यूपी उपचुनाव: जौनपुर की मल्हनी सीट पर कांटे की टक्कर, क्या सपा बचा पाएगी गढ़ ?

लखनऊ। यूपी की जिन सात सीटों पर उपचुनाव होने हैं उनमें जौनपुर की मल्हनी (Malhani) विधानसभा सीट भी है। मल्हनी सीट सपा विधायक पारसनाथ यादव के निधन से खाली हुई है। इस सीट से उनके बेटे लकी यादव चुनावी मैदान में हैं। उनके सामने मुकाबले में बाहुबली नेता धनंजय सिंह हैं तो भाजपा और बसपा भी मैदान में हैं। इस उपचुनाव में इनमें ही टक्कर होने वाली है।

मल्हनी का समीकरण

मल्हनी का समीकरण

मल्हनी सीट से किसका पलड़ा भारी है और कौन चुनाव जीतेगा। इस संभावना पर तो चर्चा होगी लेकिन उसके पहले आपको ये समझना जरूरी है कि इस सीट पर जातिगत समीकरण क्या हैं ? यूपी-बिहार की राजनीति में बिना जाति के समीकरण को समझे राजनीति का गणित हल नहीं होता। इस सीट पर 80 हजार से ज्यादा यादव मतदाता हैं। क्षत्रिय मतदाता 50 हजार हैं तो ब्राह्मण वोटर की संख्या 40 हजार के ऊपर है। जबकि मुस्लिम वोटरों की संख्या करीब 30 हजार है। दलित मतदाता भी यहां पचास हजार से ऊपर दलित मतदाता हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण समीकरण बने निषाद समुदाय के 25 हजार वोटर यहां हैं।

सपा के सामने गढ़ बचाने की चुनौती

सपा के सामने गढ़ बचाने की चुनौती

मल्हनी सीट से सपा ने पारसनाथ यादव के बेटे लकी यादव को प्रत्याशी बनाया है। जहां लकी यादव के लिए ये पिता की विरासत है तो सपा की साख भी इस सीट से जुड़ी है। जिन सात सीटों पर उपचुनाव होने हैं उनमें मल्हनी ही इकलौती सीट है जहां सपा जीती थी। पारसनाथ यादव सपा को मुलायम के करीबी लोगों में शुमार थे। पारस के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2017 में मुलायम सिंह यादव ने सिर्फ दो सीट से चुनाव प्रचार किया था जिनमें एक सीट मल्हनी थी। उन्होंने पारसनाथ के लिए वोट मांगा था। पूर्वांचल में उन्हें मिनी मुख्यमंत्री के नाम से जाना जाता था। पिता पारसनाथ यादव की तरह लकी यादव की भी सबसे बड़ी ताकत क्षेत्र का यादव मतदाता है। 80 हजार वोटबैंक के साथ यादव यहां सबसे निर्णायक वोट है। इसके साथ ही पिता के निधन के बाद उपजी सहानुभूति की लहर भी उनके लिए सकारात्म काम करेगी। लेकिन लकी यादव की राह आसान नहीं होने वाली है। उनके सामने बाहुबली धनंजय सिंह यादव हैं जो पिछले चुनाव में दूसरे नंबर रहे थे।

धनंजय सिंह के चलते ठाकुर बनाम यादव हुई लड़ाई

धनंजय सिंह के चलते ठाकुर बनाम यादव हुई लड़ाई

बाहुबली धनंजय सिंह एक बार फिर मल्हनी सीट से चुनाव मैदान में हैं। लकी यादव को कड़ी टक्कर जिस प्रत्याशी से अभी तक मिल रही है वो धनंजय सिंह ही हैं। शुक्रवार दोपहर में धनंजय सिंह क्षेत्र के माधोपट्टी गांव में जनसंपर्क के लिए पहुंचे हुए थे। गौरव सोलंकी इसी गांव के रहने वाले हैं और गांव आए हुए हैं। गौरव ने पत्रकारिता की पढ़ाई की है और सिविल सर्विसेज की तैयारी करते हैं। गौरव बताते हैं कि लड़ाई में अभी तक मुख्य मुकाबला लकी यादव और धनंजय सिंह के बीच है। बाहुबली बाहर चाहे जो छवि रखते हों पर इलाके में भैया जी वाला मामला रहता है, यही वजह है धनंजय को क्षेत्र में क्षत्रिय मतदाताओं का साथ तो मिलता ही है लेकिन ब्राह्रण, दलित, निषाद और मुसलमानों भी उनके साथ दिखते हैं। पिछले चुनाव में निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (NISHAD) के टिकट पर धनंजय सिंह दूसरे नंबर पर थे। हालांकि वे 21 हजार से अधिक वोटों से हारे थे जबकि 2012 के चुनाव में उस समय उनकी पत्नी जागृति सिंह भी दूसरे नंबर रही थीं। इस बार अब तक धनंजय सिंह किसी पार्टी के टिकट पर नहीं हैं। गौरव बताते हैं कि अगर भाजपा राजपूत कैंडीडेट उतारती है तो धनंजय सिंह के लिए मुश्किल बढ़ जाएगी।

भाजपा के तरकश में है ये तीर

भाजपा के तरकश में है ये तीर

भाजपा ने अभी तक प्रत्याशी के नाम का ऐलान नहीं किया है लेकिन अंदर से जो खबर आ रही है उसके मुताबिक पार्टी पाणिनी सिंह के नाम पर दांव लगाएगी। हालांकि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति से राजनीति की शुरुआत करने वाले मनोज सिंह भी टिकट के लिए दावा ठोक रहे हैं। पाणिनी सिंह और मनोज सिंह दोनों क्षत्रिय उम्मीदवार हैं। भाजपा ने इसके पहले 2017 में भी क्षत्रिय उम्मीदवार सतीश कुमार सिंह पर दांव लगाया था और वे चौथे नंबर रहे थे। पाणिनी सिंह को 38966 वोट मिले थे। ये तब था जब मोदी लहर में पार्टी ने प्रदेश में तीन चौथाई सीटों पर कब्जा जमाया था। वहीं पाणिनी सिंह 2012 में बसपा के टिकट पर मैदान में किस्मत आजमा चुके हैं। तब पाणिनी तीसरे नंबर पर रहे थे। भाजपा को अपने कैडर बेस वोटर के साथ ही उम्मीद ब्राह्मण मतदाताओं से भी है जिनकी संख्या 40 हजार के ऊपर है। भाजपा की सफलता-असफलता बहुत हद तक बसपा के प्रत्याशी के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी कि क्या वो ब्राह्मण वोटों को साधने में कामयाब होते हैं या नहीं।

बसपा ने खेला है ब्राह्मण कार्ड

बसपा ने खेला है ब्राह्मण कार्ड

मल्हनी विधानसभा बनने के बाद से बसपा यहां कभी जीती नहीं लेकिन उसके प्रत्याशी हमेशा मुकाबले में जमे रहे हैं। बसपा ने इस बार इस सीट पर ब्राह्मण कार्ड खेलकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। प्रदेश में ब्राह्मणों की योगी सरकार की नाराजगी को देखते हुए बसपा का ये दांव यहां काफी जोरदार माना जा रहा है। वैसे भी बसपा यहां हर बार टक्कर देती रही है। आज भाजपा के प्रबल दावेदार पाणिनी सिंह 2012 में यहां बसपा के टिकट पर मैदान में थे और 45 हजार वोट के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे। 2017 में बसपा ने यहां विवेक यादव पर दांव चला और पार्टी तीसरे नंबर रही। खास बात यह है कि दूसरे नंबर पर रहे धनंजय सिंह से विवेक यादव दो हजार वोट ही पीछे थे। ये तब था जब यादव वोट बड़ी संख्या में सपा प्रत्याशी पारसनाथ यादव के पक्ष में पोल हुआ था। ऐसे में मल्हनी से इस बार ब्राह्मण कैंडीडेट उतारने से जहां बसपा को अपना बेस वोट तो मिलेगा, पार्टी को ब्राह्मण वोट भी पक्ष में आने की उम्मीद है। इसके पहले 2012 में भी पार्टी ने नई सोशल इंजीनियरिंग के तहत प्रदेश में ब्राह्मणों का समर्थन हासिल कर चुकी है।

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