राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बोले- मीडिया के एक वर्ग में पूर्वाग्रह की प्रवृत्ति

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राफेल मामले में याचिकाकर्ताओं की पुनर्विचार याचिका को मंजूरी देकर केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के एम जोसेफ मीडिया की इस केस में भूमिका को लेकर खेद जताया। उन्होंने कहा कि मीडिया के वर्ग में पूर्वाग्रह की प्रवृत्ति दिखाई देती रही है। ये परेशानी वाला रुझान है। गौरतलब है कि दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को बड़ी राहत दी थी।

'प्रेस के रवैये पर चिंता जताई'

'प्रेस के रवैये पर चिंता जताई'

जस्टिस के एम जोसेफ ने बुधवार को प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा कि यदि प्रेस जिम्मेदारी की गहरी समझ के बिना स्वतंत्रता का आनंद उठाया जाता है, तो ये लोकत्रंत को कमजोर कर सकता है। इसके एक वर्ग में पूर्वाग्रह का रुझान दिखाई देता है, जो परेशान करने वाला है। व्यावसायिक हितों और राजनीतिक निष्ठाओं को नियंत्रित करने से सूचनाओं के वितरण और निष्पक्ष तरीके से कार्य करने में कठिनाई होती है। अपने फैसले में उन्होंने लिखा कि भारत में प्रेस ने देश में लोकतंत्र की मजबूती में बहुत योगदान दिया है और देश में एक जीवंत लोकतंत्र में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि विजुअल मीडिया में बहुत ताकत है। वो असीम प्रतीत होता है, और आबादी को कोई भी वर्ग इसके प्रभावसे अछूता नहीं रह सकता है।

'सही सूचना उपभोक्ता का हक'

'सही सूचना उपभोक्ता का हक'

जस्टिस के एम जोसेफ ने कहा कि ये मसूसस करना चाहिए कि उपभोक्ता का ये हक है कि उसे मिलने वाली सूचना सच के अलावा अन्य कारणों से अप्रभावित रहनी चाहिए। मुझे लगता है कि स्वतंत्रता में ऐसे कई तत्व शामिल है। एक स्वतंत्र व्यक्ति को निर्भर होना चाहिए। किसी पत्रकार के लिए डर उसकी प्रिय चीजों को खोने का हो सकता है। एक स्वतंत्र व्यक्ति पूर्वाग्रही नहीं हो सकता है। पूर्वाग्रह कई रूपों में आता है। पूर्वाग्रह यदि सिद्धांतों के अनुसार स्थापित होता है तो ये सार्वजनिक प्राधिकरणों के निर्णयों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है। पूर्वाग्रह के खिलाफ नियम न्यायाधीशों द्वारा देखा जाने वाली एक सूक्ति है।

'पक्षपातपूर्ण सूचना सच्ची स्वतंत्रता की अनुपस्थति है'

'पक्षपातपूर्ण सूचना सच्ची स्वतंत्रता की अनुपस्थति है'

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने फैसले में कहा कि प्रेस जिसमें विजुअल मीडिया भी शामिल है पक्षपाती नहीं हो सकता है और फिर भी मुक्त हो सकता है। पक्षपातपूर्ण सूचना प्रसारित करना सच्ची स्वतंत्रता की अनुपस्थिति है। ये एक तथ्य है कि आर्टिकल19 (1) (ए) के तहत नागरिकों को मिलने वाली सच्ची सूचना का हनन है, जो नागरिकों के अन्य अधिकारों का आधार भी है। वास्तव में भारत में प्रेस का अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत नागरिकों के अधिकार से अधिक नहीं है।

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