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UGC की विश्वविद्यालयों से अपील, कहा-'खाप पंचायत समेत इन 15 विषयों पर आयोजित करें व्याख्यान

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से भारतीय दर्शन में "आदर्श राजा" के साथ-साथ खाप पंचायतों और उनकी "लोकतांत्रिक परंपराओं" जैसे विषयों पर व्याख्यान आयोजित करने का आग्रह किया है। यूजीसी की तरफ से ऐसा इसलिए कहा गया है ताकि भारत 26 नवंबर को संविधान पर्व को "लोकतंत्र की मां" रूप में मना सके। सभी राज्यों में इस तरह के व्याख्यान आयोजित हो सकें, इसको लेकर विवि अनुदान आयोग की तरफ से सभी राज्यों को राज्यपालों को एक पत्र भी लिखा गया है।

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पीएम मोदी ने भारत को कहा था लोकतंत्र की जननी
15 अगस्त को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन के दौरान भारत को "लोकतंत्र की जननी" बताया था। यूजीसी की तरफ से 15 टॉपिक बताए गए हैं, जिन पर विश्वविद्यालय व्याख्यान आयोजित कर सकते हैं। इन 15 टॉपिक में कौटिल्य के अनुसार आदर्श राजा (राजरसी या द्रष्टा राजा या दार्शनिक राजा) की अवधारणा, भारत के लोकतंत्र (स्वशासन) भगवद गीता शामिल हैं। इसके अलावा इसमें हड़प्पावासी दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था और खाप पंचायतों का भी नाम शामिल है।

वहीं, आयोग की तरफ से धार्मिक सुधारों के लिए जिम्मेदार भक्ति परंपरा की अहमियत के टॉपिक को भी सुझाया गया है। इसके अलावा मध्य युगीन काल के आदिवासी परंपराओं के बारे में व्याख्यान के बारे में भी सुझाया गया है।

ये सभी विषय भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) की तरफ से "भारत लोकतंत्र की जननी" पर प्रकाशित एक पुस्तक पर आधारित हैं। जिसे 30 अलग-अलग लेखकों ने 30 अध्यायों में संकलित किया है। इन लेखकों के लेखने को शिक्षकों और छात्रों तक पहुंचाने के लिए यूजीसी ने देश भर के 90 विश्वविद्यालयों में 90 व्याख्यान देने की योजना बनाई है।

ICHR की तरफ से दिए गए व्याख्यानों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय भारत को "प्रजातंत्र" या "जनतंत्र" के विपरीत "लोकतंत्र" के रूप में बढ़ावा देना है। इसकी व्याख्या के अनुसार पूर्व का अर्थ "समुदाय के कल्याण की ओर उन्मुख समुदाय प्रणाली" है। "प्रजातंत्र" लोकतंत्र का एक मात्र अनुवाद है और "जन तंत्र" "शासक बनाम जन-उन्मुख प्रणाली" है।

इसमें कहा गया है कि प्राचीन भारत अद्वितीय था। क्योंकि वहां कोई निरंकुशता या अभिजात वर्ग नहीं था। इसके अलावा वहां जन्म की प्रतिष्ठा, धन और राजनीतिक पद के प्रभाव का कोई केंद्रीकरण नहीं था, और "भारतीय" शासन प्राचीन रोम व ग्रीस से अलग था। भारत में संप्रभुता "धर्म" पर टिकी हुई थी, जिसे नोट "कानून" के रूप में समझाता है।

यूजीसी अध्यक्ष ने कहा कि कई संकेत यह भी मिलते हैं कि भारत में शासन का प्राचीन रूप लोकतांत्रिक था। भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं पर जोर देने के लिए पुरातात्विक, साहित्यिक, मुद्राशास्त्रीय, अभिलेखीय, भक्ति आदि के रूप में और अधिक प्रमाण हैं। राखीगढ़ी और सनौली में हाल की पुरातात्विक खुदाई से पता चलता है कि लोगों के स्वशासन की जड़ें कम से कम 5000 ईसा पूर्व की हैं।

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