फोन पर बात करने से लेकर अपनों की सुरक्षित वापसी तक, जानिए रूस-यूक्रेन के बीच पीएम मोदी की भूमिका

नई दिल्ली, 09 मार्च: रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण जंग 14वें दिन में जा पहुंची है। दोनों देशों के बीच बेलारूस में 3 बार शांति वार्ता हो चुकी है, लेकिन तीनों की तीनों बेनतीजा साबित हुई। इस बीच मंगलवार को जहां रूस को चौतरफा घेरते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रूस से तेल, नेचुरल गैस और ऊर्जा के आयातों पर प्रतिबंध लगाने का बड़ा फैसला किया है तो दूसरी तरफ कई बड़ी कंपनियों ने भी रूस से अपना बिजनेस समेट लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध में पीएम मोदी क्या कर रहे हैं तो पढ़िए पूरी खबर।

Russia-Ukraine war

रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद शुरू हुआ यूरोपीय संघर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक नई भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं। सोर्स बेस्ड रिपोर्ट पीएम मोदी को रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की ओर इशारा करती हैं। 24 फरवरी को रूस की तरफ से जंग के ऐलान करने के बाद से पीएम मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ तीन बार टेलीफोन पर बातचीत की और यूक्रेन के वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ दो बार बात की है।

पुतिन और जेलेंस्की के साथ मोदी की टेलीफोनिक बातचीत 'लंबी' और 'विस्तृत' रही है। पुतिन के साथ उनका आखिरी वार्ता 50 मिनट और जेलेंस्की के साथ बीते सोमवार को 35 मिनट तक चली। पीएमओ द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, "प्रधानमंत्री मोदी ने रूस और यूक्रेन के बीच चल रही वार्ता का स्वागत किया और आशा व्यक्त की कि वे संघर्ष को समाप्त कर देंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच सीधी बातचीत से चल रहे शांति प्रयासों में बहुत मदद मिल सकती है।"

मोदी से संकट को हल करने में भूमिका निभाने की मांग की गई है, क्योंकि भारत प्रमुख वैश्विक शक्तियों में से एक देश है जो रूस, यूक्रेन और नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध में सभी तीन हितधारकों के साथ अच्छे कामकाजी संबंध रखता है।

दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत की अपील

पीएम मोदी ने पुतिन और जेलेंस्की को "सीधी बातचीत" करने के लिए कहा है, जिसमें सुझाव दिया गया है कि एक-दूसरे से मिलने से बचने से समस्या और बढ़ जाएगी। इधर यूक्रेन, भारत में अपने दूतावास के जरिए और राजधानी कीव से आधिकारिक बयानों में रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए पुतिन तक "पहुंचने" में मोदी की भूमिका की मांग कर रहा है।

एक दिन पहले पीएम मोदी ने पुतिन और जेलेंस्की के साथ लंबी बातचीत की, यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा ने कहा कि पीएम मोदी, हम उनसे राष्ट्रपति पुतिन से संपर्क करने और उन्हें समझाने के लिए कहते हैं कि यह युद्ध सभी के हित के खिलाफ है।

संघर्षविराम की मांग

मोदी ने अपनी बातचीत में और विदेश मंत्रालय के बयानों के जरिए यूक्रेन में दोनों तरफ से गोलीबारी बंद करने की मांग की है। अपने टेलीफोन कॉल में मोदी ने युद्धविराम की पुतिन की घोषणा और भारतीय नागरिकों सहित फंसे हुए विदेशियों को निकालने के लिए मानवीय गलियारों की स्थापना की सराहना की। बता दें कि युद्ध के बीच ये कॉरिडोर खारकीव, मारियुपोल और सुमी से खुले है।

इधर, भारत ने सुरक्षा परिषद के विचार-विमर्श सहित संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में यूक्रेन में संघर्ष विराम की मांग की है। मोदी ने पुतिन, जेलेंस्की के साथ बातचीत और पोलैंड के राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा के साथ टेलीफोन पर बातचीत में इस रुख को दोहराया। 25 फरवरी को यूएनएससी में पहली विस्तृत ब्रीफिंग में भारत ने प्रत्येक देश की "संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए सम्मान" पर जोर दिया। बाद में मोदी ने रूसी, यूक्रेनी और यूरोपीय नेताओं के साथ अपनी बातचीत में संप्रभुता का सम्मान करने के लिए भारत के रुख को भी दोहराया। विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया है, "प्रधानमंत्री ने पोलैंड के डूडा के साथ अपनी टेलीफोन पर बातचीत में शत्रुता को समाप्त करने और बातचीत की वापसी के लिए लगातार अपील की है। उन्होंने राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने के महत्व पर जोर दिया।"

भारत का रूस को लेकर अपना रुख

भारत के सैन्य क्षेत्र और भू-रणनीति (geo-strategy) में रूस के साथ घनिष्ठ संबंध के लंबे इतिहास को देखते हुए मोदी सरकार का रुख रूस के पड़ोस में नाटो के निरंतर विस्तार पर पुतिन की 'वैध चिंताओं' को रेखांकित करता है। जो साफ इस ओर इशारा करता है कि दोनों देशों के बीच जारी युद्ध में भारत की तटस्थता की आलोचना करने वाले विशेषज्ञों, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा में मतदान से परहेज करने के बावजूद मोदी ने यूक्रेन पर आक्रमण करने के पुतिन के फैसले की (पश्चिम की तरह) या (चीन और पाकिस्तान की तरह) निंदा क्यों नहीं की।

ह्यूमन कॉरिडोर और पाक नागरिक की निकासी

रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में मोदी सरकार ने स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता फंसे हुए भारतीय नागरिकों को वापस लाना है। पुतिन, जेलेंस्की और अन्य यूरोपीय नेताओं के साथ अपने टेलीफोन कॉल में मोदी ने नागरिकों को संघर्ष क्षेत्र से बचाने के लिए एक रास्ता खोजने की आवश्यकता को दोहराया था। मोदी-पुतिन फोन कॉल और रूस द्वारा भारतीयों सहित विदेशियों को निकालने के लिए मानवीय गलियारे स्थापित करने की घोषणा लगभग एक ही समय में हुई। भारत ने यूक्रेन के पड़ोसी देशों से उड़ान भरने वाले 18,000 से अधिक भारतीय नागरिकों को वापस लाया है। इतना ही नहीं कुछ विदेशी नागरिकों को भी भारत ने निकाला है। एक पाकिस्तानी नागरिक, अस्मा शफीक ने मोदी और कीव में भारतीय दूतावास को यूक्रेन से निकालने के लिए धन्यवाद दिया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप जिसमें उन्होंने मोदी को धन्यवाद दिया, खूब शेयर किया जा रहा है।

जानिए क्या है भारत के लिए चुनौतियां

जबकि रूस-यूक्रेन संकट में एक संभावित मध्यस्थ के रूप में भारत की भूमिका सामने आई है, मोदी सरकार के लिए अभी भी गंभीर चुनौतियां हैं, भले ही देश का यु्द्ध में सीधा हिस्सा नहीं है, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतें और गिरता रुपया भारत पर रूस-यूक्रेन युद्ध के पहले से ही दो गंभीर प्रभाव हैं। वहीं सामरिक मोर्चे पर, युद्ध के बाद का कमजोर रूस भारत के लिए एक चुनौती है। इसका मतलब होगा कि रूस की अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए चीन पर अधिक निर्भरता। वैश्विक और क्षेत्रीय पैमाने पर अपेक्षाकृत मजबूत भारत की चुनौतियों को न सिर्फ अपनी उत्तरी सीमाओं पर बल्कि पश्चिम में भी बढ़ाता है। एक मजबूत चीन का मतलब है एक मजबूत पाकिस्तान। यह एक ऐसी स्थिति है जहां सरकार और पीएम मोदी पुतिन और जेलेंस्की को "सीधी बातचीत" के लिए वार्ता मेज पर लाकर रूस-यूक्रेन संघर्ष को हल करने में गहरी दिलचस्पी ले सकते हैं।

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