क्या ‘एक मुट्ठी चावल’ भाजपा को दिलाएगा बंगाल में सत्ता का सिंहासन ?
क्या ‘एक मुट्ठी चावल’ BJP को दिलाएगा बंगाल में सत्ता का सिंहासन ?
नई दिल्ली। 'एक मुट्ठी चावल’ क्रांति का प्रतीक है। असहयोग आंदोलन के दौरान मुठिया प्रथा (एक मुट्ठी चावल दान करना) ने क्रांति की लौ को जन-जन तक पहुंचा दिया था। एक मुट्ठी चावल अभियान से कभी आदिवासियों ने महाजनी प्रथा को उखाड़ फेंका था। अब क्या 'एक मुट्ठी चावल’ बंगाल में राजनीतिक क्रांति का औजार बनेगा ? विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भाजपा पश्चिम बंगाल में 'एक मुठो चाल’ (एक मुट्ठी चावल) के जरिये गांव- गांव के किसानों को जोड़ने का अभियान शुरू करने वाली है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा शनिवार को बर्दवान के जगदानंदपुर गांव से इसकी शुरुआत करेंगे।

एक मुठो चाल
भाजपा जनवरी 2021 को कृषक सुरक्षा माह के रूप में मना रही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोक रखी है। उसने अपनी चुनावी जमीन मजबूत करने के लिए सबसे पहले किसानों से जुड़ने का फैसला किया है। एक मुठो चाल (एक मुट्ठी चावल) इसी रणनीति का हिस्सा है। जेपी नड्डा शनिवार को जगदानंदपुर गांव मे पांच किसानों से एक- एक मुट्ठी चावल मांग कर इसकी शुरुआत करेंगे। इसके बाद पश्चिम बंगाल के 23 जिलों के 48 हजार गांवों में यह अभियान चलेगा। इसके जरिये भाजपा राज्य के 74 लाख किसानों से जुड़ेगी। एक मुट्ठी चावल भावनात्मक जुड़ाव का एक जरिया है। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस ने दिल्ली के किसान आंदोलन का हवाला देकर भाजपा के इस अभियान की खिल्ली उड़ायी है।

74 लाख किसानों से जुड़ने की मुहिम
विरोधी दल नरेन्द्र मोदी सरकार को किसान विरोधी बताने की मुहिम चलाये हुए हैं। दिल्ली का किसान आंदोलन इसका आधार है। इसलिए भाजपा ने समय रहते अपनी कमजोर कड़ी को चाकचौबंद करने की तरफ कदम बढ़ा दिया है। केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना की शुरुआत फरवरी 2019 में की थी। इस योजना के तहत केन्द्र सरकार किसानों को हर साल छह हजार रुपये देती है। दो-दो हजार रुपये तीन किस्तों में पैसा सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजा जाता है। लेकिन ममता बनर्जी सरकार ने राजनीतिक कारणों से इस योजना को पश्चिम बंगाल में शुरू नहीं किया था। ममता बनर्जी ने शर्त रख दी थी यह पैसा राज्य को दिया जाय और राज्य सरकार खुद इसका भुगतान करेगी। लेकिन केन्द्र सीधे किसानों को पैसा देने पर अड़ा रहा। सियासी जिद की वजह से पश्चिम बंगाल के किसान इस लाभ से वंचित रहे। पश्चिम बंगाल अकेला ऐसा राज्य था जो इस योजना में शामिल नहीं हुआ। जब कि राज्य के करीब 21 लाख किसानों ने इस योजना के लिए अपना निबंधन कराया था। जब भाजपा गांव-गांव घूम कर यह प्रचार करने लगी कि ममता बनर्जी के अड़ंगे के कारण राज्य के किसानों को छह हजार रुपये नहीं मिल पा रहे हैं तो तृणमूल को बैकफुट पर आना पड़ा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आखिरकार इस योजना को लागू करने की मंजूरी देनी पड़ी। अब भाजपा किसानों से जुड़ कर उनका समर्थन हासिल करना चाहती है।

चार साल में कायापलट
2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल 3 सीटें मिलीं थीं। कांग्रेस 44 सीटों के साथ दूसरे नम्बर पर थी। 2018 के पंचायत चुनाव में भाजपा दूसरे नम्बर की पार्टी बन गयी। बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ गयी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीती थीं। इस जीत में उसे राज्य के 128 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस को केवल 158 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी जब कि उसने 2016 में 211 असेम्बली सीटों पर कब्जा जमाया था। यानी भाजपा अब बंगाल में तृणमूल को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच गयी है। लोकसभा चुनाव के आधार पर कहें तो दोनों के वोट शेयर में केवल तीन फीसदी की ही अंतर रह गया है। ये कमाल सिर्फ चार साल के अंदर हो गया।

पंजाब से अलग है बंगाल के किसानों की समस्या
क्या दिल्ली के किसान आंदोलन का असर पश्चिम बंगाल के चुनाव पर पड़ेगा? इस मामले में जानकारों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के किसानों की समस्या पंजाब और हरियाणा के किसानों से बिल्कुल अगर है। पश्चिम बंगाल के किसान भूमि सुधार लागू होने के बाद भी देश के सबसे गरीबों किसानों में एक हैं। देश के सबसे गरीब किसानों में उनका दूसरा स्थान है। 2019 में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि पंजाब के किसानों की औसत मासिक आमदनी 18 हजार 59 रुपये है जो देश में सबसे अधिक है। हरियाणा के किसान दूसरे स्थान पर हैं। उनकी औसत मासिक आमदनी 14 हजार 434 रुपये है। जब कि पश्चिम बंगाल के किसानों की औसत मासिक आमदनी सिर्फ 3 हजार 980 रुपये है। केन्द्रीय मंत्री ने यह जानकारी 8 साल पुराने एक सर्वे के आधार पर दी थी। 2012-13 के बाद देश के किसानों की आमदनी को लेकर कोई आकलन नहीं किया गया है। तमाम वामपंथी और समाजवादी नेता भूमि सुधार को ही कृषि के विकास का मूल आधार मानते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने सबसे पहले भूमि सुधार लागू किया था। लेकिन उसके बाद भी राज्य के किसान गरीबी की फेहरिस्त में दूसरे स्थान पर हैं। अब बंगाल के किसान भी नयी सुबह की तलाश में हैं।












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