कैप्टन जीआर गोपीनाथ: सस्ती हवाई यात्रा के सपने को सच करने वाला शख्‍स

नई दिल्‍ली। बात साल 2005 की गर्मी के दिनों की है। आर्मी से रिटायरमेंट लेकर बिज़मैन बने जीआर गोपीनाथ ने घोषणा की कि वो एक रुपये में लोगों के लिए हवाई यात्रा मुमकिन बनाएंगे। उस दौर में देश की पहली बजट एयरलाइन कंपनी के संस्थापक गोपीनाथ का किया वादा कोई मामूली बात नहीं थी।

कैप्टन जीआर गोपीनाथ
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कैप्टन जीआर गोपीनाथ

'ईजीजेट' और 'रायनएयर' जैसे यूरोपीय बजट एयरलाइन्स से प्रेरणा लेकर बनी उनकी दो साल पुरानी एयरलाइन कंपनी 'एयर डेक्कन' अब लाखों लोगों को कम कीमत में हवाई उड़ान का मौका दे रही थी। उनके प्रतिद्वंद्वियों के मुक़ाबले उनकी कंपनी की टिकटों की कीमतें लगभग आधी थीं।

'एयर डेक्कन' एक 'नो फ्रिल्स एयरइन्स' थी यानी ऐसी विमान सेवा जिसमें यात्रा की क़ीमतें कम रखी जाती हैं और इसके लिए यात्रियों को केवल ज़रूरी सुविधाएं ही दी जाती हैं। यात्रा को सस्ता करने के लिए इन-फ्लाइट इंटरटेनमेंट, फ्लाइट के दौरान खाना और बिजनेस क्लास सीटिंग जैसी गैर-ज़रूरी सुविधाओं पर खर्च नहीं किया जाता।

कैप्टन गोपीनाथ की एयरलाइन कंपनी ने 'डाइनैमिक प्रांइसिंग' व्यवस्था शुरू की जिसके तहत पहले टिकट खरीदने वाले कुछ उपभोक्ता मात्र एक रुपये में यात्रा कर सकते थे। इस व्यवस्था के तहत जो लोग देर से टिकट खरीदते थे उन्हें टिकट की अधिक कीमत देनी होती थी, लेकिन दूसरी कंपनियों के मुक़ाबले य़े फिर भी काफी कम होती थीं।

इसमें आश्चर्य की बात नहीं थी कि एयरलाइन के टिकट काउंटर पर उपभोक्ताओं की लाइनें लगी रहती थीं, इनमें कई लोग ऐसे भी होते थे जिन्होंने अपने जीवन में पहले कभी हवाई यात्रा नहीं की। लेकिन आलोचकों का मानना था कि कम क़ीमतों में हवाई यात्रा की सुविधा देने की ये व्यवस्था इस इंडस्ट्री के लिए नुक़सानदेह साबित होगी।

कैप्टन गोपीनाथ ने अपनी आत्मकथा मे लिखा है, "एक रुपये में हवाई यात्रा का टिकट- इसने लोगों का कल्पनाओं को नई उड़ान दी और जल्द ही इस बारे में चर्चा बढ़ने लगी।" उनका मानना था कि उनकी कंपनी ने "न केवल आम लोगों के लिए हवाई उड़ान की महंगी क़ीमतों के बंधन को ख़त्म किया बल्कि हवाई उड़ान के क्षेत्र में जाति और वर्ग के भेद को भी ख़त्म किया।"

कैप्टन गोपीनाथ पर फ़िल्म
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कैप्टन गोपीनाथ पर फ़िल्म

इसी सप्ताह अमेज़न प्राइम वीडियो पर "सुराराई पोट्रू" नाम की एक तमिल फ़िल्म रिलीज़ की गई है जो इस महान बिज़नेसमैन को संघर्ष को दर्शाती है। कैप्टन गोपीनाथ की आत्मकथा पर आधारित इस फ़िल्म को प्रोड्यूस किया है अकादमी अवार्ड जीतने वाले गुनीत मोंगा ने।

मोंगा ने बीबीसी को बताया, "ये धनी और मध्य वर्ग के दो तबकों के बीच दूरी ख़त्म करने की कोशिश की बेहतरीन कहानी है। कैप्टन गोपीनाथ की शुरू की गई सस्ती उड़ान सेवा को लेकर देश के अधिकांश लोगों में उत्साह था।" इस फ़िल्म में तमिल फ़िल्मों के अभिनेता सूर्या ने बिज़नमेसमैन कैप्टन गोपीनाथ की भूमिका निभाई है. वो कहते हैं, "वो भारतीय विमानन क्षेत्र में क्रांति लेकर आए थे और आसमान में उड़ने को लेकर जो आर्थिक बंधन था उन्होंने उसको तोड़ा था।"

"सुराराई पोट्रू" में हर वो बात है जो एक कमर्शियल तमिल सिनेमा में होता है- इसमें गाना है, डांस है, इसमें जाति और वर्ग के भेद दिखाया गया है, इसमें ऐक्शन भी है और ये मेलोड्रामा से भी भरपूर है लेकिन ये फ़िल्म ये भी बताती है कि किस तरह कैप्टन गोपीनाथ ने देश में खाली पड़े 500 हवाईअड्डों और हवाई पट्टियों को ढूंढा ताकि देश के छोटे इलाक़ों में भी हवाई सेवा शुरू की जा सके।

इसमें दिखाया गया है कि कैसे अधिक पैसों की ज़रूरत पड़ने पर उनकी पत्नी ने अपने बैंकिंग बिज़नेस से कमाई अपनी सारी जमापूंजी उन्हें दी। और कैसे आर्मी में काम करने वाले उनके दोस्त इस सपने को पूरा करने में उनके सबसे अहम सहयोगी साबित हुए।

सूर्या कहते हैं, "ये फ़िल्म समानता और सभी को शामिल करने के बारे में है. ये वो मुद्दे हैं जिनके लिए कैप्टन गोपीनाथ ने कोशिश की. कभी-कभी ऐसा लगता है कि उनके उद्देश्य उनकी काबिलियत से कहीं बढ़ कर थे, वो अपनी कोशिश में नाकाम भी हुए और दिवालिया हो गए लेकिन उनमें कभी भी हार न मानने की जो ज़िद थी को क़ाबिलेतारीफ़ थी."

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कैप्टन गोपीनाथ पर फ़िल्म
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कैप्टन गोपीनाथ पर फ़िल्म

इस फ़िल्म को बढ़िया रिव्यू भी मिल रहे हैं. फ़िल्म देख कर निकले एक दर्शक ने बताया कि ये "दिलचस्प फ़िल्म" है. एक अन्य दर्शक ने कहा कि "ग़रीबी से अमीरी की तरफ जाने की इस कहानी में देश की जाति व्यवस्था पर करारा हमला किया गया है."

एक अन्य आलोचक कहते हैं कि "ये चर्चा में नहीं रहने वाले एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिन्होंने मेहनत से अपनी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की." कैप्टन गोपीनाथ का जन्म कर्नाटक के एक सुदूर गांव में हुआ था. उनके पिता शिक्षक थे और खेती का काम भी करते थे जबकि उनकी मां गृहिणी थीं. उन्होंने आर्मी ज्वाइन की और साल 1971 में हुई बांग्लादेश की लड़ाई तक आर्मी में रहे.

28 साल की उम्र में उन्होंने आर्मी से रिटायरमेंट ले ली. कुछ नया करने की उनकी कोशिश में अपने दोस्तों से मदद लेकर उन्होंने सिल्क की खेती और हॉस्पिटैलिटी जैसे कई बिज़नेस में हाथ आजमाया। कैप्टन गोपीनाथ ने बीबीसी को बताया था, "जब मैं युवा था मुझमें कुछ नया करने की बेचैनी थी और मैं चाहता था कि धन तक सभी की पहुंच हो."

वो कहते थे कि उन्हें उनके दोस्तों ने बताया था कि सपने देखना ही काफी नहीं है बल्कि "सपने बेच सकना" ज़रूरी है. साल 1997 में उन्होंने एक निजी कंपनी के तौर पर हेलिकॉप्टर सेवा शुरू की. उन्होंने बताया, "कंपनी का कहना था, मैप पर कोई भी जगह दिखाइए, हम आपको वहां तक पहुंचाएंगे."

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कैप्टन जीआर गोपीनाथ
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कैप्टन जीआर गोपीनाथ

साल 2000 में अमेरिका में छुट्टियां मनाना के दौरान उन्हें भारत में सस्ती विमान सेवा शुरू करने का ख़याल आया. फीनिक्स में उन्होंने एक स्थानीय एयरपोर्ट देखा जहां से लगभग एक हज़ार उड़ाने चलती थीं और जो हर दिन क़रीब एक लाख यात्रियों को सेवाएं देता था.

उन्होंने बताया कि उनके लिए ये सोच पाना उस वक्त मुश्किल था कि अमेरिका का एक मामूली-सा एयरपोर्ट (जो देश के बड़े एयरपोर्ट में भी शुमार नहीं है) इतनी उड़ानें संचालित करता है जितना भारत के 40 एयरपोर्ट मिलकर भी नहीं करते.उन्होंने इस बारे में और जानकारी इकट्ठा की और पाया कि पूरे अमेरिका में एक दिन में 40,000 कमर्शियल उड़ानें चलती हैं जबकि भारत में केवल 420.

उन्होंने तुरंत एक छोटा सा हिसाब किया कि अगर भारत में बसों और ट्रेनों में चलने वाले तीन करोड़ लोगों में से सिर्फ 5 फीसदी लोग हवाई जहाज़ों में आएं तो इसका अर्थ ये होगा कि विमानन बिज़नेस को साल में 53 करोड़ उपभोक्ता मिलेंगे. उन्होंने समझाया, "ये आंकड़ा दिखने में बड़ा लगता है लेकिन वाकई है नहीं क्योंकि इसका मतलब ये नहीं है कि 53 करोड़ लोग हवाई जहाज़ों में यात्रा करेंगे. इसका मतलब है कि 20 करोड़ मिडल क्लास साल में ढाई बार यात्रा करेंगे. अगले तीस साल के हिसाब से देखें ये आंकड़ा सोच से परे लगता है."

कैप्टन गोपीनाथ कहते हैं, "जब मैं भारत आया तो मैं यही सोच रहा था कि देश में आम आदमी को भी हवाई जहाज़ में बैठने की सुविधा मिलनी चाहिए."

एयर डेक्कन
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एयर डेक्कन

अगस्त 2003 में कैप्टन गोपीनाथ ने 48 सीटों और दो इंजन वाले छह फिक्स्ड-विंग टर्बोप्रॉप हवाई जहाज़ों के बेड़े के साथ एयर डेक्कन की स्थापना की. कंपनी की पहली उड़ान दक्षिण भारतीय शहर हुबली से बेंगलुरू के बीच थी. साल 2007 में देश के 67 हवाईअड्डों से एक दिन में इस कंपनी की 380 उड़ानें चलाई जा रही थीं. कंपनी के हवाई जहाज़ों का बेड़ा अब 45 विमानों का हो चुका था.

जब कंपनी शुरू हुई थी उस वक्त रोज़ केवल दो हज़ार लोग कंपनी के विमानों में हवाई सफर कर रहे थे लेकिन अब हर रोज़ 25,000 लोग सस्ती क़ीमतों पर हवाई सफर कर रहे थे. एक रुपये के टिकट पर क़रीब तीस लाख लोगों ने हवाई सफर किया.

लेकिन वक्त के साथ कंपनी का घाटा बढ़ता गया और कंपनी के लिए बढ़ती कीमतों के साथ तालमेल बैठाना मुश्किल होता गया. साल 2007 में कैप्टन गोपीनाथ ने एयर डेक्कन को शराब के कारोबारी विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर को बेच दिया. विजय माल्या किंगफिशर एयरलाइन्स के भी मालिक थे. माल्या ने एयर डेक्कन का नया नाम दिया - किंगफिशर रेड.

इस वक्त तक देश के विमानन मार्केट में कई और कंपनियां भी कूद पड़ी थीं जो उपभोक्ताओं को सस्ती हवाई यात्रा दे रही थीं. साल 2018 में देश के भीतर सस्ती उड़ानों में 14 कोरड़ लोगों ने यात्रा की. एयर डेक्कन के विमान अब आसमान में उड़ान नहीं भरते. साल 2011 के सितंबर में घाटे में चल रही माल्या की कंपनी किंगफिशर रेड ने भी काम बंद कर दिया. बाद में उनका पूरा बिज़नेस ही दिवालिया हो गया.

साल 2012 में कैप्टन जीआर गोपीनाथ ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था, "माल्या के पास कंपनी के लिए कभी वक्त था ही नहीं. मेरा मानना है कि अगर उन्होंने कंपनी पर ध्यान दिया होता तो इस क्षेत्र में उनसे बेहतर कोई और हो ही नहीं सकता था." उन्होंने कहा था, "ये दुख की बात है लेकिन एयर डेक्कन का सपना अब भी जीवित है और सस्ती उड़ान सेवा के लिए क्रांति भी जारी है."

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