बंगाल चुनाव: TMC में क्यों मुखर हो रहा है प्रशांत किशोर का विरोध
नई दिल्ली- पश्चिम बंगाल में 2021 के मई महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा तो इसकी तैयारी तीन वर्षों से कर रही है, बिहार चुनाव के बाद इसको लेकर कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां भी सक्रिय हो गई हैं। ममता बनर्जी के लिए तो यह चुनाव उनकी राजनीति को सुरक्षित रखने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। भाजपा की रणनीति की कमान खुद गृहमंत्री अमित शाह संभाल रहे हैं। कांग्रेस ने लोकसभा में अपने सदन के नेता अधीर रंजन चौधरी को इसी के लिए प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कोलकाता भेजा है। हालांकि, जमीन की राजनीति करने वाली तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी इस बार चुनाव की रणनीति तैयार करने का काम पेशेवेर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को आउटसोर्स कर चुकी हैं। लेकिन, लगता है कि वही प्रशांत किशोर अब पार्टी के कुछ विधायकों के लिए परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं। पार्टी के अंदर उनके खिलाफ जबर्दस्त तरीके से विरोध के सुर मुखर होने लगे हैं।

बीजेपी ने बंगाल चुनाव को पूरे दमखम और योजनाबद्ध रणनीति से लड़ने की तैयारी की है। इसके लिए पार्टी ने प्रदेश को पांच जोन में बांटा है और हर एक जोन की जिम्मेदारी केंद्रीय नेताओं को दी है। लेफ्ट को त्रिपुरा में सत्ता से बेदखल करने वाले पार्टी के रणनीतिकार सुनील देवधर ने कहा है, 'मुझे पूरा विश्वास है कि हम दो-तिहाई बहुमत से बंगाल जीतेंगे।' उन्हें मेदिनीपुर जोन का जिम्मा दिया गया है। इसी तरह रढ़ बंगा जोन बिनोद सोनकर को और उत्तर बंगा हरीश द्विवेदी और शिव प्रकाश को दिया गया है। कोलकाता की जिम्मेदारी दुष्यंत गौतम और अमिताभ चक्रवर्ती को दी गई है। नबादीप का जिम्मा दिग्गज बिनोद तावड़े और किशोर बर्मन को मिला है। ये सभी जोन प्रभारी आज से तीन दिनों तक आपस में बैठकें करके और स्थानीय नेताओं के साथ चर्चा करके प्रदेश में पार्टी की स्थिति का आंकलन करेंगे और अपनी रिपोर्ट शाह को भेजेंगे। इन नेताओं को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और संगठन मंत्री बीएल संतोष ने इस काम पर लगाया है कि वह स्थानीय नेताओं कार्यकर्ताओं का भी मनोबल बढ़ाकर रखें। जबकि, शाह और नड्डा भी समय-समय पर राज्य का दौरा करते रहेंगे।
पिछली बार जब अमित शाह इसी महीने कोलकाता पहुंचे थे तो उन्होंने पार्टी के लिए राज्य की 294 में से 200 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया था। पार्टी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय भी राज्य के सह-पर्यवेक्षक की किरदार में हैं। उनका कहना है, 'बंगाल ने अपना मन बना लिया है कि ममता बनर्जी को बाहर करना है और बीजेपी को 200 सीटें देना है।' लेकिन, सत्ताधारी टीएमसी की स्थिति अलग है। वह इस बार की चुनावी रणनीति के लिए प्रशांत किशोर और उनकी कंपनी पर निर्भर है। इस पर कटाक्ष करते हुए बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, 'कम से कम हम पार्टी को मजबूत करने के लिए भाड़े पर लोगों को नहीं रखते हैं। हमारे लोग पार्टी के कार्यकर्ता हैं जो चुनाव के लिए बंगाल आ रहे हैं।'
लेकिन, भाजपा जिस प्रशांत किशोर को लेकर टीएमसी पर तंज कस रही है, उनको लेकर खुद सत्ताधारी गठबंधन के अंदर भी भारी खलबली मची हुई है। खासकर जब वह शुरू में असंतुष्ट नेता सुवेंदू अधिकारी से मिलने में असमर्थ रहे तो उनके खिलाफ सुर और मुखर होने शुरू हो गए। पार्टी में उनकी गतिविधियों को लेकर उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले विधायकों और नेताओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। मुर्शीदाबाद जिले से एक टीएमसी एमएलए निमत शेख ने रविवार को एक सार्वजनिक सभा में कह दिया था कि, 'क्या हमें पीके से राजनीति सीखने की जरूरत है? पीके कौन है? अगर बंगाल में तृणमूल को नुकसान होता है, तो यह पीके की वजह से होगी।' कूच बिहार के विधायक मिहिर गोस्वामी ने तो डेढ़ महीने पहले ही उनके खिलाफ असंतोष जाहिर करते हुए संगठन का सारा पद छोड़ दिया था। उनके विरोध के सुर अभी भी नरम नहीं पड़े हैं। मंगलवार को ही उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि, 'क्या तृणमूल अभी भी ममता बनर्जी की पार्टी है?' उन्होंने लिखा, 'ऐसा लगता है कि पार्टी को एक ठेकेदार के हाथों में दे दिया गया है। आईपीएसी की तरह एक कॉर्पोरेट कंपनी को....वह आदेश देगा.......और मेरे जैसा एक दिग्गज नेता को उसका पालन करना होगा, यह दुखद है....' मंगलवार को ही कूच बिहार के ही सिताई के विधायक ने प्रशांत किशोर की कंपनी को लेकर ऐसे ही सवाल उठाए हैं।
लेकिन, तृणमूल नेतृत्व पीके खिलाफ बढ़ते विधायकों की तादाद को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है। उसके निशाने पर भाजपा और अमित शाह हैं। पार्टी सांसद सौगत रॉय ने कहा है, 'अमित शाह का टारगेट दिन में सपना देखने जैसा है जो कभी भी पूरा नहीं होगा। वह जो कहते हैं उनकी पार्टी सिर्फ उसकी रट लगाती है। उसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है।'
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