स्थाई तौर पर 1.5°C बढ़ेगा तापमान, UN की ताजा रिपोर्ट का भारत और विश्व के लिए मायने ? जानिए
IPCC climate report 2023: वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी से भारत और पूरी दुनिया पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ने की आशंका है। भारत में तो लगभग 40 फीसदी लोगों के सामने जल संकट खड़ा हो सकता है।

IPCC climate report 2023: जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट पैनल की ताजा रिपोर्ट ने उत्सर्जन में कटौती के अबतक के संकल्पों को बौना कर दिया है। क्योंकि, नई रिपोर्ट के मुताबिक इस दिशा में अभी तक किए गए प्रयास बहुत ही नाकाफी साबित होने वाले हैं। सोमवार को संयुक्त राष्ट्र की इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि हर स्थिति में 20 वर्षों में कम से कम 1.5 डिग्री सेल्सियल ग्लोबल वार्मिंग होना तय है। यह सामान्य रिपोर्ट नहीं है। यह आने वाले वर्षों में तबाही की घंटी है। इसकी वजह से मौसम की अप्रत्याशित घटनाओं में बढ़ोतरी होने की आशंका के साथ-साथ ध्रुवीय बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर तेजी से बढ़ने का संकट पैदा हो रहा है।

2050 तक 'नेट जीरो' उत्सर्जन ही विकल्प ?
वैज्ञानिकों के मुताबिक वर्ष 1850-1900 के स्तर के मुकाबले सतह का वैश्विक औसत तापमान पहले ही करीब 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। 2030 तक यह कभी भी 1.5 डिग्री (1850-1900 के मुकाबले ) के स्तर को पार कर सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक इन हालातों में पूरी दुनिया में धरती का औसत तापमान अगले दो दशकों में स्थायी रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। इसे सिर्फ उन्हीं परिस्थितियो में सीमित रखा जा सकता है, जब 2050 तक 'नेट जीरो' उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त किया जाए। इसके लिए कार्बन डायऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड आदि के उत्सर्जन को 2050 तक खत्म करना पड़ेगा।

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उत्सर्जन लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्या करना चाहिए ?
ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने वाले गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के पैनल ने कोयले के लिए हर तरह की फंडिंग बंद करने का सुझाव दिया है। 2035 तक विकसित देशों और 2040 तक बाकी दुनिया को कोयला आधारित बिजली उत्पादन पूरी तरह से बंद कर देना होगा। OECD के देशों द्वारा 2030 तक और 2040 तक बाकी देशों द्वारा कोयले की खपत को रोकना होगा। जो भी गैस या तेल भंडार हैं, उनके विस्तार को रोकना होगा। सब्सिडी को जीवाश्म ईंधन से नई ऊर्जा स्रोतों की ओर शिफ्ट करना होगा। वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक तेल और गैस के उत्पादन को इस तरह से घटाना होगा, ताकि 2050 के 'ग्लोबल नेट जीरो' का लक्ष्य प्राप्त हो सके।

भारत के लिए IPCC रिपोर्ट के मायने ?
अगर आशंका के मुताबिक अगले 20 वर्षों में वैश्विक तापमान स्थाई रूप से 1.5 डिग्री बढ़ गया तो विशेषज्ञों के मुताबिक 40% भारतीयों को जल संकट का सामना करना पड़ेगा। अभी यह संख्या करीब 33% है। दक्षिण भारत में बहुत ही भारी बारिश की घटनाएं बढ़ सकती हैं। 1850-1900 की तुलना में दक्षिण-पश्चिमी तटवर्ती इलाकों में बारिश में 20% तक बढ़ोतरी देखी जा सकती है। दक्षिण एशिया में मानसून का प्रभाव लंबे समय के लिए बढ़ सकता है। वहीं लू का प्रकोप और जंगल में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।

प्राकृतिक आपदाओं का करना पड़ सकता है सामना
तापमान और बारिश की वजह से ग्लेशियर फटने की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं, भूस्खलन के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी जा सकती है। यही नहीं ग्लेशियर का विस्तार भी कम होने लगेगा। समुद्र का स्तर बढ़ना शुरू होगा। भारत के शहरों में अत्यधिक गर्मी पड़ेगी, शहरों में बाढ़ की घटनाएं बढ़ेंगी। समुद्र में चक्रवातों की संख्या भी बढ़ सकती है। भारत इसी साल दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बनने जा रहा है। ऐसे में समुद्र के जल का स्तर बढ़ने से मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, कोच्चि और पुरी जैसे शहरों और गोवा जैसे राज्यों की बड़ी आबादी के प्रभावित होने की आशंका रहेगी। एक अनुमान के मुताबिक 2050 के आसपास तक देश के तटीय इलाकों में रहने वाली लगभग 3.5 करोड़ जनसंख्या प्रभावित होगी।

24 बिलियन डॉलर के सीधे नुकसान की आशंका
भारत में अभी जो वादा किया गया है, उसके हिसाब से उत्सर्जन में कमी भी हुई तो भी 24 बिलियन डॉलर की सीधे नुकसान की आशंका है। अगर गर्मी में 1.5 डिग्री से ज्यादा बढ़ोतरी हुई तो गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों की वजह से आने वाली बाढ़ों का कहर और भी बढ़ेगा। इन परिस्थितियो में अनाज के उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका स्वभाविक है।













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