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नजरिया: सत्ता की कुर्सी से सरहद का सच कड़वा लगता है

बीते 2 हफ्तों में हम 30 जवान खो चुके हैं। देश का हर नेता लगभग यही कह रहा है कि हम बदला लेंगे और देश को सेना पर भरोसा है लेकिन क्या सेना को देश पर भरोसा रह पाएगा! पढ़ें यह विश्लेषण।

परिणामों के साथ चुनाव बीत गए। जोड़ तोड़ से ही सही लेकिन सरकारें भी बन ही गईं। फिर भी सरहद पर तनाव है। आप मानें या ना मानें लेकिन सरहद पर तनाव और देश के किसी हिस्से में चुनाव, एक दूसरे के पूरक हैं। सिर्फ सरहद ही नहीं सरहद के भीतर भी हम तमाम विभीषणों से जूझ रहे हैं।

बीते 2 हफ्ते के भीतर अगर मिलिट्री और पैरामिलिट्री में फर्क ना किया जाए तो हम 30 जवान खो चुके हैं। 25 देश के भीतर। 5 सरहद पर। प्रभार में मिले रक्षा मंत्रालय के प्रभारी (मंत्री ) अरुण जेटली जी ने कहा है कि देश को सेना पर भरोसा है। बेशक है लेकिन अगर यही हाल रहा तो क्या सेना , देश या उसकी ओर से चुने गए लीडरानों पर भरोसा कर सकेगी?

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कहां गई सुषमा?

एक वक्त था जब नेता विपक्ष रहीं आज की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा में 1 के बदले 10 सिर लाने की बात कही थी, तो उनकी इस बात पर विपक्ष ने सदन में खूब मेज थपथपाई। अब क्या जवानों के सिर नहीं काटे जा रहे हैं या फिर सुषमा जी कुछ भी बोलने में अक्षम हैं। हो सकता है कि विदेश मंत्री बनने के बाद वो पाकिस्तान के मामले पर बोलने की योग्यता खो बैठी हों।

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नोटबंदी के दौरान लाइन में लगे लोगों को सेना का लेक्चर देकर जिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा था कि जवान सीमा पर खड़ा है, आप लाइन में नहीं लग सकते! क्या वो लोग यह सच स्वीकार करने की कोशिश करेंगे कि नेता एसी कमरो में पड़े हैं और जवान का सिर काटा जा रहा है।

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क्या हमें ऐसा रक्षामंत्री चाहिए था!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना सब कुछ मानने वाले आज के गोवा सीएम और कुछ महीने पहले तक रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने यह साफ कह दिया कि उन्होंने दबाव में 'घर वापसी' का रास्ता चुना। क्या हमें ऐसे ही रक्षामंत्री की जरूरत थी?

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और फिलहाल रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे अरुण जेटली की योग्यता पर तो सवाल पहले भी उठते रहे हैं। एक साक्षात्कार के दौरान पूर्व कानून मंत्री ,मौजूदा राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने कहा था कि अगर कालाधन लाना है तो जेटली को वित्त मंत्री के पद से हटाइए। पाकिस्तान की समस्या का हल करना है तो भी जेटली को रक्षा मंत्री के पद से हटाएं।

जब आडवाणी का के लड़ रहे थे जेटली!

इतना ही नहीं आज बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में आरोपी, पूर्व उप-प्रधानमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का राजनीतिक करियर जब जीएन हवाला केस के चलते दांव पर लगा हुआ था। उस वक्त भी जेटली उनका केस लड़ रहे थे। आखिर में जेटली और आडवाणी दोनों को राम जेठ मलानी की शरण में जाना पड़ा था। साल 2015 की 22 दिसंबर को जेठमलानी ने यह बात खुद कही थी कि आडवाणी जीएन हवाला केस में मेरी वजह से जीते थे।

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बेशक, जेटली जी लुटियन्स की संकरी गलियों और रायसीना हिल्स की चौड़ी सड़कों पर भी नदी वाली रैफ्टिंग कर लेते होंगे लेकिन रक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त प्रभार को वो संभाल नहीं पा रहे हैं। कहने वाले यह कह सकते हैं कि जब कांग्रेस की सरकार थी तो क्या जवानों की शहादत नहीं होती थी? लेकिन एक सच यह भी है कि बीते साल 2016 में सरहद पर दोनों ओर से बीते कुछ दशकों में सबसे ज्यादा गोलाबारी हुई। अकेले साल 2016 में ही 437 बार सीजफायर का उल्लंघन हुआ था।

अब वक्त कड़ी निंदा का....

दरअसल, आज वक्त कड़ी निंदा का है। विपक्ष में रह कर पाकिस्तान को आंखे दिखाने वाले हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह अब आंखें चुराने वाले अंदाज में कह रहे हैं 'दूसरी ओर से गोली चले तो फैसला वहीं पर करना'। दूसरी ओर से सीधा मतलब पाकिस्तान से है। होना भी चाहिए। लेकिन सिर्फ जवानों के सामने लेक्चर देने से और मीडिया के सामने कड़ी निंदा कर देने से क्या हो जाएगा? थोड़ी देर के लिए जवान उत्साहित होगा। कुछ देर आपकी कड़ी निंदा वाली ट्वीट या बाइट से बनी खबरों को जनता पढ़कर आत्ममुग्ध हो लेगी लेकिन अगला दिन कितने और जवानों की शहादत लाएगा, ये किसको पता है?

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जब झंडे से तय हो रहा था राष्ट्रवाद का मानक

देश के भर के तमाम विश्वविद्यालयों में झंडे की ऊंचाई से राष्ट्रवाद मानक तय करने वाली पूर्व मानव संसाधन और विकास मंत्री, फिलहाल केंद्रीय वस्त्र मंत्री स्मृति ईरानी जी ने साल 2013 में हेमराज का सिर काटे जाने पर पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह की सरकार को चूड़ियां गिफ्ट की थीं लेकिन अब शायद उनके मनपसंद रंग की चूड़ियां नहीं मिल रही हैं।

आखिर में सिर्फ इतना ही कि हमें यह सिखाया जाता है कि जब भी संकट का समय हो तो सरकार के साथ रहें। लोग रहते भी हैं। लेकिन क्या सरकार संकट के समय अपने देश, सेना और सैन्य कर्मियों के साथ खड़ी रहती है? अगर बात कुछ मीटिंगों, लेक्चरों और भाषणों की छोड़ दे तो!

कहने वाले यह कहते रहेंगे कि ये तो उनके भी राज में भी हुआ था तो क्या भाजपा ने अच्छे दिनों का वादा सिर्फ राज करने के लिए प्रयोग किया था?

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