क्या होता है NPA और कैसे यह देश की विकास रफ्तार पर लगाता है ब्रेक

नई दिल्ली। बैंकिंग सेक्टर में एनपीए यानि नॉन परफॉर्मिंग एसेट हमेशा से चर्चा का विषय बना रहता है, एनपीए के चलते बैंकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल जब बैंक किसी को लोन देता है और वह बैंक को कुछ समय बाद उस लोन पर ब्याज देना और फिर किश्तें देना बंद कर देता है तो बैंक उसे एक निश्चित समय सीमा के बाद एनपीए घोषित कर देता है। साधारण भाषा में कहें तो बैंक का यह पैसा एक तरह से उसके पास से दूर चला जाता है और बैंक के पास उस पैसे का कोई लाभ नहीं मिलता है। नियमानुसार किसी भी लोन की किश्त, मूलधन और ब्याज अगर 90 दिन से अधिक तक बैंक को नहीं मिलता है तो उसे एनपीए में डाल दिया जाता है।

क्या होता है एनपीए

क्या होता है एनपीए

मान लीजिए आपके पास कोई कंपनी है और आपने बैंक से 10 करोड़ रुपए का लोन लिया और बैंक वालों ने आपसे कहा कि आप इस राशि पर 10 फीसदी का ब्याज देते रहिए, हम आपसे वायदा करते हैं कि जबतक आपका बिजनेस बेहतर नहीं चलता है और आप ब्याज समय पर देते रहते हैं तबतक कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन बाद में अगर कंपनी के भीतर किसी भी तरह का विवाद हो जाता है, वह कंपनी अपेक्षा के अनुरूप काम नहीं करती है और 90 दिनों तक ब्याज बैंक को नहीं दिया जाता है तो उस लोन राशि को बैंक एनपीए घोषित कर देता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि एनपीए कितने तरह का होता है और आखिर क्यों बैंक लोन देने से पहले कंपनी के बारे में सही से जानकारी हासिल नहीं करते हैं।

तीन प्रकार के एनपीए

तीन प्रकार के एनपीए

एनपीए मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है, पहला सबस्टैंडर्ड, दूसरा डाउटफुल और तीसरा लॉस यानि हानि वाला। सबस्टैंडर्ड एनपीए के तहत उस राशि को डाला जाता है जिसमे 12 महीने या उससे कम समय तक कोई भी रिटर्न नहीं आता है, डाउटफुल एनपीए में वह लोन आता है जिसमे 12 महीने बाद भी कोई रिटर्न नहीं आता है। जबकि लॉस में उस राशि को डाला जात है जब आरबीआई को यह पता चल जाता है कि यह पैसा लॉस का है और इसे राइट ऑफ नहीं किया जा सकता है।

भारत की स्थिति काफी खराब

भारत की स्थिति काफी खराब

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर कैसे बैंकों से यह चूक होती है, जिसका भुगतान एनपीए के तौर पर उन्हें उठाना पड़ता है। ब्रिक्स देशों के समहूों में भारत सबसे फिसड्डी देश है, जहां 2016 में 10 फीसदी एनपीए था, जोकि कुल 7 लाख करोड़ रुपए था। लेकिन बांद में यह सामने आया कि यह एनपीए 10 फीसदी नहीं बल्कि 80 फीसदी है। दरअसल जब कोई कंपनी अपनी अपेक्षा के प्रतिकूल कंपनी का आंकलन करती और अपने बिजनसे को संभाल नहीं पाती है तो वह लोन वापस देने में विफल हो जाता है, दूसरी स्थिति में जब वैश्विक मंदी आती है तो कोई विशेष सेक्टर उसकी चपेट में आता है तो कंपनी लोन चुकाने में विफल रहती है और तीसरी स्थिति वह होती है जब कंपनी के अंदर किसी तरह का घोटाला हुआ और गलत तरीके से बैंक से लोन लिया गया।

एनपीए से देश और बैंकों पर असर

एनपीए से देश और बैंकों पर असर

एनपीए के चलते बैंकों को मिलने वाला लाभ कम हो जाता है, जिससे सरकार के पास राजस्व कम पहुंचता है, ऐसे में सरकार की निवेश करने की क्षमता में गिरावट आती है और देश के विकास की रफ्तार कम हो जाती है, साथ ही बेरोजगारी की समस्या बढ़ती है। लिहाजा इस स्थिति से निपटने के लिए बैंक अपनी ब्याज दर को बढ़ाता है ताकि वह इस नुकसान की भरपाई कर सके।

सरकार ने क्या कदम उठाया

सरकार ने क्या कदम उठाया

बहरहाल सवाल यह उठता है कि अगर यह स्थिति इतनी खराब है तो इसके लिए सरकार की ओर से क्या कदम उठाया जा रहा है। मोदी सरकार ने 2015 में इंद्रधनुष योजना की शुरुआत की थी, जिसमे बैंकों में बड़े स्तर पर सुधार लाने की योजना थी। इसके तहत सरकार ने 7000 करोड़ रुपए का सहयोग सरकारी बैंकों को दिया ताकि उनकी कार्यक्षमता को बेहतर किया जा सके। साथ ही बैंक बोर्ड ब्यूरों का गठन किया गया जो बैंकों के भीतर काम को बेहतर करने की दिशा में काम करेगी। इसी योजना के तहत स्ट्रेटेजिक डेब्ट रीस्ट्रक्चरिंग यानि एसडीआर का अधिकार बैंकों को दिया गया जिसके तहत बैंक उन कंपनियों का मालिकाना हक अपने पास ले सकती है जो किसी भी स्थिति में अपना लोन वापस नहीं लौटाते हैं।

कैसे आया यह संकट

कैसे आया यह संकट

जिस तरह से वर्ष 2007 में वैश्विक मंदी आई, उस दौर में बैंकों ने इससे निपटने में अहम भूमिका निभाई, ऐसे में बैंकों पर एनपीए की समस्या का पूरा ठीकरा फोड़ना कतई जायज नहीं है। इस मंदी के दौर में जिस तरह से बैंकों ने बड़ी भूमिका निभाई उसके बाद बैंकों को तुरंत सशक्त करने के कदम नहीं उठाए जाने से देश की अर्थव्यस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसकी वजह से कई बड़ी समस्या निकलकर सामने आई जिसमे पहली थी लोन देने से बैंक परहेज करने लगे, दूसरा एनपीए की समस्या का स्थाई समाधान नहीं होने की वजह से कई बड़े प्रोजेक्ट पर ब्रेक लग गया, बैंक इन प्रोजेक्ट्स के लिए और पैसा देने की स्थिति में नहीं थे, जबकि तीसरी असर यह पड़ा कि उद्योगपति कर्ज में डूब गए और नया लोन लेने की स्थिति में नहीं थे।

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