दो तरह के पटेल: कौन मोदी के साथ और कौन हार्दिक संग?

Posted By: BBC Hindi
Subscribe to Oneindia Hindi
आरक्षण आंदोलन
Reuters
आरक्षण आंदोलन

गुजरात विधानसभा 2017 की चुनावी जंग अब अपने आख़िरी पड़ाव में पहुंच चुकी है. ऐसे हालात में गुजरात राज्य की राजनीति में एक सामाजिक और राजनीतिक लहर सी है.

अब इस लहर की दिशा और दशा पाटीदारों पर दारोमदार रखती है, ऐसा कई राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव की दशा और दिशा पाटीदार क्यों तय करेंगे?

बीबीसी से ख़ास बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार भावेश शाह कहते हैं, "गुजरात में तकरीबन 4 करोड़ 35 लाख मतदाताओं में 1 करोड़ से ज़्यादा मतदाता पटेल पाटीदार बिरादरी से हैं जो कि किसी राज्य के जाति या वर्ण आधारित मतदाताओं की 22-23% संख्या हुई."

हार्दिक पटेल और नरेंद्र मोदी
Getty Images
हार्दिक पटेल और नरेंद्र मोदी

क्या है कड़वा और लेउवा पटेल?

हालांकि, गुजरात में पाटीदार-पटेल समुदाय दो वर्णों में बंटा हुआ है. कड़वा पाटीदार पटेल और लेउवा पाटीदार पटेल.

हार्दिक पटेल खुद कड़वा पटेल है और हाल के गुजरात के शासन में सत्तारुढ़ पटेल-पाटीदार नेताओं में कड़वा पटेल नेताओ की संख्या ज़्यादा है.

पाटीदार-पटेल भले ही दो वर्णों में हों, पर उनका मूल व्यवसाय और उनकी आर्थिक आय, खेती, पशुपालन और डेरी सहकारी क्षेत्र पर आधारित है.

लेउवा पटेल ज़्यादातर सौराष्ट्र-कच्छ इलाके (गुजरात के पश्चिम तटीय क्षेत्र का इलाका) के राजकोट, जामनगर, भावनगर, अमरेली, जूनागढ़, पोरबंदर, सुरेंद्रनगर, कच्छ ज़िलों में ज़्यादातर पाए जाते हैं.

जबकि कड़वा पटेल समुदाय के लोग उत्तर गुजरात के मेहसाणा, अहमदाबाद, कड़ी-कलोल, विसनगर इलाके में पाए जाते हैं.

कड़वा पाटीदार की कुलदेवी उमिया माता हैं जबकि लेउवा पटेलों की कुलदेवी खोडियार माता हैं.

कड़वा पाटीदारों का सबसे बड़ा धार्मिक संस्थान उत्तर गुजरात के उंझा गांव में मां उमिया संस्थान के नाम से प्रचलित है.

जबकि लेउवा पाटीदारों का सबसे बड़ा धार्मिक संस्थान सौराष्ट्र के कागवड गांव में मां खोडलधाम के नाम से प्रचलित है.

ऐसे में अगर ये 1 करोड़ से ज़्यादा मतदाताओं का अनुपात कड़वा और लेउवा पाटीदार के रूप में देखें तो कड़वा पटेल 60% और लेउवा पटेल 40% हैं.

हार्दिक पटेल की कथित सीडी से किसका नुक़सान?

क्या वाकई संघ से हमदर्दी रखते थे सरदार पटेल?

नेहरू-पटेल पर क्या बोली थीं जिन्ना की बेटी

आनंदीबेन पटेल
Getty Images
आनंदीबेन पटेल

पटेलों की राजनीतिक अहमियत

गुजरात राज्य के इतिहास में 1960 (जब से बॉम्बे सूबे से अलग गुजरात राज्य की स्थापना हुई) से लेकर अब तक सात बार पटेल नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ चुके हैं.

गुजरात राज्य के 57 साल के राज में 16 मुख्यमंत्री बदल चुके हैं और उसमें सात बार पटेल मुख्यमंत्री गुजरात की गद्दी पर बैठे हैं.

हालांकि, इसमें गुजरात राज्य की सबसे पहली पटेल महिला मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल का भी नाम शामिल है.

70 के मध्य में पटेलों ने गुजरात की राजनीतिक और सामाजिक बागडोर पर अपनी पकड़ जमाई और मज़बूती से शासन संभालने की शुरुआत की.

1981 में बक्शी कमीशन के सुझाव के बाद माधव सिंह सोलंकी के मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार ने सामाजिक और आर्थिक तौर से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की मांग की.

सोलंकी के इस कदम की वजह से पूरे राज्य में इस कदम का विरोध करते हुए उग्र और हिंसक प्रदर्शन हुए.

ऐसे माहौल के चलते सौ से ज़्यादा लोग इन हिंसक प्रदर्शनों में मारे गए थे और माधव सिंह सोलंकी को 1985 में इस्तीफ़ा देना पड़ा.

पटेलों के राजनैतिक वर्चस्व को सोलंकी ने कैसे ख़त्म किया यह बड़ा ही दिलचस्प है.

मोदी पोस्टर
Getty Images
मोदी पोस्टर

KHAM (खाम) थिओरी क्या है?

गुजरात में पटेलों के बढ़ते सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व को मद्देनज़र रखते हुए माधव सिंह सोलंकी ने पटेलों के वोटों के आगे एक बड़ा खेल खेला.

माधव सिंह सोलंकी ने पटेल समुदाय के वोटों को मात देने लिए क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम मतदाताओं को रिझाना शुरू किया.

जिसे राजनीतिक भाषा में खाम थिओरी कहा जाता है जिसमें क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के पहले अक्षरों को लेकर खाम शब्द गुजरात की राजनीति में प्रचलित किया गया.

खाम थिओरी के राजनीतिक प्रयोग ने माधवसिंह सोलंकी को फिर से गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया और 182 सीटों में से सोलंकी की कांग्रेस पार्टी ने 149 सीटें हासिल की.

भावेश शाह बताते हैं, "मोदी ने गुजरात की राजनीति को बेशक ही एक नई दिशा दिखाई है और एक नए परिमाण पर ले गए हैं पर कहीं न कहीं गुजरात की जनता के बीच इतनी बड़ी लोकप्रियता पाने के बावजूद वह माधव सिंह सोलंकी का 149 सीटें हासिल करने का रिकॉर्ड तोड़ नहीं पाए. इसी वजह से इस बार बीजेपी 150+ सीटें गुजरात में हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है."

फिर से पटेल

हालांकि, 1990 और 90 के मध्य दशक में पटेलों का वर्चस्व गुजरात की राजनीति और सामाजिक जीवन में अपनी चरमसीमा पर था. उस समय कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के हाथों में गुजरात की राजनैतिक कमान थी.

ऐसे में 1995 में सत्ता ने करवट ली और पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात की राजनैतिक बागडोर संभाली.

हालांकि, जनसंघ के समय से गुजरात की राजनीतिक कमान संभालने का ख्वाब भारतीय जनता पार्टी देख रही थी. 1952 में राजकोट में चिमनभाई शुक्ला ने पार्टी का पहला दीपक (जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक) जलाया था.

1990 के रामजन्मभूमि आंदोलन को लेकर सोमनाथ से शुरू की गई अयोध्या यात्रा की पृष्ठभूमि पर जब हिंदुत्व की लहर ज़ोरों से चल रही थी, तब भारतीय जनता पार्टी ने केशुभाई पटेल को एक पाटीदार चेहरे के तौर पर जनता के सामने पेश किया और बाकी फिर सब इतिहास है.

1995 में भारतीय जनता पार्टी को 182 में से 121 सीटें मिलीं और तब से पाटीदार-पटेल मतदाताओं को साथ रखकर भारतीय जनता पार्टी गुजरात में 1998 से लेकर आज तक लगातार चार बार अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही है.

गुजरात में बेरोज़गारी के कारण पाटीदारों का आंदोलन शुरू हुआ था
Reuters
गुजरात में बेरोज़गारी के कारण पाटीदारों का आंदोलन शुरू हुआ था

कैसे बदले समीकरण?

भारतीय जनता पार्टी अब तक सत्ता में इसलिए रही क्योंकि 1 करोड़ से भी ज़्यादा मतदाताओं में से 80-85% वोट भाजपा को मिलते आए हैं और 15-20% वोट कांग्रेस को मिलते आए हैं.

भावेश शाह कहते हैं, "हालांकि, इस बार यही समीकरण बदलने के पूरे आसार हैं और यही डर भाजपा को सता रहा है."

पाटीदारों के भारतीय जनता पार्टी से दूर होने के आसार 2010 के स्थानीय चुनावों से ही सत्ताधारी पक्ष को होने लगे थे.

उस वक्त के कद्दावर पाटीदार नेता एवं भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके केशुभाई पटेल की नाराज़गी के कारण पाटीदार समाज भाजपा से दूरी बना सकता है ऐसी संभावनाए देखी जा रही थी.

गुजरात की राजनीति के बदलते हुए इस राजनीतिक समीकरण को उस समय का नेतृत्व हलके में लेना नहीं चाहता था.

हालात को परखने में माहिर उस समय के भाजपा के नेतृत्व ने पटेलों के वोट से होने वाले नुकसान की भरपाई के पहलुओं को देखना शुरू कर दिया.

हार्दिक पटेल
Getty Images
हार्दिक पटेल

भाजपा ने किसे दी टिकट

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े गुजरात के राजनीतिक विश्लेषक किरण पटेल ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पटेलों का मिजाज़ परख चुके सत्ताधारी लोगों ने साल 2010 के स्थानीय निकाय के चुनावों में उस समय ओबीसी समुदाय को आगे किया."

किरण कहते हैं कि ओबीसी समुदाय के तहत छोटी-छोटी जातियां जैसे- सुथार (मिस्त्री), दर्जी, नाइ, कड़िया (राजगीर) आदि समुदायों को 2010 के स्थानीय निकाय के चुनाव में भाजपा ने टिकट दिए. इससे उसने कई सीटों पर निर्णायक भूमिका में रहे ऐसे समुदायों को भाजपा की और कर लिया.

ताकि ऐसे राजनीतिक माहौल में सवर्ण समुदाय जैसे कि पाटीदार, बनिया, ब्राह्मण, लोहाना आदि अगर भाजपा के विरुद्ध मतदान करें तो भी बीजेपी का नुकसान न हो.

इस तरह से गुजरात में इतिहास बन चुके खाम थिओरी के फार्मूला को उस समय के भाजपा के नेतृत्व ने ओबीसी कार्ड तहत एक नया रूप देकर चुनाव में प्रचंड जीत हासिल की थी.

इसी तर्ज़ पर 2012 के विधानसभा चुनावों में भी ओबीसी कार्ड खेलकर बीजेपी ने केशुभाई पटेल एवं गोरधन ज़डफिया की पाटीदार नेतृत्व वाली गुजरात परिवर्तन पार्टी को चुनाव में करारी शिकस्त दी थी.

हालांकि, मोदी के इसी ओबीसी कार्ड के चलते हुए पाटीदार समाज कहीं न कहीं आहत हुआ और आगे चलकर पाटीदार अनामत आंदोलन की शुरुआत हुई.

पाटीदारों में भाजपा के खिलाफ चल रही नाराज़गी और पाटीदार अनामत आंदोलन के चलते 2015 में स्थानीय चुनावों में भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों और इलाकों में भारी नुकसान भुगतना पड़ा जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को दिखाई देने लगा.

इसके फलस्वरूप जिस कांग्रेस पार्टी को पाटीदार अपना मत देने के लिए अछूत समझते थे, वो भावनाएं बदल चुकी हैं. काफी बड़ी मात्रा में पाटीदार समाज अब इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अपना वोट दे सकते हैं.

अब क्या?

गुजरात विधानसभा का चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है. जहां एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में जितनी भीड़ नहीं दिखती है वहीं दूसरी और 23 साल के हार्दिक पटेल की रैलियां भीड़ से भरी हैं.

ऐसे में पटेल किस दिशा में रुख कर सकते हैं?

इस सवाल का जवाब देते हुए किरण पटेल कहते हैं, "अब कड़वा और लेउवा पटेल की धार्मिक आस्था और सामाजिक संस्थान क्या निर्णय लेते हैं और पाटीदारों को क्या दिशा-सूचन मिलता है, इस पर गुजरात विधानसभा 2017 के चुनावों के नतीजे निर्भर करते हैं."

5 नवम्बर 2017 को हार्दिक पटेल ने ट्वीट किया था कि गुजरात में पाटीदार समाज के दो प्रमुख संस्थान हैं, खोडलधाम (कागवड) और उमियाधाम (उंझा) ये संस्थान हमारी ताकत हैं.

बीबीसी ने दोनों संस्थानों के प्रमुखों से बातचीत कर यह जानना चाहा कि दोनों संस्थानों ने पाटीदार समुदाय के लिए गुजरात के चुनावों को लेकर क्या आदेश जारी किए हैं.

उंझा स्थित उमियामाता संस्थान के प्रमुख विक्रम पटेल ने कहा, "हमें किसी राजनीतिक पार्टी से लेना-देना नहीं है."

हालांकि, विक्रम पटेल स्वीकार करते हैं कि जब पाटीदार अनामत आंदोलन का मसला सुलझ नहीं रहा था तब कड़वा पाटीदारों के वर्चस्व वाले उमियामाता संस्थान ने पाटीदार अनामत आंदोलन समिति और सरकार के बीच मध्यस्थता करवाई थी.

खोडलधाम संस्थान के प्रमुख परेश गजेरा यह मानते हैं कि 60% पटेल समाज गरीबी के तहत जीवन गुज़ार रहा है और उन्हें शिक्षण और व्यवसाय में आरक्षण कहीं न कहीं मदद ही होगी.

खोडलधाम संस्थान में लेउवा पाटीदारों का वर्चस्व है. उसके चेयरमैन नरेश पटेल और संस्थान के प्रमुख परेश गजेरा के साथ हार्दिक पटेल ने 30 दिसंबर के रोज़ 15 मिनट की मुलाकात की थी.

खोडलधाम संस्थान के चेयरमैन नरेश पटेल के साथ हार्दिक पटेल
BBC
खोडलधाम संस्थान के चेयरमैन नरेश पटेल के साथ हार्दिक पटेल

हार्दिक पटेल और खोडलधाम संस्थान के नेतृत्व की वार्ता के बाद संस्थान के प्रमुख परेश गजेरा ने मीडिया के सामने बातचीत 'अच्छी' होने के संकेत दिए थे.

साल 2010 से अब तक पाटीदार-पटेल समुदाय नाराज़ होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी मानती है कि पाटीदार-पटेल समाज आज भी उनके साथ है.

बीबीसी से बातचीत करते हुए राजकोट स्थित भारतीय जनता पार्टी के गुजरात प्रदेश प्रवक्ता राजू ध्रुव कहते हैं, "पटेलों के पास ज़मीन तो थी पर उन खेतों तक नर्मदा का पानी नरेन्द्रभाई और विजयभाई ने पहुंचाया है. ऐसा पाटीदार-पटेल स्पष्ट रूप से मानते हैं, दूसरा सरदार पटेल से लेकर आज तक गुजरात के नेतृत्व को लेकर पाटीदार-पटेल समुदाय कांग्रेस से नाराज़ है क्योंकि उनके साथ अन्याय ही हुआ है और इसीलिए पाटीदार-समाज कल भी भाजापा के साथ था और आज भी भाजपा के साथ है, इसमें कोई दो राय नहीं."

साथ में ध्रुव ये भी मानते हैं कि पाटीदार-पटेल समाज राष्ट्रवादी विचारधारा रखने वाले समुदायों में से एक होने के कारण वैचारिक रूप से वह कभी भी कांग्रेस के साथ नहीं जा सकता.

ध्रुव कहते हैं, "कांग्रेस की खाम राजनीति जिसकी वजह से पटेल समुदाय का अस्तित्व खतरे में आ गया था वो पाटीदार-पटेल आज तक नहीं भूल पाए हैं और इस वजह से वो कांग्रेस के साथ कभी नहीं जा सकते."

फिर भी मोदी की रैलियां खाली और हार्दिक की रैलियों में भीड़ क्यों होती है?

इस सवाल के जवाब में ध्रुव कहते हैं, "हार्दिक और उनके जैसे थोड़े भटके नौजवान समूचे पाटीदार समाज को गुमराह कर रहे हैं और उनकी रैलियों में भीड़ कांग्रेस के ज़रिये इकट्ठा की जाती है. पाटीदार-पटेल समाज भी अब हार्दिक की असलियत से वाकिफ़ हो चुका है कि हार्दिक का लक्ष्य आरक्षण से हटकर ख़ुद को राजनीति में आगे करना है."

भारतीय जनता पार्टी का पाटीदार-पटेलों का साथ होने के आत्मविश्वास के बीच सबसे बड़ी अगर कोई सेंध इस चुनाव में लग सकती है तो वो है, भाजपा और कांग्रेस के वोट शेयर को लेकर.

भावेश शाह कहते हैं, "जो 80-85% पाटीदार-पटेल के वोट भाजपा को मिलते हैं वहीं पर हार्दिक पटेल सबसे बड़ी सेंध करने की फ़िराक में है."

हार्दिक का कड़वा पटेल होने के कारण कड़वा पटेलों का समर्थन उनको हासिल है ऐसा माना जा रहा है.

भावेश शाह कहते हैं, "ऐसे हालात में लेउवा पटेलों का समर्थन हार्दिक को मिलना कहीं न कहीं मुश्किल दिख रहा था, पर हाल ही में खोडलधाम (जो की लेउवा पटेलों के वर्चस्व वाला संस्थान है) के नेतृत्व के साथ हार्दिक की 'अच्छी' रही वार्ता ने गुजरात के राजनीतिक गलियारों में सर्दी के दिनों में पारा गर्म कर दिया है."

एक तरफ 80-85% भाजपा को मिल रहा वोट शेयर है तो दूसरी तरफ 15-20% कांग्रेस को मिल रहा वोट शेयर है.

भावेश शाह कहते हैं, "अगर ये आंकड़ा 50-50% या 40-60% के आरपार भी हो गया तो भी कांग्रेस के वोट शेयर में बड़ा ही इज़ाफ़ा हो सकता है और फिर भले कांग्रेस सत्ता में न आए लेकिन एक मज़बूत विपक्ष के तौर पर गुजरात विधानसभा में बैठकर भाजपा को चुनौती दे सकती है."

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Two types of Patel Who is with Hardik and who is with Modi
Please Wait while comments are loading...

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.