असंसदीय शब्दों की लिस्ट पर विवाद, महुआ मोइत्रा ने Eyewash के लिए दिया ये विकल्प
नई दिल्ली, 15 जुलाई। लोकसभा सचिवालय की ओर से असंसदीय शब्दों की एक बुकलेट जारी की गई है, जिसमे कहा गया है कि इन शब्दों का इस्तेमाल सदन में वर्जित होगा और इसे रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया जाएगा। इन शब्दों को लेकर काफी विवाद हो रहा है। इस पूरे विवाद पर तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने तीखा हमला बोला है। महुआ मोइत्रा ने कहा कि वह उन शब्दों की जगह पर वैकल्पिक शब्द लेकर आएंगी जिन्हें असंसदीय घोषित किया गया है। इस पूरे विवाद के बीच लोकसभा स्पीकर ने कहा था कि किसी भी शब्द को प्रतिबंधित नहीं किया गया है।

महुआ मोइत्रा ने ट्वीट करके लिखा, आज के असंसदीय शब्दों के विकल्प, आईयवाश का विकल्प अमृतकाल। इससे पहले गुरुवार को महुआ मोइत्रा ने कहा कि सेक्सुअल हरासमेंट शब्द का विकल्प मिस्टर गोगोई होना चाहिए। गौर करने वाली बात है कि 50 पेज की एक बुकलेट जारी की गई है, जिसमे उन तमाम शब्दों की लिस्ट बनाई गई है जिन्हें संसद में सांसदो के इस्तेमाल पर प्रतिबंधित कर दिया गया है। मानसून सत्र के शुरू होने से पहले इस लिस्ट के आने से काफी विवाद हो रहा है।
18 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है। सत्र के शुरू होने से पहले जो बुकलेट जारी की गई है उसमे जुमलाजीवी, बाल बुद्धि, कोविड स्प्रेडर, स्नूपगेट, अनार्किस्ट, अशेम्ड, अब्यूज्ड, बिट्रेयल, करप्ट, ड्रामा, हिपोक्रेसी, इनकंपीटेंट, शकुनि, डिक्टोरियल, तानाशाह, जयचंद, विनाश पुरुष, खालिस्तानी, खून की खेती, दोहरा चरित्र, बहरी सरकार, ढिंढ़ोरा पीटना, काला दिन, अहंकार, घड़ियाली आंसू जैसे शब्दों को शामिल किया है, इनके इस्तेमाल पर रोक लगा गई है, इन शब्दों को असंसदीय शब्द करार दिया गया है.
वहीं इश लिस्ट पर विवाद होने के बाद सरकार की ओर से कहा गया है कि यह उन शब्दों की लिस्ट है जिन्हें पहले ही संसद की कार्रवाई और राज्यों की विधानसभा की कार्रवाई से पीठासीन अधिकारी ने हटा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार 62 नए शब्दों को इस लिस्ट में शामिल किया गया है, जिनकी समीक्षा की जाएगी। सरकार के सूत्रों के अनुसार ऑस्ट्रेलिया की संसद में अब्यूज्ड शब्द को असंसदीय माना गया है, जबकि चाइल्डनेस को क्यूबा के सदन में प्रतिबंधित किया गया है।
सरकार की ओर से जारी की गई सफाई के बाद कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने कहा कि इस सफाई का कोई खास महत्व नहीं है। सभी बहस के दौरान मीडिया इस शब्दों की अनदेखी करता है कि वह इन्हें रिपोर्ट नहीं कर सकता है। प्रिंट मीडिया को अपने लेख में इन शब्दों के इस्तेमाल से पहले दो बार सोचना होता है।












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