क्या है Tibetology, चीन की दुखती रग पर हाथ रखने की सेना की तैयारी

India China Border News:पिछले 10 महीने से पूर्वी लद्दाख (Estern Ladakh) में चीन की वजह से वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। कई जगहों पर भारतीय और चीन के सैनिक कुछ ही दूरी पर आमने-सामने मोर्चे पर तैनात हैं। इस दौरान चीन को उसी की भाषा में सबक सिखाने के लिए भारतीय सेना ने एक और नई रणनीति बनाई है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ वक्त से देखा जा रहा है कि चीन (China) सीमा पर तनाव का माहौल पैदा करने के साथ ही प्रोपेगेंडा युद्ध में भी शामिल है। चीन के इसी प्रोपेगेंडाबाजी का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारतीय सेना (Indian Army) उसकी दुखती रग पर हाथ रखना चाहती है।

चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की तैयारी

चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की तैयारी

भारतीय सेना अब तिब्बत (Tibet) के इतिहास, उसकी संस्कृति और भाषा के अध्ययन के लिए एक प्रस्ताव पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक यह प्रस्ताव एलएसी(LAC) के दोनों ओर और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी चीन के प्रोपेगेंडा का जवाब देने के लिए तैयार किया जा रहा है, इस प्रस्ताव को तिब्बतोलॉजी प्रस्ताव (Tibetology proposal)कहा जा रहा है। इस प्रस्ताव पर पहली बार पिछले साल अक्टूबर में सैन्य कमांडरों के कॉन्फ्रेंस में विचार किया गया था। अब थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे (General MM Naravane) के निर्देशों पर इसपर शिमला (Shimla) स्थित आर्मी ट्रेनिंग कमांड (ARTRAC) विश्लेषण हो रहा है।

सात संस्थानों में तिब्बतोलॉजी पढ़ेंगे सेना के अफसर

सात संस्थानों में तिब्बतोलॉजी पढ़ेंगे सेना के अफसर

इसके लिए आर्मी ट्रेनिंग कमांड (ARTRAC) ने सात संस्थानों की पहचान की है, जहां तिब्बतोलॉजी (Tibetology) में पोस्टग्रैजुएट कोर्स की पढ़ाई होती है, जहां पर सेना के अधिकारी 'स्टडी लीव' पर भेजे जा सकते हैं। यह भी सलाह दी गई है कि इन संस्थानों में सेना के अधिकारियों को तिब्बतोलॉजी पर छोटे से कोर्स (small capsules) के लिए भी भेजा जा सकता है। इसके लिए जिन सात संस्थानों की पहचान की गई है, वे हैं- डिपार्टमेंट ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज (दिल्ली यूनिवर्सिटी), सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर हायर तिब्बतियन स्टडीज (वाराणसी), नव नालंदा महाविहार (राजगीर, बिहार), विश्व भारती (पश्चिम बंगाल), दलाई लामा इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन (बेंगलुरु), नामग्याल इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतोलॉजी (गंगटोक) और सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन कल्चर स्टडीज (दाहुंग, अरुणाचल प्रदेश).

तिब्बत को पढ़कर चीन की चालबाजी समझने की तैयारी

तिब्बत को पढ़कर चीन की चालबाजी समझने की तैयारी

इसकी आवश्यकता पर जोर देते हुए सेना के एक अधिकारी ने कहा है कि 'आर्मी ऑफिसर पाकिस्तान के बारे में काफी कुछ समझते हैं। लेकिन, चीन और चीनियों की मनोवृत्ति को उस तरह से समझने में दिक्कत है। ऐसे अधिकारियों की बेहद कमी है,जो सही में चीन को समझते हैं। तिब्बत के बारे में तो समझना और भी मुश्किल है। इन कमियों को दूर करने की जरूरत है। 'उन्होंने कहा कि ' भाषाई, सांस्कृतिक और बर्ताव के तरीकों के बारे में जान लेने के बाद चुनिंदा अफसरों को पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा की जगह लंबे वक्त केलिए एलएसी पर तैनाती कर दी जाएगी। उनका कहना है कि 'सिर्फ दो साल के लिए मैंडरीन (चीन की भाषा) का कोर्स कर लेने से अधिकारी चीन के एक्सपर्ट नहीं बन जाएंगे।'

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    चीन की दुखती रग है तिब्बत

    चीन की दुखती रग है तिब्बत

    भारत अबतक चीन के खिलाफ 'तिब्बत कार्ड' (Tibet card) खेलने से बचता रहा है, जो कि चीन के लिए हमेशा से एक दुखती रग रहा है। कुछ जानकारों का कहना है कि 1954 में चीन के साथ व्यापार समझौते के दौरान तिब्बत को चीन का क्षेत्र मानकर भारत एक बेहतर मौका गंवा चुका है। लेकिन, अब नजरिया बदल रहा है। पिछले साल अगस्त के अंत में लद्दाख में पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर कैलाश रेंज की चोटियों पर कब्जा करने वाले स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (special frontier force) की वीरता का जिक्र करके भारत ने चीन को उसकी ही भाषा में सावधान करने की कोशिश की है। क्योंकि, यह फोर्स मूल रूप से तिब्बती शरणार्थियों से भर्ती किए जाने वाले जांबाजों से ही गठित की गई है, जिसके बारे में अबतक सार्वजनिक जिक्र भी नहीं किया जाता था। ये सब ऐसे समय में हो रहा है जब तिब्बत को लेकर अमेरिका भी अपनी रणनीति सख्त कर रहा है। एक्सपर्ट भी मानते हैं कि भारत-चीन संबंधों के लिए तिब्बत की ठोस समझ बहुत ही कारगर साबित हो सकती है।

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