हमें नहीं लगता कि अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए विधायिका कुछ कदम उठाएगी- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अपराधियों को राजनीति में प्रवेश करने और चुनाव के लिए खड़े होने से रोकने के लिए विधायिका के कुछ भी करने की संभावना नहीं है।
नई दिल्ली, 20 जुलाई। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अपराधियों को राजनीति में प्रवेश करने और चुनाव के लिए खड़े होने से रोकने के लिए विधायिका के कुछ भी करने की संभावना नहीं है। जस्टिस आरएफ नरीमन और बीआर गवई की पीठ उन राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली एक अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी जो 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास को घोषित करने और प्रचारित करने में विफल रहे। कोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों ने शीर्ष अदालत के 13 फरवरी, 2020 के आदेश की अवहेलना की, जिसमें पार्टियों के लिए अपने उम्मीदवारों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य कर दिया था।
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वहीं, कांग्रेस, एनसीपी, बसपा और माकपा ने विस्तृत हलफनामा दाखिल करने और उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास को सार्वजनिक करने में विफल रहने के लिए अदालत से बिना शर्त माफी मांगी। एनसीपी ने कहा कि चुनाव आयोग के नियमों और अदालत के आदेश का पालन नहीं करने के लिए उसकी राज्य इकाई के खिलाफ कार्रवाई की गई है, वहीं, बसपा ने कहा कि दो उम्मीदवारों के खिलाफ झूठे हलफनामे दाखिल करने और उनके आपराधिक इतिहास को छिपाने के लिए कार्रवाई की गई है।
बसपा की ओर से पेश अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 की धारा 16 ए के तहत अवमानना और चुनाव प्रतीकों को फ्रीज करने की धमकी बहुत भारी जुर्माना है। द्विवेदी ने कहा कि उम्मीदवार की जीत भी उसके चयन का एक कारक है। उन्होंने कहा, 'सिर्फ इसलिए कि एक उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह सामाजिक कार्य नहीं कर रहा है या लोग उसे जीतने के लिए नहीं चुन रहे हैं।'
वहीं एनसीपी की ओर से उपस्थित हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि अदालत जिस पर विचार कर रही है, उसके दूरगामी प्रभाव होंगे। अदालत को चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के अनुच्छेद 324 और धारा 16A की सीमाओं पर विचार करने की आवश्यकता है। सिब्बल के जवाब पर न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा, 'यदि आप प्रतीक आदेश देखते हैं, तो यह कहता है कि पार्टी के प्रतीक को शर्तों के अधीन निलंबित किया जा सकता है। आपको राष्ट्रीय चुनावों में राष्ट्रीय पार्टी को खतरे में डालने की जरूरत नहीं है। इसे सीमित परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है।'
इसको लेकर सिब्बल ने जवाब दिया, मैं यही कहना चाहता था। इसको लेकर एक तंत्र विकसित करने की जरूरत है। किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले हमें राजनीतिक दलों की राय भी ले लेनी चाहिए।
वहीं अदालत ने कपिल सिब्बल से कहा कि इस संबंध में किस तरह का आदेश पारित किया जा सकता है, इस पर सुझाव दें। पांच जजों की बेंचने कहा कि हम ऐसे उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकते जिसके खिलाफ जघन्य अपराध के आरोप तय किये गए हों। हमें बताएं कि हम कानून के भीतर रहकर क्या कर सकते हैं।
कोर्ट ने न्याय मित्र के रूप में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता केवी विश्वनाथन से यह भी पूछा कि यह भाजपा या कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों के लिए कैसे काम करेगा क्योंकि उनके चुनाव चिन्ह को राच्यवार फ्रीज करना मुश्किल हो सकता है। बेंच ने केवी विश्वनाथन से पूछा कि यदि कोई राष्ट्रीय दल किसी राज्य के चुनाव में चुनाव आयोग के नियमों का उल्लंघन करता है, तो क्या उनका राष्ट्रीय चिह्न जब्त किया जा सकता है? क्या उन्हें किसी दूसरे राज्य में उम्मीदवार खड़ा करने से रोका जा सकता है जहां कोई उल्लंघन नहीं हुआ है?
इसके जवाब में केवी विश्वनाथन ने कहा कि आदेश के उल्लंघन के लिए पार्टियों को परिणाम भुगतने होंगे और उन पर कम से कम वित्तीय जुर्माना तो लगया ही जा सकता है। उन्होंने कहा कि दो राजनीतिक दलों - माकपा और एनसीपी ने बिहार चुनाव में उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास का कोई विवरण नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अन्य पार्टियों की भी जांच होनी चाहिए कि क्या उन्होंने नियमों का ठीक से पालन किया या उनका उल्लंघन किया।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि अगर अदालत अवमानना का आदेश देती है तो वित्तीय जुर्माना केवल खानापूर्ति का नहीं होना चाहिए। साल्वे ने कहा, हमारे पास मुस्कुराते हुए और जुर्माने के रूप में 1 रूपये की रकम अदा करते हुए नेताओं की तस्वीर नहीं होनी चाहिए।












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