श्रीनिवासन परिवार के 50 साल पुरानी रॉयल एनफ़ील्ड बुलेट से प्रेम की कहानी

Click here to see the BBC interactive

कहते हैं प्यार की तलाश में इंसान सालों तक भटक सकता है. कई बार तो ये कभी पूरी न होने वाली तलाश बन जाती है.

ऐसे कई उदाहरण हैं लेकिन धातु की किसी चीज़ के लिए दीवानगी 50 साल तक बनी रहे, ऐसा आम तौर पर देखने को नहीं मिलता.

The love story of the Srinivasan family with the 50 year old Royal Enfield Bullet

दरअसल, ये एक अलग तरह की प्रेम कहानी है, जिसमें 75 साल के एन श्रीनिवासन अपना 'प्यार' तलाशते रहे. उनका ये प्यार एक ख़ास मोटर साइकिल थी. वे जब भी सड़क पर किसी बुलेट यानी रॉयल एनफ़ील्ड की मोटरबाइक को देखते तो उन्हें अपना 'प्यार' याद आने लगता.

श्रीनिवासन ने बैंक से लोन लेकर क़रीब 50 साल पहले बुलेट मोटरसाइकिल ख़रीदी थी. ये बाइक 1990 के दशक में उनके एक दोस्त के घर के सामने से चोरी हो गई थी.

बुलेट की डुग-डुग-डुग वाली आवाज़ जब भी बेंगलुरु की सड़कों पर उनके कानों में पड़ती, उनका दिल मानो बैठने लगता. उनकी आंखें अपनी बाइक को आस पास तलाशने लगती. ऐसे पलों में वे अपने बेटे से बाइक का जिक्र करते और कहते कि उनके पास भी बुलेट थी, जो मनिपाल में उनके दोस्त के घर के सामने से चोरी हो गई थी और अब पता नहीं किस हाल में होगी. श्रीनिवासन का यह हाल तब था, जब उन्होंने अपनी बुलेट बाइक उस दोस्त को बेच दी थी.

एन श्रीनिवासन के बेटे सॉफ्टवेयर इंजीनियर अरुण श्रीनिवासन बताते हैं, "जब भी मैं पिता जी के साथ यात्रा करता और आगे बुलेट दिख जाती तो मैं अपनी रफ़्तार धीमी कर लेता, ताकि इन्हें बुलेट नहीं दिखे. वे उस मोटर बाइक से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे, हमेशा कहा करते थे कि मुझे उसे बेचना नहीं चाहिए था."

बाइक बेची पर शर्त के साथ

वहीं सीनियर श्रीनिवासन बताते हैं, "मेरा मंगलुरु से लखनऊ ट्रांसफर हो गया था. मैं बाइक वहां नहीं ले जा सकता था. मैं एक प्राइवेट बैंक में फ़ील्ड ऑफ़िसर था. बुलेट बाइक तब महंगी थी. मुझे तब यह 6,400 रुपये की मिली थी और मुझे बैंक ने पूरा पैसा लोन दिया था."

ट्रांसफर होने के बाद श्रीनिवासन ने अपनी बाइक अपने दोस्त को बेच तो दी, लेकिन एक शर्त के साथ.

अरुण बताते हैं, "शर्त ये थी कि अगर वे कभी इस बाइक को बेचेंगे तो मेरे पिता को ही बेचेंगे. वे इसके लिए तैयार थे. वे बाइक का इस्तेमाल भी कर रहे थे लेकिन एक दिन उनके घर से बाइक चोरी हो गई."

बाइक चोरी होने के बाद श्रीनिवासन ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई. लेकिन इसका पता नहीं चल सका.

उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनकी बाइक हासन शहर के एक पुलिस स्टेशन में 10 साल तक खड़ी रही. यह बाइक वहां चोरी हुईं या लावारिस बाइकों के साथ खड़ी थी, लेकिन वह वहां तक कैसे पहुंची, इसका श्रीनिवासन परिवार को कोई अंदाज़ा नहीं था.

नई बाइक लेने की सलाह मिली

दूसरी ओर, अरुण इस मोटरबाइक का पता लगाने में जुटे थे. इसकी वजह बताते हुए अरुण कहते हैं, "मुझे भी पुरानी बाइक और कार से प्यार है. मेरे पास पिता जी की पुरानी कार है और चाचा की एक कार 1960 की है. हमारे घर में छह सात वाहन हैं, हमने किसी को नहीं बेचा. लेकिन बुलेट मोटर बाइक की कमी खल रही थी."

सीनियर श्रीनिवासन बताते हैं, "मेरे बेटे ने भी उस बाइक की सवारी की थी." उस बाइक की कमी महसूस करने की दो और वजहें भी थीं.

अरुण बताते हैं, "मेरे पिता ने उस बाइक का इस्तेमाल 25 साल तक किया था. मैं और मेरी बहन उस बाइक के साथ ही बड़े हुए थे. ये हमारे परिवार का पहला वाहन था. मैं तब छठी क्लास में था जब पिता जी ने उसे अपने दोस्त को दिया था. मुझे हमेशा याद आता था कि वह बाइक हमारे घर में खड़ी है."

इन सब वजहों से 38 साल के अरुण मनिपाल गए, जहां उनके पिता बैंक के मुख्यालय में काम करते थे. वे वहां एक पुराने गैराज़ में भी गए ताकि अपने पिता की मोटर बाइक के बारे में जानकारी हासिल कर सकें.

अरुण बताते हैं, "मुझे लगा था कि केवल पुराने गैराज वाले मेरी भावनाओं को समझ सकते थे."

कुछ गैराज वालों ने तो अरुण को भगा दिया और कोई जवाब नहीं दिया. कुछ दूसरों ने अरुण को समझाया कि क्यों समय बर्बाद कर रहे हो, नयी बाइक ले लो.

लेकिन अरुण का इरादा अपनी जगह पर कायम रहा. वे बताते हैं, "रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफ़िस में भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था. मैंने पुलिस स्टेशनों पर भी मालूम किया. किसी को कुछ पता नहीं था. फिर एक दिन पूरे ट्रांसपोर्ट विभाग का आंकड़ा डिज़िटल हो गया, इससे मुझे अपनी बाइक तलाशने में मदद मिली."

ऐसे मिली बाइक...

साल 2021 की शुरुआत में अरुण को राज्य परिवहन विभाग के पोर्टल से पता चला कि उनकी बाइक की पंजीयन संख्या (MYH 1731) वाले नंबर पर एक बीमा पॉलिसी ली गई है. उस वक्त एमवाय का मतलब स्टेट ऑफ़ मैसूर हुआ करता था.

कई महीने तक रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफ़िस के चक्कर काटने के बाद अरूण को पता चला था कि इस पंजीयन नंबर की बाइक मैसूर ज़िल के एक किसान टी. नारासीपुरा के पास है. अरुण ने किसान से बात करके अपने पिता को खुश करने की इच्छा और अब तक की कोशिशों के बारे में बताया.

तब अरुण को पता चला कि उस किसान ने ये बाइक एक डीलर से ख़रीदी थी और डीलर ने हासन जिले में पुलिस की नीलामी से बाइक ली थी. जिन वाहनों पर कोई दावा नहीं करता या वाहन लावारिस होते हैं, उनकी बिक्री पुलिस नीलामी के ज़रिए करती है.

पुलिस ने किसान को एक प्रमाण पत्र दिया था जिसके मुताबिक किसान ने चोरी के वाहन को खरीदा था और इस प्रमाण पत्र के ज़रिए वे इस वाहन को अपने नाम से पंजीकृत करा सकते थे.

श्रीनिवासन परिवार की किस्मत अच्छी थी कि इस किसान को वाहन को फिर से पंजीकृत कराने की प्रक्रिया नहीं मालूम थी और बाइक की पंजीयन संख्या नहीं बदली.

शुरुआती बातचीत में किसान ने बाइक बेचने से मना कर दिया लेकिन कई महीनों के बाद उसने अरुण को फ़ोन करके बाइक बेचने की बात की. डीलर ने पुलिस की नीलामी में 1800 रुपये में बाइक ली थी और उसने किसान को यह बाइक 45 हज़ार रुपये में बेची.

अरुण बताते हैं, "किसान को एक लाख रुपये से ज़्यादा देना पड़ा. क्योंकि उनका कहना था कि उन्होंने बाइक को रिपेयर कराने में काफ़ी ख़र्चा किया है. मेरे लिए बाइक का भावनात्मक मूल्य था."

जब अरुण ने अपने पिता को किसान से बाइक ख़रीदने की बात बतायी तो वे भावुक हो गए. अरुण बताते हैं, "वे काफ़ी भावुक हो गए, खुश भी थे. 15 साल बाद बाइक का वापस मिलना बड़ी बात थी. मैं अपने दोस्त के साथ बाइक को चलाकर लाया."

अरुण के पिता ने बताया, "मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ कि ये मेरी बाइक है. मैंने इसका चेसिस नंबर देखा. मेरे पास पुरानी आरसी बुक थी. इस बाइक को वापस लेने के लिए बेटे का आभारी हूं. यह ऐसा पल था जैसे मेरा लापता घोड़ा खुद घर लौट आया हो. हम लोगों ने इसकी सवारी की. ज़्यादा दूर नहीं गए क्योंकि इसका फिर पंजीयन कराना बाकी था. बुलेट के लिए मेरी लंबाई कम है लेकिन यह मेरे लिए आरामदेय लगा, इससे भी स्पष्ट हुआ कि यह मेरी ही बाइक है."

जैसा कि कहते हैं प्रेम अंधा होता है, भले ही वह प्रेम 50 साल पुरानी मोटर बाइक से ही क्यों न हो.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+