज क्रोध से अधिक था, इसका मक़सद चतुराई से क्रोध का वातावरण पैदा करना था. समाज को क्रोध का इंजेक्शन देना था. यह इसलिए कि यह इस तरह का पहला बयान न था. अरुंधति रॉय के बारे में रावल ने ये भी कहा कि उनका बर्थ सर्टिफ़िकेट दरअसल मैटरनिटी वार्ड से दिया गया एक माफ़ीनामा है.

परेश रावल का मक़सद जितना क्रोध व्यक्त करना था, उससे अधिक मानवाधिकार विरोधी वातावरण बनाना था, यह इससे ज़ाहिर हो गया कि उनके बयान का मक़सद पूरा हो गया है क्योंकि रावल के बयान के बाद सोशल मीडिया पर ढेर सारे हिंसक सुझाव आए, मसलन एक ने अरुंधति रॉय को अपनी गाड़ी के पीछे घसीटने का इरादा ज़ाहिर किया.

क्या इसे नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए? वैसे ही जैसे पिछले तीन-चार वर्षों से आ रहे बयानों पर ध्यान न देने की सलाह दी जाती है? मसलन, "जो भारत माता की जय न बोले उसे पाकिस्तान भेज देना चाहिए" या "बाबर की संतान का एक स्थान- पाकिस्तान या क़ब्रिस्तान". या यह कि "शरणार्थी कैम्पों में हम पांच हमारे पचीस की स्कीम नहीं चलने देंगे" या "भारत में रहना है तो वंदेमातरम् कहना होगा". अक्सर सलाह दी जाती है कि ये बयान सिरफिरों के हैं, इन पर वक़्त और ऊर्जा न बर्बाद की जाए.

अरुंधति राय
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भारत में रहना है तो

लेकिन ऐसे बयान देने वाले लोग प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक बन चुके हैं. और इन बयानों का मक़सद सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालना नहीं, समाज में क्रोध और हिंसा फैलाना है.

परेश रावल अभिनेता हैं और भारतीय जनता पार्टी के सांसद भी. वे सांसद को मिलने वाले विशेषाधिकार के सहारे ख़ुद को सुरक्षित रखते हैं. अरुंधति रॉय हों या सागारिका घोष या दूसरे मानवाधिकार कार्यकर्ता वे साधारण असुरक्षित नागरिक हैं. उनके ख़िलाफ़ भीड़ भड़काई जा सकती है और उसे उन पर हमला करने को उकसाया जा सकता है.

नामुमकिन है कि परेश रावल को यह न मालूम हो कि उन्होंने जो कहा है वो एक तरह की हिंसा को संगठित करना है. मालूम था तभी तो अपने बयान की आलोचना होने पर उन्होंने पूरी ढिठाई साथ कहा कि रॉय क्यों, हमारे पास बड़ी वेरायटी है जिसके साथ यह सलूक किया जा सकता है.

रावल का यह बयान तब आया है जब सोशल मीडिया के ज़रिए फैलने वाले सन्देश के चलते झारखंड में भीड़ ने सात लोगों को पीट-पीट कर मार डाला है. यानी सोशल मीडिया, जो कि आभासी है, वास्तविक हाड़-मांस वाली ख़ूनी भीड़ पैदा कर सकता है. यही मुज़्ज़फ़्फ़रनगर में देखा गया था और यही असम में. इसलिए यह कोई कल्पना नहीं है कि रावल के बयान से अरुंधति रॉय या सागारिका घोष पर हमला हो जाए.

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परेश रावल को ख़ूब मालूम है कि न तो अरुंधति और न सागारिका उन पर मुक़दमा दायर करेंगी, हालाँकि जो उन्होंने किया है वह क़ानूनन जुर्म के दायरे में आ सकता है, हिंसा भड़काने के लिए आइपीसी में धारा 295A का प्रावधान है.

हिंसा और फूहड़पन का दौर

लेकिन बात इससे अधिक गंभीर है. वह यह कि परेश रावल को इसका इत्मीनान है कि इस क़िस्म का हिंसक और असभ्य बयान देकर भी उनका 'सभ्य समाज' में स्वागत होता ही रहेगा. अधिक चिंता का विषय यह है कि हिंसा और फूहड़पन कब से हमारे लिए सह्य और सभ्य हो गया?

परेश रावल के बयान के पहले कांग्रेस के नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का लेख छपा जिसमें उन्होंने फ़ारूक़ डार को जीप के आगे बांधने वाले अफ़सर को फ़ौज का ख़ास इनाम देने की मांग की. इतना ही नहीं, उन्होंने लगभग आंख के बदले आंख की नीति की वकालत की. उस लेख में उन्होंने प्रकारांतर से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की खिल्ली भी उड़ाई. भरसक परेश रावल को मालूम है कि उनके समर्थक पुराने संस्कारी महाराजा तक हो सकते हैं.

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परेश रावल के ट्वीट के साथ ही फ़ारूक़ अहमद डार को अपनी गाड़ी के आगे बांधकर गाँव गाँव घुमाने वाले अफ़सर को पुरस्कृत किए जाने की ख़बर भी आई है. इसके मायने यही हैं कि समाज के और राज्य के ताक़तवर लोगों ने तय कर लिया है कि शिष्टता, संवैधानिक मूल्य और मानवीय संवेदना अब गुज़रे ज़माने की बातें हो चुकी हैं.

परेश रावल इसी वजह से ऐसा बयान दे पाए लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम इसे भी नज़रअंदाज़ कर दें. जैसे घृणा और हिंसा रोज़ाना संगठित की जाती हैं और फिर हमारा स्वभाव बन जाती हैं उसी तरह घृणा और हिंसा की हर वारदात या हरकत का विरोध भी किया ही जाना चाहिए. वही सभ्यता को ज़िंदा रखेगी.

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