अखिलेश यादव क्या सत्ता में वापसी कर पाएंगे?

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अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी कर पाएंगे या नहीं, यह कुछ घंटों में साफ़ होने वाला है.

उनका दावा कि नयी हवा है, नयी सपा है, सच के क़रीब तक पहुंच पाता है या नहीं, ये देखना अभी बाक़ी है लेकिन अखिलेश यादव ने बीते दो तीन महीनों में उत्तर प्रदेश के चुनाव को कांटे का ज़रूर बना दिया है.

उनके धुर समर्थकों को भी इसकी उम्मीद नहीं रही होगी, लेकिन अखिलेश यादव ने मोदी-योगी की जोड़ी के सामने एक मज़बूत विपक्षी गठजोड़ बनाया.

उनके पास अब पांच साल सरकार चलाने और पांच साल विपक्ष, दोनों का अनुभव हासिल है, राजनीति में इसे सबसे माकूल अनुभव माना जाता है. पहली बार वे राज्य विधानसभा का चुनाव भी लड़ रहे हैं, लेकिन असली सवाल यही है कि क्या टीपू फिर से सुल्तान बन पाएंगे?

कैसे टीपू बने अखिलेश यादव?

दरअसल, अखिलेश यादव के घर का नाम टीपू है और इस नामकरण की भी अपनी कहानी है. मुलायम सिंह यादव के पारिवारिक दोस्त और उनके पुश्तैनी सैफ़ई गाँव के ग्राम प्रधान दर्शन सिंह ने उनके बेटे का नाम टीपू रखा था. एक बार जब उनका नाम टीपू पड़ गया तो परिवार में किसी ने पंडित बुला कर उनका औपचारिक नामकरण करने की ज़रूरत ही नहीं समझी.

अखिलेश यादव की जीवनी 'अखिलेश यादव - विंड्स ऑफ़ चेंज़' लिखने वालीं सुनीता एरॉन लिखती हैं, 'जब मुलायम के एक बहुत क़रीबी दोस्त एसएन तिवारी उनके चार साल के बेटे का दाखिला कराने स्कूल ले गए तो वहाँ के अध्यापक ने उनका नाम पूछा. उन्होंने जवाब दिया, 'टीपू.' अध्यापक ने कहा, लेकिन इसको तो फॉर्म में नहीं लिखा जा सकता. तब तिवारी ने हंसते हुए टीपू को कुछ नाम सुझाए और पूछा, 'क्या तुम्हें अखिलेश नाम पसंद है?' बच्चे ने अपना सिर हिलाया और टीपू अखिलेश यादव हो गए.'

अखिलेश यादव इटावा के सेंट मेरीज़ स्कूल में नर्सरी से कक्षा 3 तक पढ़े. उस ज़माने में उनके चाचा रामपाल सिंह उन्हें साइकिल पर बैठा कर स्कूल लाते थे. यही साइकिल बाद में समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह बनी. उन दिनों टीपू को पेड़ पर चढ़ने का शौक था.

वो पेड़ से तभी नीचे उतरते थे जब उन्हें कंपट यानी संतरे की टॉफ़ी का लालच दिया जाता था. अखिलेश के पिता मुलायम सिंह उस इलाक़े के मशहूर पहलवान थे. उनके गाँव के लोग अभी भी उनके 'चर्खा दाँव' को याद करते हैं जिसमें वो दूसरे पहलवानों को हाथों का इस्तेमाल किये बिना अपने सिर से चित कर देते थे.

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1977 में मुलायम सिंह यादव को जब राम नरेश यादव मंत्रिमंडल में सहकारिता मंत्री बनाया गया तो उनकी उम्र 38 साल की थी. इसी उम्र में उनके बेटे अखिलेश यादव ने 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तब उनके समर्थक हंसते हुए कहा करते थे, 'टीपू बन गया सुल्तान.'

उस समय अखिलेश के लिए 'शिष्ट,' 'विनीत,' 'सभ्य' और 'शरीफ़' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था. समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता शाहिद सिद्दीकी कहा करते थे, 'समस्या ये थी कि वो इतने शरीफ़ थे कि सरकार चलाना उनके बस की बात नहीं थी.'

जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो राजनीतिक हल्कों में माना जाता था कि सत्ता की असली चाबी तो उनके पिता मुलायम सिंह यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव, राम गोपाल यादव और मुलायम के ख़ासमख़ास आज़म ख़ाँ के पास ही रहेगी.

उनका पाँच साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी राजनीतिक टीकाकारों की उनके बारे में ये धारणा बदली नहीं. उस ज़माने में उत्तर प्रदेश में ये मज़ाक प्रचलित था कि उत्तर प्रदेश को साढ़े चार मुख्यमंत्री चला रहे हैं. बाद में इस सूची में एक और नाम का इज़ाफ़ा हो गया आईएएस अफ़सर अनीता सिंह का जिनका उत्तर प्रदेश सचिवालय के पंचम तल में ख़ासा रसूख हुआ करता था.

ढोलपुर के सैनिक स्कूल में पढ़ाई

अपने एक मित्र अवध किशोर बाजपेई की सलाह पर मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को पढ़ने के लिए ढोलपुर के सैनिक स्कूल भेज दिया. उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव उनका दाखिला कराने उनके साथ वहाँ गए. अखिलेश के सैनिक स्कूल प्रवास के दौरान मुलायम उनसे मिलने सिर्फ़ दो बार गए.

उन्होंने एक बार उन्हें पत्र लिखा, जिसे पत्र न कह कर एक टेलिग्राम कहा जा सकता है. उस पत्र में सिर्फ़ दो वाक्य थे- 'पढ़ने में मेहनत करो. काम आएगा.' सैनिक स्कूल में अखिलेश दूसरे लड़कों की तरह अपने कपड़े खुद धोते थे और अपने जूते भी स्वयं पॉलिश करते थे. छात्रों से अपेक्षा की जाती थी कि वो दिन में कम से कम 8 किलोमीटर चलें. ढोलपुर से अखिलेश इंजीनयरिंग की पढ़ाई के लिए मैसूर चले गए. इस बार उनका दाखिला कराने मुलायम सिंह यादव के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा गए.

ये वहीं नृपेंद्र मिश्रा हैं जो थोड़े समय पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव थे. मैसूर के जयचमरेंद्र इंजीनयरिंग कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी दोस्ती मशहूर तेज़ गेंदबाज़ जवागल श्रीनाथ से हो गई. जब 1996 में वो इंजीनयर बन कर लौटे तो मुलायम सिंह यादव देवेगौड़ा मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री थे.

सिडनी में पर्यावरण इंजीनयरिंग की पढ़ाई

उसी साल अखिलेश को पर्यावरण इंजीनयरिंग में मास्टर्स करने ऑस्ट्रेलिया भेज दिया गया.

उन दिनों सिडनी में अखिलेश के साथ पढ़ने वाले गीतेश अग्रवाल बताते हैं, 'अखिलेश को मेरी बनाई गई 'कड़क चाय' बहुत पसंद थी. वो उन दिनों भी बहुत तड़के उठ जाया करते थे. हम अक्सर खाने में पुलाव बनाते थे, लेकिन उसे पुलाव न कह कर 'तहरी' कहते थे. अमिताभ बच्चन उनके पसंदीदा अभिनेता होते थे और उनको 'सॉफ्ट' गाने बहुत पसंद थे. एक बार हम कैनबरा गए थे और अखिलेश बार-बार गुलाम अली की मशहूर ग़ज़ल 'तेरे शहर में हम आए हैं मुसाफ़िर' सुन रहे थे.'

'वो पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छे नहीं थे लेकिन दूसरे नेताओं के लड़कों की तरह उनमें कोई ऐब नहीं था. वो न तो सिगरेट पीते थे और न ही शराब. हमें वहाँ रहने के लिए बहुत कम पैसे मिला करते थे. मुझे याद है कि मुझे हर हफ़्ते 120 डॉलर मिला करते थे जबकि अखिलेश तो सिर्फ़ 90 डॉलर में अपना काम चलाया करते थे. उनके पास तब कोई मोबाइल फ़ोन नहीं था, जबकि भारत में एक साल पहले ही मोबाइल फ़ोन की शुरुआत हो चुकी थी. आस्ट्रेलिया में अपने दो साल के प्रवास के दौरान अखिलेश एक बार भी अपने घर भारत नहीं आए.'

डिंपल रावत से शादी

अखिलेश से डिंपल रावत की पहली मुलाक़ात उनके ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले हुई थी. ऑस्ट्रेलिया में भी वो पत्रों के ज़रिए एक दूसरे के संपर्क में रहे. डिंपल के पिता कर्नल एस सी रावत उन दिनों बरेली में तैनात थे. नवंबर 1999 में सांसद बनने के बाद अखिलेश और डिंपल की शादी हुई. डिंपल को घुड़सवारी और पढ़ने का शौक है.

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शादी के बाद उन्होंने खाना बनाना भी सीखा है, क्योंकि अखिलेश खाने के शौकीन हैं.

कारवाँ पत्रिका में अखिलेश की जीवनी 'एवरी बडीज़ ब्रदर' लिखने वाली नेहा दीक्षित लिखती हैं कि शुरू में मुलायम अखिलेश और डिंपल की शादी के ख़िलाफ़ थे. लेकिन अखिलेश नहीं माने. उस समय अखिलेश को सबसे अधिक समर्थन मिला, तब मुलायम के ख़ास दोस्त और बाद में उनके विरोधी बने अमर सिंह से. अमर सिंह से मुलायम की दोस्ती के ख़िलाफ़ झंडा उठाने वालों में अखिलेश भी थे. एक पत्रकार से बातचीत में उन्होंने कहा था, 'उन्होंने खटिया पर सोने वाले मेरे बाप को फ़ाइव स्टार की आदत लगा दी.'

जनेश्वर मिश्र थे अखिलेश के गुरु

जानीमानी पत्रकार प्रिया सहगल कहती हैं, 'वास्तव में अखिलेश के जीवन में मुलायम सिंह यादव नहीं, बल्कि जनेश्वर मिश्र ने एक बुज़ुर्ग सलाहकार की भूमिका निभाई है. जब अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष बन गए, तो जनेश्वर मिश्र ने उनसे कहा कि दो साल खूब मेहनत करो और मैं तुम्हारी रैली में खुद आकर 'अखिलेश ज़िंदाबाद' का नारा लगाउंगा और पार्टी के बाकी लोग भी तुम्हें अपना नेता मानेंगे.'

'जनेश्वर मिश्र ने ही अखिलेश यादव को उनके राजनीतिक जीवन की पहली सीख दी थी. वो 35 साल की उम्र हो जाने के बावजूद पार्टी के सीनियर नेताओं के पैर छूते थे. मिश्र ने कहा, 'अगर तुम इसी तरह इनके पैर छूते रहे तो इनको अनुशासित कौन करेगा? तब अखिलेश ने हंसते हुए कहा था कम से कम मुझे अपने पिताजी के पैर तो छू लेने दीजिए.' जब अखिलेश मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने लंदन के हाइड पार्क की तर्ज़ पर जनेश्वर मिश्र की याद में लखनऊ में जनेश्वर मिश्र पार्क बनवाया.'

'उम्मीद की साइकिल'

वर्ष 2009 में अखिलेश ने दो चुनाव क्षेत्रों कन्नौज और फ़िरोज़ाबाद से चुनाव लड़ा. वो दोनों जगह से जीते. बाद में उन्होंने फ़िरोज़ाबाद की सीट छोड़ दी. अखिलेश को उस समय बहुत बड़ा राजनीतिक धक्का लगा जब वहाँ हुए उप चुनाव में कांग्रेस के राज बब्बर ने उनकी पत्नी डिंपल यादव को हरा दिया.

अखिलेश ने अक्तूबर, 2011 में पूरे राज्य की साइकिल पर यात्रा की. सुनीता एरॉन लिखती हैं, 'अपने सफ़ेद कुर्ते पायजामे और लाल टोपी में अखिलेश अपनी साइकिल पर उत्तर प्रदेश के गाँव-गाँव गए. उन्हें राज्य प्रशासन ने नोएडा-आगरा एक्सप्रेस वे पर चलने की अनुमति नहीं दी. उन्होंने तुरंत कीचड़ से भरी सर्विस लेन पर चलने का फ़ैसला लिया. उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि एक दिन मैं ही इस 'एक्सप्रेस वे' का उद्घाटन करूँगा जो उन्होंने सत्ता में आने के बाद किया भी. उस विधानसभा चुनाव में उन्होंने राहुल गांधी से पूरे दो महीने पहले अपना चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था, जिसका फ़ायदा भी उन्हें चुनाव में मिला.'

2012 में उन्हें इसका फ़ायदा मिला जबकि इस बार उन्होंने साइकिल की जगह रोड शो किया. ख़ास चुनावी यात्रा के लिए बनी बस में उनके पीछे लोगों का लंबा काफ़िला दिखा और लोग उनके पीछे भागते नज़र आए.

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2017 का विधानसभा चुनाव अखिलेश ने चुनावी नारे 'काम बोलता है' पर लड़ा था. लेकिन ये नारा पूरे किये गए कामों से अधिक परियोजनाओं के शिलान्यास पर अधिक आधारित था. उनका कार्यकाल समाप्त होते-होते उनकी अपनी पार्टी की पुरानी पीढ़ी के लोगों से ठन गई थी. उन्होंने अपने-आप को उनसे दूर करने की कवायद शुरू भी की थी.

अखिलेश ने पहला तीर तब छोड़ा जब उन्होंने अपने चाचा शिवपाल यादव के क़रीबी रहे दो राज्य मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में अपने मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया. मुलायम के कहने पर बाद में उन्होंने उन्हें वापस ले ज़रूर लिया लेकिन अपने पिता के खिलाफ़ ही विद्रोह का बिगुल उन्होंने बजा दिया था.

दिसंबर में मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवारों की सूची जारी की जिसमें अखिलेश मंत्रिमंडल के कई चेहरों को जगह नहीं मिली. अखिलेश ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अपनी सूची जारी की जिसमें इन लोगों को शामिल किया गया.

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मुलायम ने अपने बेटे को पार्टी की सदस्यता से छह महीने के लिए निलंबित कर दिया. इस अंदरूनी टूट का नतीजा ये रहा कि कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश की हार हुई और भारतीय जनता पार्टी की एक बार फिर सत्ता में वापसी हुई.

कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके कांग्रेस पार्टी को 105 सीटें देने के फ़ैसले की भी काफ़ी आलोचना की क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के मात्र 28 सदस्य थे. हार के बाद अखिलेश ने आत्म-ग्लानि में समय न बरबाद करते हुए पहले पार्टी पर अपना नियंत्रण मज़बूत किया. फिर उन्होंने अपने पिता की धुर-विरोधी मायावती से मिल कर कहा कि बीजेपी को हराने के लिए हमारी पार्टियों को साथ आना चाहिए.

उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर वो प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, तो वो उनका समर्थन करेंगे. लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में ये गठबंधन कुछ ख़ास नहीं कर सका. मायावती के सांसदों की संख्या 10 तक ज़रूर पहुंची लेकिन अखिलेश यादव पांच सांसदों पर ही सिमट गए. इसके बाद यह गठबंधन भी लंबा नहीं चल सका. मायावती ने गठबंधन तोड़ने का एलान कर दिया.

ऐसे में 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक दो-तीन महीने पहले तक अखिलेश यादव राज्य विधानसभा चुनाव में कहीं मुक़ाबले में नज़र नहीं आ रहे थे. कोविड संकट और उसके बाद अलग-अलग मुद्दों पर प्रियंका गांधी कहीं ज़्यादा सक्रिय नज़र आयीं.

लेकिन चुनाव के नज़दीक नज़र आते ही अखिलेश यादव ने सबसे पहले ओम प्रकाश राजभर को अपने साथ जोड़ा और बीजेपी के खेमे से स्वामी प्रसाद मौर्या को तोड़ लिया. स्वामी प्रसाद मौर्या के अलावा उन्होंने धर्म सिंह सैनी और दारा सिंह चौहान जैसे राज्य के दो पिछड़े समुदाय के नेताओं को भी अपने साथ जोड़ लिया. क़रीब एक दर्जन से ज़्यादा बीजेपी विधायकों को अपने साथ जोड़कर अखिलेश ने लोगों को चौंका दिया. इन सबके साथ पश्चिम उत्तर प्रदेश में उन्होंने जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल के साथ अपने गठबंधन को कायम रखा.

इतना ही नहीं अखिलेश ने चाचा शिवपाल यादव के साथ भी हाथ मिला लिया. हालांकि, इस बार परिवार की छोटी बहू अपर्णा यादव खुले तौर पर बीजेपी में चली गईं लेकिन बीजेपी ने उन्हें राज्य में अपना उम्मीदवार नहीं बनाया.

इसके बाद उनके रोड शो में भी लोगों की भीड़ उमड़ती दिखी. टिकट वितरण में भी अखिलेश यादव की कोशिश परिवारवाद से निकलने की दिखी, उन्होंने कई समाज के लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया. इन सबके बीच वे राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर लगातार हमला बोलते रहे.

हालांकि, एक्ज़िट पोल में वे सरकार बनाते नहीं दिखे हैं लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि वो सत्ता हासिल करने की स्थिति में भी पहुंच सकते हैं. पिछले विधानसभा में 47 सीटों तक सिमटी पार्टी के मुखिया कहां तक पहुंच पाते हैं, ये देखने की बात होगी.

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