मुक्के बरसाकर जीते मेडल तो बदली लोगों की सोच: अंकुशिता बोडो

"मैंने जब बॉक्सिंग की शुरुआत की थी उस समय गांव में कोई भी लड़की बॉक्सिंग नहीं करती थी. इसलिए शुरू में लोगों ने मेरे पिता से कहा था कि लड़की को बॉक्सिंग में भेजना ठीक नहीं हैं. लेकिन मैंने जब देश के लिए मेडल जीते तो लोगों की सोच बदल गई. आज उसी गांव के लोग अपनी बेटियों को बॉक्सिंग सिखाने के लिए मेरे घर वालों से पूछने आते हैं."
यह कहना है पूर्वोत्तर राज्य असम के शोणितपुर ज़िले के एक छोटे से गांव ठेलामारी से आने वाली युवा अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर अंकुशिता बोडो का.
अंकुशिता ने रविवार को गुवाहाटी में खेले गए युवा महिला विश्व चैम्पियनशिप-2017 में 64 किलोग्राम भारवर्ग की स्पर्धा के फ़ाइनल में रूस की डाइनिक एकाटेरिना को हराकर गोल्ड मेडल जीत लिया है. इतना ही नही इस चैम्पियनशिप में अंकुशिता बोडो ने सर्वश्रेष्ठ बॉक्सर का ख़िताब भी अपने नाम किया.
चैम्पियनशिप में भारत का अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन रहा. अंकुशिता के अलावा नीतू ने 48 किलोग्राम वर्ग में, ज्योति ने 51 किलोग्राम वर्ग में, साक्षी ने 54 किलोग्राम वर्ग में और शशि चोपड़ा ने 57 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीते. इस तरह भारत की झोली में कुल 5 गोल्ड मेडल आ गए हैं.
मैरी कॉम अब बनेंगी 'सुपर गर्ल'
अपने अबतक के बॉक्सिंग करियर पर अंकुशिता ने बीबीसी से कहा, "किसी भी खेल में आगे आने के लिए घर वालों का समर्थन होना ज़रूरी होता है. मेरे पिता ने गांव के लोगों की बातों को दरकिनार कर मुझे बॉक्सिंग में आगे आने में मदद की. हमारे परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं हैं. मेरे पिता प्राइवेट स्कूल में शिक्षक है वहां वेतन के नाम पर बहुत कम पैसे मिलते हैं और कई बार महीनों तक कुछ नहीं मिलता. ऐसी स्थिति में उनके लिए घर का ख़र्च चलाना ही मुश्किल था तो मैं अपनी बॉक्सिंग से जुड़ी जरूरतों के बारे में कुछ मांगने का साहस ही नहीं कर पाती थी."
शुरुआती संघर्ष
अंकुशिता आगे कहती हैं, "इस तरह शुरुआत में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. मेरे दादाजी ने हमारे परिवार की काफी मदद की. बाद में मेरे एक भैया मुझे गोलाघाट स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में ले गए और वहां मेरा चयन हो गया."
अंकुशिता ने कहा, "मैंने साल 2012 से बॉक्सिंग शुरू की थी. जब नया बॉक्सिंग फेडरेशन बना तो नई दिल्ली में खेले गए पहले युवा नेशनल चैम्पियनशिप में मैंने कांस्य पदक जीता था और यहीं से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. मैने मैरी कॉम, शिव थापा को खेलते देखा था और इसलिए मैंने बहुत मेहनत की. जिसके बाद हाल ही में बुल्गारिया में संपन्न हुए बाल्कन यूथ इंटरनेशनल बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में मैंने सिल्वर मेडल जीता है."
इसके अलावा, इस्तांबुल में आयोजित 31वें अंतरराष्ट्रीय इंटरनेशनल अहमेट कॉमर्ट बॉक्सिंग टूर्नामेंट में अंकुशिता भारत के लिए सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं.
अंकुशिता ने कहा कि उनका लक्ष्य इस विश्व चैम्पियनशिप में देश के लिए गोल्ड जीतना था. अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए वो थोड़ी उदास ज़रूर हो जाती हैं, लेकिन साथ ही कहती हैं, "अगर बॉक्सिंग नहीं सीखी होती तो आज यहां नहीं होती."
मैरी कॉम ने की तारीफ़
यही वजह है कि पांच बार विश्व चैम्पियन रही मैरी कॉम ने हाल ही में अंकुशिता की तकनीक और उसके खेल के अंदाज की तारीफ की थी.
अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ (एआईबीए) ने इस बार महिला विश्व युवा मुक्केबाजी चैंपियनशिप के लिए मैरी कॉम को अपना एम्बेसडर नियुक्त किया था और शहर में इस खेल के जो पोस्टर लगाए गए उसमें मैरी कॉम के साथ अंकुशिता की तस्वीर भी है.
एआईबीए की और से गुवाहाटी में 19 नंवबर से शुरु हुई महिला विश्व युवा मुक्केबाजी चैंपियनशिप में भारतीय टीम की तरफ से कुल 10 महिला बाक्सरों ने हिस्सा लिया था.
भारतीय बॉक्सिंग टीम के मुख्य कोच भास्कर भट्ट ने कहा, "इस बार हमारी महिला बॉक्सर काफी तैयारी के साथ रिंग में उतरी थी. हमारी बॉक्सर ने सभी 10 वेट कैटेगरी में हिस्सा लिया और अच्छे खेल का प्रदर्शन किया हैं. हमने रैंकिंग में इस चैम्पियनशिप में खुद को साबित करते हुए सबसे ज्यादा गोल्ड मेडल जीते हैं."
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