UP News: क्या सीएम योगी के खिलाफ गोलबंद हो रहे हैं बीजेपी और सहयोगी दलों के OBC नेता?

UP Politics: उत्तर प्रदेश में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के अंदर से लोकसभा चुनावों के बाद रह-रहकर ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जो इसके भीतर काफी असहजता के संकेत दे रही हैं। ताजा मामला उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की एक चिट्ठी को लेकर सामने आ रहा है।

जानकारी के मुताबिक मौर्य ने उस नियुक्ति और कार्मिक विभाग से संबंधित जानकारी मांगी है, जो सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अधिकार क्षेत्र में आता है। बड़ी बात ये है कि जानकारी के अनुसार इसमें भी आरक्षण नियमों के पालन के संबंध में ही जानकारी मांगी गई है।

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अनुप्रिया पटेल के बाद मौर्य की चिट्ठी के मायने?
अलबत्ता सूत्रों का कहना है कि चिट्ठी तो पिछले साल ही लिखी गई थी, लेकिन उन्होंने सिर्फ 'स्मरण पत्र' (reminder) भेजा है। लेकिन, इसका महत्त्व इसीलिए बढ़ गया है, क्योंकि लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा की सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) की नेता और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने भी ऐसी ही चिट्ठी लिखी थी।

पटेल की चिट्ठी में भी कहा गया था कि एससी/एसटी और ओबीसी कोटा वाले पद खाली रह जा रहे हैं और वह फिर सामान्य हो जाते हैं। उनकी चिट्ठी भी सार्वजनिक हो गई थी। मौर्य की चिट्ठी की गंभीरता इस वजह से बढ़ गई है, क्योंकि वह इसी महीने लखनऊ में प्रदेश बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में 'संगठन सरकार से बड़ा होता है' वाले बयान से सुर्खियों में आ चुके हैं।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की मौजूदगी में जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी में बीजेपी को इस बार सिर्फ 33 सीटें मिलने पर 'अति आत्मविश्सास' को कारण बताया था, वहीं मौर्य ने संगठन के बड़ा होने वाला बयान देकर उसके बहुत ही ज्यादा राजनीतिक मायने निकालने की वजह दे दी थी।

संजय निषाद भी अफसरों पर उठा चुके हैं सवाल
लोकसभा चुनावों के बाद सिर्फ मौर्य और अनुप्रिया पटेल ही नहीं हैं, जो किसी न किसी रूप में यूपी सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठाने की कोशिश करते नजर आए हैं। बीजेपी के एक और सहयोगी और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद भी सरकारी अफसरों पर किसी की नहीं सुनने का आरोप लगा रहे हैं। वे अफसरों पर 'बुल्डोजर के दुरुपयोग' के भी आरोप लगा चुके हैं।

निषाद और राजभर भी कर चुके हैं मौर्य से मुलाकात
गौर करने वाली बात ये है कि कार्यसमिति की बैठक के बाद मौर्य से मुलाकात करने वालों में पार्टी विधायकों के अलावा सहयोगी दलों के जो नेता शामिल रहे, उनमें निषाद के अलावा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख और मंत्री ओमप्रकाश राजभर भी शामिल हैं।

सीएम योगी के खिलाफ ओबीसी नेताओं की गोलबंदी?
इस तरह से मौर्य, पटेल, निषाद और राजभर इन चारों नेताओं में एक बात समान है कि ये सभी ओबीसी समाज से हैं और अपनी-अपनी जातियों में अच्छा प्रभाव रखते हैं। जहां तक मौर्य की बात है तो वह लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) से जुड़े हैं और भाजपा में भी उनकी जड़ें काफी गहरी हैं। वे विश्व हिंदू परिषद से भी जुड़े रह चुके हैं और राम मंदिर आंदोलन से भी उनका गहरा नाता रहा है।

ओबीसी नेताओं की गोलबंदी के क्या हैं मायने?
लेकिन, एक तथ्य यह भी है कि जब 2017 में यूपी में भाजपा की बंपर जीत के साथ सरकार बनने वाली थी, तो दावेदारों में योगी आदित्यनाथ के साथ केशव प्रसाद मौर्य का भी नाम चल रहा था। लेकिन, उन्हें किसी तरह से उपमुख्यमंत्री का पद लेकर संतुष्ट होना पड़ा।

अब जिस तरह से अचानक केशव प्रसाद मौर्य अपनी ही सरकार से खिंचे-खिंचे नजर आ रहे हैं और जिस तरह से सहयोगी दलों के बाकी ओबीसी नेता भी सरकार के काम-काज के तरीके के बहाने सार्वजनिक टिप्पणियां कर रहे हैं उससे सवाल उठता है कि अंदर ही अंदर कोई सियासी खिचड़ी तो नहीं पक रही है?

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