इन 5 बातों में समझें न्याययिक सुधार पर PM मोदी का 'सुपर फैसला'
हालिया फैसले में सरकार दोषी ठहराए जाने से पहले ही मुकरर्र होने वाली सजा की आधी अवधि पूरी कर चुके कैदियों की रिहाई का रास्ता खोलने जा रही है। फैसले पर व्यक्तिगत राय-सुझावों में अंतर हो सकता है पर इससे जेलों का बोझ कम करने की दिशा में भी देखने की ज़रूरत है।
सरकार की इस सकारात्मक पहल से लगभग डेढ़ से पौने दो लाख विचाराधीन कैदियों के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगी है। यह न सिर्फ निजी तौर पर इन कैदियों के लिए राहत का कारण बनेगा, बल्कि इसका सीधा असर इनके परिजनों के लिए भी परोक्ष तौर पर राहत देने वाला साबित हो सकेगा-
इस फैसले को अपराधियों व अपराध को राहत दिए जाने की तरह देखने से पहले जानें वे बिन्दु जो भारत की न्यायपालिका के लिए चुभते हुए कांटे बन गए हैं। घुमाएं यह स्लाइडर और जानें आंकड़ों और तथ्यों से सजीं बुनियादी कमियां, जिनके चलते सरकार को यह फैसला करना पड़ा-

दोषी ठहराने से पहले 'जेलवास'
कानून की क्रमवार विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण सामने आया है कि व्यक्ति को अपराध के लिए दोषी ठहराए बिना ही उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ रही है व वह जेलों में कैद है। आज कुल कैदियों में दो तिहाई कैदी इसी का शिकार हैं।

'बोझ की पनाहगारें- जेल'
आज अपराधियों के लिए 'जन्नत' बन चुकीं भारतीय जेलों में क्षमता से अधिक कैदी इसे 'सुधार गृह' के संदर्भ से दूर कर रहे हैं। कई विचाराधीन कैदी हैं जो कानून की जटिल और सुस्त प्रक्रिया के कारण जेलों में रहने को मजबूर हैं।

सरकार का 'शुभ कदम'
जानकारों के मुताबिक अच्छे भले लोगों को आपराधिक प्रशिक्षण देने का अड्डा बन चुकी जेलों को अब 'सकारात्मक सुधार' की ज़रूरत है। मोदी सरकार की यह पहल न सिर्फ मानवाधिकारों के लिहाज से काफी अहम है, बल्कि कानूनी-सुधार को देखते हुए भी निर्णायक साबित हो सकेगी।

न्यायिक सुधार की कड़ी
केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों से विचाराधीन कैदियों का लेखा-जोखा मंगाया है। इसमें उन कैदियों की रिहाई का रास्ता साफ हो सकेगा जो ऐसे अपराधों के आरोपी हैं जिनकी सजा उम्र कैद या मृत्युदंड नहीं है और जो नियत सजा की आधी अवधि जेल में काट चुके हैं।

हैरत में डालते आंकड़े
आंकड़े बताते हैं कि भारत में केन्द्रीय कारागार और राज्य सरकारों की जेलों में कुल 3.81 लाख कैदी बंद हैं। हैरत की बात है कि इनमें से 2.54 लाख यानि दो तिहाई से अधिक विचाराधीन कैदी हैं। इतना ही नहीं अपने भाग्य के फैसले के इंतजार में कैद इन लोगों में लगभग 75 फीसदी कैदी छोटे मोटे अपराधों में 'अंदर' हैं।
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