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Union Budget 2026: बजट में टैक्सपेयर्स को मिल सकती है बड़ी राहत, ये 5 बदलाव टैक्स को बनाएंगे आसान

Union Budget 2026: हर साल आने वाला केंद्रीय बजट बड़े ऐलानों से भरा होता है, लेकिन आम करदाता के लिए असली परीक्षा बजट के महीन नियमों और प्रावधानों में छिपी होती है। जैसे-जैसे Budget 2026 नजदीक आ रहा है, टैक्सपेयर्स की उम्मीदें बहुत बड़ी नहीं, बल्कि जरूरी हैं।

टैक्स भरने की प्रक्रिया आसान हो, लंबी अवधि की बचत को प्रोत्साहन मिले और सुविधा को किसी "लग्ज़री" की तरह न देखा जाए। ऐसे में टैक्स सिस्टम को ज्यादा स्मार्ट, सॉफ्ट और सेंसिबल बनाने के लिए पांच अहम बदलावों पर चर्चा तेज हो गई है।

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Budget 2026 Tax Relief: रिटर्न के लिए फॉर्म्स के झंझट से मिले छुटकारा

पुरानी और नई टैक्स व्यवस्था के बीच विकल्प देने का मकसद करदाताओं को सशक्त बनाना था, लेकिन हकीकत में इससे कागजी कार्रवाई और उलझन ही बढ़ गई। Form 10-IE इसका बड़ा उदाहरण है, जिसे नई टैक्स व्यवस्था चुनने या छोड़ने के लिए भरना अनिवार्य है। कई करदाता या तो यह फॉर्म भरना भूल जाते हैं या गलती कर बैठते हैं, जिससे उन्हें उस टैक्स व्यवस्था का लाभ नहीं मिल पाता जो उनके लिए ज्यादा फायदेमंद होती।

समाधान बेहद सरल है-टैक्स रिटर्न (ITR) के अंदर ही टैक्स व्यवस्था चुनने का विकल्प दे दिया जाए। एक ही रिटर्न, एक स्पष्ट विकल्प और कोई अतिरिक्त फॉर्म नहीं। 'Ease of Doing Business' का मतलब सिर्फ कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि उन लाखों सैलरी क्लास करदाताओं के लिए भी होना चाहिए, जो न तो सिस्टम का दुरुपयोग करते हैं और न ही बेवजह की पेपरवर्क में उलझना चाहते हैं।

विदेशी रेमिटेंस पर TCS का बोझ हो कम

लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत विदेश भेजी जाने वाली रकम पर 20% TCS टैक्स चोरी रोकने के लिए लगाया गया था। मंशा सही हो सकती है, लेकिन इसका असर आम लोगों पर भारी पड़ रहा है। परिवार की मदद, पढ़ाई या अन्य जरूरी कारणों से विदेश पैसा भेजने वालों के लिए इतना ज्यादा TCS उनकी लिक्विडिटी रोक देता है और बेवजह तनाव बढ़ाता है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि या तो TCS की दर 20% से घटाकर 10% की जाए या फिर स्लैब सिस्टम लागू किया जाए-जैसे ₹50 लाख तक कम दर और उसके बाद ज्यादा दर। टैक्स सिस्टम का उद्देश्य अनुपालन को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि लोगों को मजबूरी में धकेलना।

NPS निकासी पर टैक्स को लेकर स्पष्टता जरूरी

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) से जुड़े हालिया बदलाव स्वागतयोग्य हैं। अब अगर किसी सब्सक्राइबर का कुल कॉर्पस ₹8 लाख तक है, तो वह 100% राशि निकाल सकता है, और अगर इससे ज्यादा है तो 80% तक निकासी संभव है। इससे NPS ज्यादा लचीला बनता है। लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है-अब तक मैच्योरिटी पर सिर्फ 60% राशि टैक्स-फ्री थी। तो अतिरिक्त 20% निकासी पर टैक्स लगेगा या नहीं? Budget 2026 में इस भ्रम को दूर करना बेहद जरूरी है। अगर अतिरिक्त निकासी को भी टैक्स-फ्री कर दिया जाए, तो NPS एक मजबूत रिटायरमेंट विकल्प बनेगा, न कि टैक्स की पहेली।

नई टैक्स व्यवस्था में NPS को मिले बराबरी का दर्जा

नई टैक्स व्यवस्था में कटौतियों की गुंजाइश बेहद सीमित है। ऐसे में Section 80CCD(2) यानी नियोक्ता की ओर से NPS में योगदान, करदाताओं के लिए एकमात्र बड़ी राहत बनकर सामने आता है। हालांकि, Section 80CCD(1b) के तहत मिलने वाली अतिरिक्त ₹50,000 की छूट अभी नई टैक्स व्यवस्था में लागू नहीं है। अगर सरकार इस छूट को नई व्यवस्था में भी लागू करे और इसे बढ़ाकर ₹1 लाख कर दे, तो यह लंबी अवधि की बचत को लेकर एक मजबूत संदेश होगा। वैश्विक अनुभव बताता है कि टैक्स इंसेंटिव्स लोगों को रिटायरमेंट के लिए बचत करने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे भविष्य में सरकार पर बोझ भी कम पड़ता है।

जॉइंट टैक्स रिटर्न का समय आ गया है

भारत का टैक्स सिस्टम आज भी शादीशुदा जोड़ों को वित्तीय रूप से अलग-अलग मानता है। जबकि हकीकत यह है कि आज के समय में ज्यादातर परिवार डबल इनकम हाउसहोल्ड बन चुके हैं। अगर जॉइंट टैक्स रिटर्न की सुविधा दी जाए और शादीशुदा जोड़ों के लिए एक्सेम्प्शन लिमिट बढ़ाई जाए, तो इससे टैक्स में समानता आएगी और परिवारों के हाथ में ज्यादा डिस्पोजेबल इनकम बचेगी। दुनिया के कई देशों में यह व्यवस्था पहले से लागू है। अगर परिवार मिलकर वित्तीय योजनाएं बनाते हैं, तो टैक्स फाइलिंग भी साथ में क्यों नहीं?

बड़े ऐलानों से ज्यादा ज़रूरी है फाइन-ट्यूनिंग

Budget 2026 से करदाता आतिशबाजी नहीं, बल्कि समझदारी भरे बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं। कम फॉर्म, निष्पक्ष टैक्स दरें, स्पष्ट नियम और समझदार इंसेंटिव-ये छोटे लेकिन असरदार कदम टैक्स सिस्टम को कम डरावना और ज्यादा मानवीय बना सकते हैं। अगर सरकार इन सुझावों पर गौर करती है, तो टैक्स देना एक बोझ नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने जैसा अनुभव बन सकता है।

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