नज़रिया: ये बाबा साहब आंबेडकर का भारत नहीं है
आंबेडकर जयंती विशेष: गणतंत्र के 67 साल बाद भी सामाजिक और आर्थिक ग़ैरबराबरी क़ायम
आंबेडकर जयंती विशेष :
नवंबर के सर्दियों की सुबह थी - 1949 के 25 नवंबर का दिन.
देश आज़ाद हो गया था. संविधान सभा की आख़िरी बैठक चल रही थी. गणराज्य की स्थापना की तैयारियां आख़िरी दौर में थीं.
संविधान सभा में राय बनी कि मामले पर बहस का समापन बाबा साहब भीमराव आंबेडकर करें और उन सवालों का जवाब दें जो इस सिलसिले में उठे थे.
जिस व्यक्ति को सिर्फ ड्राफ्टिंग का ज़िम्मा दिया गया था, उनके लिए यह गौरव का क्षण था.
67 साल बाद भी दलितों को क्या मिला है?
'चमार रैप,' ये किस बदलाव की आहट है?
संविधान की ड्राफ्टिंग से आगे बढ़कर बाबा साहब उस समय तक देश के प्रमुख राष्ट्र निर्माताओं के तौर पर गिने जाने लगे थे.
तमाम सहमतियों और असहमतियों के साथ संविधान सभा जानती थी कि नए बनते राष्ट्र की चुनौतियों को समझने की एक समग्र दृष्टि बाबा साहब के पास है. इसलिए नेहरू, पटेल समेत कई वरिष्ठ सदस्यों के होते हुए भी बाबा साहब को यह ज़िम्मा सौंपा गया कि वे बहसों और आपत्तियों का जवाब दें.
बाबा साहब का वह ऐतिहासिक भाषण साबित हुआ. ऐतिहासिक इस मायने में नहीं कि इस भाषण में कोई अभूतपूर्व जोश या विद्वता थी. यह एक संयमित और बहुत संभलकर बल्कि सहमकर दिया गया भाषण है.
इस भाषण में बाबा साहब नए बनते राष्ट्र की चुनौतियों की ओर संकेत करते हैं और उन चुनौतियों से निबटने का उपाय बताते हैं.
इस क्षण तक बाबा साहब, भारत को राष्ट्र कहने से बचते हैं. वे भारत को एक बनता हुआ राष्ट्र यानी नेशन इन द मेकिंग कहते हैं.
एक वोट के सिद्धांत पर बात करते हुए वो ये भी साफ़ करते हैं कि देश में हालांकि वो समता नहीं तैयार हुई है.
वो आर्थिक-सामाजिक ग़ैरबराबरी को राष्ट्रनिर्माण में सबसे बड़ी बाधा मानते हैं.
हिंदू भारत के बीमार लोग हैंः आंबेडकर
उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि जातियों में बंटा भारतीय समाज एक राष्ट्र की शक्ल कैसे लेगा और आर्थिक और सामाजिक ग़ैरबराबरी के रहते वह राष्ट्र के रूप में अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे कर पाएगा?
वे यह आशंका जताते हैं और संविधान सभा को चेतावनी देते हैं कि अगर हमने इस ग़ैरबराबरी को ख़त्म नहीं किया तो इससे पीड़ित लोग उस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे, जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है.
उनकी एक और महत्वपूर्ण चेतावनी यह है कि अपनी मांगों को पूरा करने के लिए संविधानेतर आंदोलनों से अब परहेज़ करना चाहिए. इसे वे ग्रामर ऑफ एनार्की यानी अराजकता का रास्ता बताते हैं.
उनके मुताबिक़ ये संवैधानिक ढांचे को कमज़ोर करेगा.
आंबेडकर के आगे नतमस्तक क्यों संघ और भाजपा?
वो तैयार हो रहे राज्य तंत्र पर हिंदू सवर्ण पुरुषों के दबदबे को लेकर बहुत असहज और फिक्रमंद थे.
यहां वे अछूतों के राजनीतिक-सामाजिक अधिकार के लिए लड़ते योद्धा या हिंदू धर्म की बुराइयों से टकराते नेता के रूप में नहीं हैं. न ही वे यहां वकील या अर्थशास्त्री के रूप में अपनी बात कह रहे हैं.
यहां बाबा साहब राष्ट्र निर्माता के रूप में सामने आते हैं.
उनकी चिंताओं में कोई जाति या समूह नहीं है. वे इस मौक़े पर, बन रहे मुकम्मल राष्ट्र के पहले प्रवक्ता के तौर पर बोल रहे हैं. यह संविधानवादी आंबेडकर हैं, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के वैश्विक सिद्धांत पर मन, वचन और कर्म से विश्वास करते हैं.
राष्ट्र की परिभाषा बाबा साहब फ्रांस के दार्शनिक अर्न्स्ट रेनन से लेते हैं. रेनन नहीं मानते कि एक नस्ल, जाति, भाषा, धर्म, भूगोल या साझा स्वार्थ किसी जनसमुदाय को राष्ट्र बना सकते हैं.
रेनन के लिए राष्ट्र एक साझा विचार है, जो इसलिए है क्योंकि इसमें मौजूद हर व्यक्ति ख़ुद को राष्ट्र का हिस्सा मानता है, इस मायने में यह हर दिन चलने वाला जनमत संग्रह है. रेनन और बाबा साहेब दोनों के लिए राष्ट्र एक पवित्र विचार है, जिसमें हर सदस्य का साझा है.
इसलिए संविधान सभा के आख़िरी भाषण में बाबा साहब आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी के ख़ात्मे को राष्ट्रीय एजेंडे के रूप में सामने लाते हैं.
उनकी कामना थी कि संवैधानिक संस्थाएं वंचित लोगों के लिए अवसरों का रास्ता खोले और उन्हें लोकतंत्र में हिस्सेदार बनाए. राष्ट्रीय एकता के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है.
इसलिए संविधान के मूल अधिकारों के अध्याय में अवसरों की समानता के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भी विशेष अधिकार का प्रावधान किया गया है. आरक्षण का सिद्धांत वहीं से आता है.
यह करोड़ों की आबादी वाले भारत में वंचित जाति समूहों के हर सदस्य को नौकरी देने के लिए नहीं है.
आरक्षण का मक़सद यह है कि वंचित जातियों को महसूस हो कि देश में मौजूद अवसरों में उनका भी हिस्सा है और देश चलाने में उनका भी योगदान है.
इसलिए संविधान अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, महिलाओं सबका ख्याल रखता हुआ नज़र आता है.
22 दिसंबर, 1952 को पूना में वकीलों की एक सभा में बाबा साहब बोलते हैं, "लोकतंत्र शासन की वह पद्धति है, जिसमें लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में बदलाव बग़ैर ख़ूनख़राबे के संभव हो."
बहरहाल 25 नवंबर,1949 की उस सर्द सुबह पर लौटते हैं. बाबा साहब के इस भाषण के बाद संविधान सभा के अध्य्क्ष राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा की बैठक को अगले दिन के लिए स्थगित करने की घोषणा करते हैं.
अगले दिन, 26 नवंबर को संविधान सभा संविधान को स्वीकार कर लेती है.
दो महीने बाद, 26 जनवरी,1950 को "भारत के लोग" ख़ुद को अपना संविधान सौंपते हैं और गणराज्य बन जाते हैं.
लेकिन उसके बाद की कहानी एक विराट मोहभंग की कहानी है.
बाबा साहब ने उसी दिन कहा था कि हम सबसे अच्छा संविधान लिख सकते हैं, लेकिन उसकी कामयाबी आख़िरकार उन लोगों पर निर्भर करेगी, जो देश को चलाएंगे.
गणराज्य की स्थापना के 67 साल बाद भी सामाजिक और आर्थिक ग़ैरबराबरी को ख़त्म करने का एजेंडा पूरा नहीं हो सका है.
असमानता पहले से ज्यादा विकट हुई है.
पूर्वोत्तर, कश्मीर, और मध्यभारत के बड़े इलाके असंतोष के कारण हिंसाग्रस्त हैं. जाति अपने विकराल रूप में मौजूद है.
यूनिवर्सिटी, कॉरपोरेट जगत, मीडिया, संस्कृति और नौकरशाही जातिवाद के नए गढ़ हैं.
भारत मानव विकास के तमाम मानकों पर दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में एक है. यह ग्लोब के सर्वाधिक अंधेरे कोनों में से एक है.
भारतीय लोकतंत्र को और सुंदर होना चाहिए था.
देश चलाने वालों ने बाबा साहब को निराश किया है. यह संविधान सभा और बाबा साहब की कल्पना का राष्ट्र नहीं है.
ऐसा क्यों हुआ, और इसके जिम्मेदार कौन हैं, यह एक और बहस है.
(लेखक समाजशास्त्र के शोधार्थी हैं)
-
'मैंने 6 मर्दों के साथ', 62 साल की इस बॉलीवुड एक्ट्रेस ने खोलीं लव लाइफ की परतें, 2 शादियों में हुआ ऐसा हाल -
Delhi Riots: जिसने पूरी जिंदगी ईर्ष्या की, उसी के निकाह में 6 साल जेल काटकर पहुंचे Sharjeel Imam, दूल्हा कौन? -
Uttar Pradesh Silver Rate Today: ईद पर चांदी बुरी तरह UP में लुढकी? Lucknow समेत 8 शहरों का ताजा भाव क्या? -
Gold Silver Rate Crash: सोना ₹13,000 और चांदी ₹30,000 सस्ती, क्या यही है खरीदारी का समय? आज के ताजा रेट -
Mojtaba Khamenei: जिंदा है मोजतबा खामेनेई! मौत के दावों के बीच ईरान ने जारी किया सीक्रेट VIDEO -
US-Iran War: ‘पिछले हालात नहीं दोहराएंगे’, ईरान के विदेश मंत्री ने Ceasefire पर बढ़ाई Trump की टेंशन? -
iran Vs Israel War: ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला, अमेरिका-इजराइल की भीषण बमबारी से दहला नतांज -
ईरान का गायब सुप्रीम लीडर! जिंदा है या सच में मर गया? मोजतबा खामेनेई क्यों नहीं आ रहा सामने, IRGC चला रहे देश? -
Love Story: बंगाल की इस खूबसूरत नेता का 7 साल तक चला चक्कर, पति है फेमस निर्माता, कहां हुई थी पहली मुलाकात? -
'मेरे साथ गलत किया', Monalisa की शादी मामले में नया मोड़, डायरेक्टर सनोज मिश्रा पर लगा सनसनीखेज आरोप -
Mathura News: 'फरसा वाले बाबा' की हत्या से ब्रज में उबाल! दिल्ली-आगरा हाईवे जाम, CM योगी ने लिया एक्शन -
Strait of Hormuz में आधी रात को भारतीय जहाज का किसने दिया साथ? हमले के डर से तैयार थे लाइफ राफ्ट












Click it and Unblock the Notifications