जानिए क्या है इंडियन एयरफोर्स के लिए एक राफेल जेट की कीमत
नई दिल्ली। आज इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ) के लिए पांच राफेल जेट फ्रांस से अंबाला पहुंच रहे हैं। आईएएफ ने अपने उन पायलट्स को चुना है जिनके पास फाइटर जेट को उड़ाने का अच्छा-खासा अनुभव है और जो हर मिशन में कारगर हैं। अब से कुछ ही देर बाद राफेल, अंबाला में लैंड कर जाएगा। पिछले दो सालों से जारी घमासान के बाद आईएएफ को आखिर विदेशी जेट हासिल हो रहे हैं। राफेल जेट का आना रणनीतिक तौर पर भारतीय वायुसेना के लिए एक बड़ी विजय है। एक राफेल की कीमत कितनी है यह जानकर पड़ोसी पाकिस्तान के होश उड़ सकते हैं।
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एक राफेल करीब 700 करोड़ का
अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पहली फ्रांस की यात्रा पर गए थे। यहां पर 36 राफेल जेट की डील फाइनल हुई। यह डील करीब 59,000 करोड़ की बताई जा रही है। नवंबर 2016 में तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने लोकसभा को जानकारी दी थी कि एक राफेल एयरक्राफ्ट की कीमत इंटर गर्वनमेंट एग्रीमेंट (आईजीए) के तहत 670 करोड़ रुपए के आसपास है। आईएएफ के लिए जो राफेल, फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट ने तैयार किया है उसे हथियार और दूसरे सिस्टम से लैस किया गया है। राफेल जेट दक्षिण एशिया में अभी तक किसी भी देश की सेना के पास नहीं हैं। इसके आने से भारत की वायुसेना चीन और पाकिस्तान के मुकाबले और ज्यादा ताकवर हो गई है।

राफेल के साथ और कौन से जेट थे रेस में
फ्रांस के साथ सन् 2015 में 36 राफेल की डील भारत ने साइन की थी। भारत के राफेल खरीदने के बाद अब कुछ और देशों ने भी फ्रांस से इसकी मांग की है। अभी तक भारत के अलावा इजिप्ट और कतर की वायुसेनाएं इसका प्रयोग कर रही हैं। सोमवार को राफेल फ्रांस के मेरीनेक से भारत के लिए रवाना हुए थे। राफेल खरीद की शुरुआत आईएएफ की मल्टी रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (एमआरसीए) की जरूरत को पूरा करने के साथ शुरू हुई थी। साल 2007 में 126 एमएमआरसीए के लिए टेंडर निकाले गए थे। इसके बाद एयरफोर्स ने ट्रायल किया और फिर राफेल को चुना। राफेल के साथ रेस में स्वीडन का ग्रिपेन, अमेरिका का एफ-16 और ब्रिटेन का टायफून फाइटर जेट शामिल थे।

पहली डील कैंसिल, फिर हुई नई डील
31 जनवरी 2012 को रक्षा मंत्रालय की तरफ से बताया गया कि रेस में राफेल जीता है और फ्रेंच कंपनी के साथ 126 राफेल के लिए डील हुई है। इसमें से 18 एयरक्राफ्ट को फ्रेंच कंपनी सप्लाई करेगी जबकि 108 हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के लाइसेंस के तहत भारत में ही निर्मित होगी जिसमें डसॉल्ट की तरफ से टेक्नोलॉजी को ट्रांसफर किया जाएगा। तीन वर्षों तक चली बातचीत के बाद जून 2015 में इस डील को खारिज कर दिया गया। इसके बाद अप्रैल 2015 में केंद्र की मोदी सरकार ने 36 राफेल फाइटर्स को खरीदने का फैसला किया।

2011 में राफेल से हारा था गद्दाफी
राफेल को अफगानिस्तान, सीरिया और लीबिया में प्रयोग किया जा चुका है। साल 2011 में जब भारत सरकार कौन सा जेट फाइनल करे, इस पर विचार कर रही थी, उसी समय राफेल लीबिया में मुअम्मार गद्दाफी की सेना को एक के बाद एक करके शिकस्त देता जा रहा था। राफेल पहला फाइटर जेट था जो लीबिया के सिविल वॉर में दाखिल हुआ था। इा सिविल वॉर में राफेल को बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया था। फ्रांस की सेना ने ऑपरेशन हारमाट्टान लॉन्च किया। इस पूरे ऑपरेशन में राफेल फाइटर जेट सहारा के रेगिस्तान के ऊपर उड़ान भर रहे थे। 19 मार्च 2011 को पेरिस में इस पूरे मिलिट्री एक्शन की तैयारी हुई थी। इस मीटिंग के बाद राफेल, लीबिया में दाखिल हुए। राफेल पहले फाइटर जेट्स थे जिन्होंने लीबिया की सेनाओं को निशाना बनाया और चार टैंक्स तबाह कर डाले थे।












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