क्या है महिला आरक्षण बिल, कांग्रेस से बीजेपी के शासन में अब तक क्या-क्या हुआ? यहां समझें सबकुछ
देश में महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में पेश कर दिया गया है।केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इसे सदन के पटल पर रखा और पेश किया। वहीं, सत्ता पक्ष और विपक्ष, खासकर कांग्रेस इसका क्रेडिट लेने के लिए बयानबाजी करती नजर आ रही है। सोनिया गांधी ने साफ कहा है कि यह तो हमारा अपना बिल है। वहीं सत्ता पक्ष के नेता इसका क्रेडिट पीएम मोदी को देते नजर आ रहे हैं। तो चलिए, आज हम आपलोगों को बताएंगे कि आखिर क्या है महिला आरक्षण बिल? कांग्रेस से बीजेपी के शासन में अब तक क्या-क्या हुआ...
सबसे पहले जानें क्या है महिला आरक्षण बिल?
महिला आरक्षण बिल में महिलाओं के लिए लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में 33 फीसद आरक्षण के लिए एक प्रस्ताव है। हालांकि, इन 33 फीसदी कोटे में से एक तिहाई सीटों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के आरक्षण की भी बात कही गई है।
वहीं इस बिल में यह भी प्रस्ताव दिया गया है कि हर आम चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों को रोटेशन द्वारा आवंटित किया जा सकता है। पिछले साल दिसंबर में सरकार की ओर से पेश किए गए डेटा के मुताबिक, मौजूदा समय में लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 78 है, जो कुल सांसदों की संख्या का 15 फीसदी है। वहीं, राज्यसभा में 14 प्रतिशत महिला सांसद हैं। नीचे पढ़ें पूरी खबर विस्तार से आखिर 1996 से अब तक क्या क्या हुआ...

- महिला आरक्षण बिल 1996 से ही अधर में लटका हुआ है
- एचडी देवगौड़ा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को इस बिल को संसद में पेश किया था
- लेकिन उस समय इसे पारित नहीं किया जा सका था
- इसके बाद फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 1998 में इसे लोकसभा में पेश किया था
- लेकिन कई दलों के विरोध के बाद इसे फिर से पास नहीं कराया जा सका
- वाजपेयी सरकार ने इसे 1999, 2002 और 2003-2004 में भी पारित कराने की कोशिश की। लेकिन विरोध की वजह से यह लटक गया।
- इसके बाद यूपीए सरकार ने 2008 में इस बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया
- वहां यह बिल नौ मार्च 2010 को भारी बहुमत से पारित हुआ और इस दौरान बीजेपी, वाम दलों और जेडीयू ने बिल का समर्थन किया था
- इसके बाद यूपीए सरकार इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं कर पाई क्योंकि फिर इसे लेकर विरोध तेज हो गया
- समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इसका विरोध किया था, इसके बाद सरकार गिरने के डर से कांग्रेस इसे लोकसभा में पेश नहीं कर सकी थी
- साल 2014 में लोकसभा भंग होने के बाद यह बिल अपने आप खत्म हो गया लेकिन राज्यसभा स्थायी सदन है, इसलिए यह बिल अभी भी वहां के लिए मान्य है।












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