बाजीगर बनकर उभरे अखिलेश यादव, योगी के गढ़ में ऐसे चढ़ाई साइकिल
नई दिल्ली। अखिलेश यादव ने 6 साल बाद एक बार फिर अपना नेतृत्व साबित कर दिखाया है। फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनाव के नतीजे एक प्रयोग की सफलता पर ईवीएम का बटन है। वह प्रयोग जिसके बारे में सोचना आसान नहीं था। खासकर इसलिए भी कि एक और प्रयोग अखिलेश के नेतृत्व में असफल साबित हो चुका था। मगर, नेता वही होता है जो नयी लकीर खींचता है और अखिलेश यादव ने नयी लकीर खींच दी है।
अखिलेश यादव की पहचान मुलायम सिंह के बेटे के तौर पर है। मगर, एक बेटे से बढ़कर एक नेता के तौर पर उन्होंने इसे स्थापित कर दिखाया है। पिछले साल जब यूपी विधानसभा चुनाव हुए थे तब अखिलेश यादव ने दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ी थी। एक मोर्चा था चुनाव मैदान का और दूसरा मोर्चा था समाजवादी पार्टी के भीतर की सियासत। टिकट बांटने से लेकर जीत दिलाने तक की जिम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर लेने का फैसला किया। समाजवादी पार्टी टूट के कगार तक पहुंच गयी। मामला चुनाव आयोग तक जा पहुंचा। वो तो मुलायम सिंह यादव की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने घर में ही सुलह करने का फैसला किया। फिर भी समाजवादी पार्टी में अध्यक्ष के तौर पर अखिलेश यादव ने जगह बना ली थी। यह सफलता बहुत चमक नहीं पायी क्योंकि विधानसभा चुनाव वे हार गये।

फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव के नतीजे
विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव ने नया रास्ता चुना। कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, मगर ये दांव उल्टा पड़ गया। इसकी वजह ये थी कि पूरे देश में कांग्रेस के ख़िलाफ़ माहौल अभी दूर नहीं हुआ था। बीजेपी लगातार कांग्रेस विरोधी भावना को सहलाकर और सपने दिखाकर चुनावी सफलताएं हासिल कर रही थीं। यूपी में भी वही हुआ। राहुल गांधी के साथ मिलकर अखिलेश यादव ने जो राजनीतिक समां बांधने का प्रयास किया, वह परवान नहीं चढ़ पाया। मगर, एक नेता के तौर पर अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री रहने के बावजूद इस बात को समझा था कि अकले चुनावी डगर पार करना मुश्किल है। उन्होंने यह भी समझा था कि बीजेपी को रोकना उतना ही जरूरी है। यहां तक कि यूपी विधानसभा चुनाव की मतगणना के दौरान भी अखिलेश ने संकेत दिए थे कि वे बीएसपी के साथ चुनाव बाद गठबंधन कर सकते हैं। मगर, उसका मौका नहीं मिला।

अखिलेश का नया दांव रहा कामयाब
अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री पद जरूर छोड़ना पड़ा, मगर उनकी राजनीतिक समझ गलत नहीं थी। बीजेपी का मुकाबला करने के लिए गठबंधन की जरूरत को उन्होंने सही समझा था। सहयोगी के तौर पर कांग्रेस का चुनाव तब गलत साबित हुआ। एक बार फिर जब उपचुनाव का मौका आया, तो अखिलेश ने अपनी समझ को सही साबित कर दिखाया। उन्होंने पहल कर बीएसपी से बातचीत की, मायावती को गठबंधन के लिए राजी किया।

गठबंधन का श्रेय मायावती को भी
मायावती को भी इस गठबंधन का श्रेय दिया जाना चाहिए, मगर एक बात गौर करने की है कि उपचुनाव के दौरान मायावती कभी खुलकर गठबंधन के लिए वोट मांगती नहीं दिखी। इससे पता चलता है कि उन्हें इस गठबंधन की सफलता का अंदाजा नहीं था। वह विफलता की उम्मीद कर आगे की रणनीति और विकल्पों पर भी विचार कर रही थीं।

बीजेपी को हराने के लिए बीएसपी ने दी कुर्बानी
मायावती से इतर अखिलेश को अपनी सियासत पर भरोसा था। उन्होंने खुलकर गठबंधन के लिए वोट मांगे। बीजेपी को हराने के लिए बीएसपी ने कुर्बानी दी। दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं दिए, लेकिन समाजवादी पार्टी ने भी कुर्बानी दी। गोरखपुर सीट पर एक ऐसे उम्मीदवार को साइकिल का सिम्बल दिया, जो समाजवादी पार्टी का नहीं था लेकिन जिसमें बीजेपी को हराने की क्षमता अखिलेश ने देखी। एक नेता में यही तो गुण होते हैं जो देख लेता है कि क्या होने वाला है, किसमें क्षमता है और उस क्षमता का कैसे सदुपयोग हो सकता है।

मोदी विरोध के केन्द्र बनकर उभरे अखिलेश यादव
अब अखिलेश यादव मोदी विरोध के केन्द्र बनकर उभरे हैं। महज उपचुनाव की दो लोकसभा सीटों का नतीजा इतना बड़ा नतीजा दे सकता है ये बात अखिलेश यादव ने साबित कर दिखलायी है। सोनिया गांधी ने उपचुनाव से एक दिन पहले डिनर दी। यही डिनर अगर एक दिन बाद होती तो उस डिनर का चमकता चेहरा अखिलेश यादव ही होते।












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