अमित शाह की पश्चिम बंगाल रणनीति पर क्यों उठ रहे चौतरफ़ा सवाल

टीएमसी के बाग़ी नेताओं को थोक भाव में पार्टी में शामिल करने की बढ़ती मुहिम से बीजेपी के स्थानीय नेताओं में असंतोष बढ़ रहा है.
इसके ख़िलाफ़ मुँह खोलने के जुर्म में दो नेताओं सायंतन बसु और अग्निमित्र पाल को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया है.
टीएमसी के बाग़ी नेताओं को शामिल करने पर पार्टी के भीतर लगातार सवाल उठ रहे हैं.
पूछा जा रहा है कि जिन इलाक़ों में पार्टी मज़बूत है वहाँ के नेताओं को क्यों शामिल किया जा रहा है? वहाँ जिन बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ज़मीनी स्तर पर जूझते हुए पार्टी को मज़बूत किया था उनकी अनदेखी क्यों की जा रही है?
बाबुल सुप्रियो की नाराज़गी की वजह से ही बीजेपी नेताओं ने आसनसोल के टीएमसी प्रमुख और पांडवेश्वर के विधायक जितेंद्र तिवारी को लाल झंडी दिखा दी थी और उनको टीमसी में लौटना पड़ा था.
लेकिन बाक़ी नेता बाबुल जितने ताक़तवर नहीं हैं. इसलिए उनकी बातों से प्रदेश और केंद्रीय नेता डिगे नहीं.
Bauls are the perfect reflection of our rich and versatile Bengali culture, best known for their songs and poems to God who dwells within.
— Amit Shah (@AmitShah) December 20, 2020
Thank you Basudeb Das ji for your incredible hospitality, I am truly mesmerised. pic.twitter.com/ofc6gLZPgG
बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच झड़प
बांकुड़ा ज़िले के बिष्णुपुर के बीजेपी सांसद सौमित्र खां की पत्नी सुजाता मंडल खां ने इसी सप्ताह टीएमसी में शामिल होने के बाद आरोप लगाया था कि बीजेपी टीएमसी नेताओं को मलाईदार पद का लालच देकर अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही है.
उनका कहना था, "मौक़ापरस्त और दलबदलुओं को पार्टी में शामिल किया जा रहा है. इससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं में असंतोष तेज़ी से बढ़ रहा है."
इस सप्ताह नए बनाम पुराने के विवाद की वजह से पश्चिम मेदिनीपुर और दुर्गापुर में बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें भी हो चुकी हैं. इलाक़े में कई जगह टीएमसी के बाग़ी नेताओं को बीजेपी में शामिल करने के विरोध में पोस्टर भी लगाए गए थे.
टीएमसी विधायक जितेंद्र तिवारी को पार्टी में शामिल करने का सार्वजनिक तौर पर विरोध करने की वजह से बीजेपी के दो नेताओं-प्रदेश महासचिव सायंतन बसु और और महिला मोर्चा प्रमुख अग्निमित्र पाल को कारण बताओ नोटिस दिया जा चुका है. अब इन दोनों नेताओं ने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

कुछ नेता खुलकर जता रहे हैं विरोध
अगले विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी में शामिल होने वाले टीएमसी नेताओं की कतार लगातार लंबी हो रही है. बीजेपी के ज़मीनी नेता इसके ख़िलाफ़ पार्टी के भीतर और बाहर खुल कर विरोध जताते रहे हैं.
उनको लगता है कि राज्य में बीजेपी की जड़ें जमाने और जान हथेली पर लेकर टीएमसी से मुक़ाबला करने के बाद अब टीएमसी से आने वाले नेताओं को मलाईदार पद सौंपे जाएंगे और टिकटों बँटवारे में भी तरजीह दी जाएगी.
लेकिन पार्टी में बढ़ते असंतोष के बावजूद बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व टीएमसी का घर तोड़ने की रणनीति पर अडिग है. पार्टी में उठने वाले विरोध की आवाज़ों को दबाने के लिए कारण बताओ नोटिस को ही हथियार बनाया जा रहा है. अब तक कुल चार नेताओं को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कारण बताओ नोटिस भेजी जा चुकी है.
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प्रदेश बीजेपी नेतृत्व कारण बताओ नोटिस के साथ असंतुष्टों को कड़ी चेतावनी भी दे रहा है. प्रदेश बीजेपी प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य कहते हैं, "सांगठनिक गोपनीयता, आदर्शों के प्रति दृढ़ भरोसा और नेतृत्व के प्रति निष्ठा किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य होने की प्राथमिक शर्त है.''
प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "पार्टी के पुराने नेता हों या नए, अनुशासन का पालन करना सबके लिए अनिवार्य है. पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाने की स्थिति में कार्रवाई ज़रूर की जाएगी."

लेकिन आसनसोल के टीएमसी नेता जितेंद्र तिवारी को पार्टी में शामिल करने का सबसे मुखर विरोध तो स्थानीय सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो ने किया था.
ऐसे में सिर्फ़ सायंतन और अग्निमित्रा के ख़िलाफ़ ही कार्रवाई क्यों की गई है? इस सवाल पर घोष का कहना था, "बाबुल को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. किसको शामिल करना है और किसको नहीं, इसका फ़ैसला पार्टी ही करेगी, कोई व्यक्ति नहीं."
वैसे, प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, "सायंतन और अग्निमित्रा को कारण बताओ नोटिस भेज कर बाबुल को परोक्ष संदेश दे दिया गया है."
पार्टी में बढ़ते असंतोष पर सार्वजनिक तौर पर भले बीजेपी के नेता कुछ कहने से बच रहे हों, दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के ट्रैक रिकार्ड ने प्रदेश नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ा दी हैं. मिसाल के तौर पर उत्तर बंगाल में नागराकाटा के टीएमसी विधायक सुकरा मुंडा के चुनाव क्षेत्र में बीते लोकसभा चुनावों में वोटों के लिहाज से बीजेपी पहले स्थान पर रही थी.

बीजेपी को कितना फ़ायदा होगा?
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि मुंडा से पार्टी को कितना फायदा होगा? ठीक यही सवाल मालदा ज़िले के गाजोल से टीएमसी विधायक दीपाली विश्वाल को लेकर भी उठ रहा है.
प्रदेश बीजेपी के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "बीते लोकसभा चुनावों के आँकड़ों को ध्यान में रखें तो दीपाली के शामिल होने से पार्टी को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होगा."
पुरुलिया के कांग्रेस विधायक सुदीप मुखर्जी के बीजेपी में शामिल होने के बाद अब पार्टी के स्थानीय नेता दलील दे रहे हैं कि बीते लोकसभा चुनावों में वहां बीजेपी को लगभग 53 फ़ीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस को महज 4.6 फ़ीसदी.
ऐसे में उनके आने से कितना भला होगा? अगर इन नेताओं को शामिल करने से राजनीतिक रूप से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है तो आख़िर बीजेपी तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं को तोड़ने की बदनामी क्यों मोल ले रही है?

इन सवालों पर प्रदेश बीजेपी नेताओं ने मुँह बंद कर रखा है. प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "पार्टी संगठन को मज़बूत करने के लिए ही दूसरे दलों के नेताओं को बीजेपी में शामिल किया जा रहा है."
लेकिन राज्य के ज़्यादातर नेता उनकी इस दलील से सहमत नहीं हैं. उनको अंदेशा है कि इन नेताओं को पार्टी में शामिल करने के बाद बीजेपी के मूल नेता और कार्यकर्ता चुप्पी साध कर बैठ सकते हैं. इससे फ़ायदे के बजाय नुकसान होने का अंदेशा ही ज़्यादा है.
पार्टी-विरोधी गतिविधियों के तहत कार्रवाई के डर से कोई भी नेता सार्वजनिक रूप से कुछ कहने को तैयार नहीं है. एक असंतुष्ट नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "बंगाल बीजेपी में फ़िलहाल केंद्रीय नेतृत्व का शासन चल रहा है. किसको पार्टी में शामिल किया जाएगा और किसे नहीं, इसका फ़ैसला दिल्ली में ही किया जाता है. हमारी राय की कोई अहमियत नहीं है."
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता सौगत राय कहते हैं, "दूसरी राजनीतिक पार्टियों को तोड़ने की इस रणनीति से बीजेपी को फ़ायदा के बजाय नुकसान ही होगा. टीएमसी छोड़ कर बीजेपी में जाने वाले किसी भी नेता को इस बार टिकट मिलने की संभावना नहीं थी.
अब यह लोग बीजेपी में जाकर असंतोष की आग में घी डालने का काम कर रहे हैं." टीएमसी महासचिव और संसदीय कार्य मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं, "बीजेपी दूसरे का घर तोड़ रही है, अब ख़ुद उसके घर में विवाद बढ़ रहा है. दरअसल, अपना कोई संगठन नहीं होने की वजह से ही वह दूसरे दलों के नेताओं के ज़रिए अपने पैर मज़बूत करना चाहती है."

दूसरी ओर, राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगा है कि क्या दो सौ से ज्यादा सीटें जीतने का दावा करने वाली बीजेपी सिर्फ़ दागियों और बागियों के सहारे ही टीएमसी का मुकाबला करेगी?
यह सवाल निराधार नहीं हैं. दो साल पहले टीएमसी से नाता तोड़ कर बीजेपी के पाले में जाने वाले मुकुल रॉय हों या फिर अमित शाह के दौरे के समय शनिवार को अपने दल-बल के साथ भगवा झंडा थामने वाले शुभेंदु अधिकारी, किसी का दामन उजला नहीं है.
शारदा चिटफंड घोटाले में भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझने वाले इन दोनों नेताओं में से मुकुल रॉय पर तृणमूल कांग्रेस विधायक सत्यजित विश्वास की हत्या तक के आरोप हैं. हत्या की जांच करने वाली सीआईडी की टीम ने हाल में अदालत में जो पूरक आरोप पत्र दायर किया है उसमें रॉय का नाम शामिल है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दूसरे दलों से आने वाले नेताओं की वजह से बीजेपी को भले ख़ास फ़ायदा नहीं हो, दूसरे दलों को थोड़ा-बहुत नुकसान तो हो ही सकता है.
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "बीजेपी फ़िलहाल खु़द को मज़बूत करने के बजाय दूसरे दलों को कमज़ोर करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है. दागियों के पार्टी में शामिल होते ही उनके भ्राष्टाचार के पुराने रिकार्ड धूल जाते हैं. मिसाल के तौर पर शुभेंदु के पार्टी में शामिल होने के अगले दिन ही बीजेपी ने सोशल मीडिया से वह वीडियो हटा लिया जिसमें नारदा स्टिंग मामले में वे (शुभेंदु) पैसे लेते नज़र आ रहे थे. शायद वह प्यार, युद्ध और राजनीति में सब कुछ जायज वाली कहावत को चरितार्थ करने पर तुली है."












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