Telangana Election: ओवैसी या कांग्रेस, जिसकी ओर झुकेंगे मुसलमान, उसी से तय होगा चुनाव का परिणाम?
तेलंगाना विधानसभा चुनावों में भी इस बार कर्नाटक की तरह मुसलमान वोटर बहुत ज्यादा मायने रख रहे हैं। कर्नाटक चुनाव के बाद यहां का भी राजनीतिक समीकरण काफी कुछ बदल चुका है और सभी पार्टियां इस बात को बखूबी महससू कर रही हैं।
तेलंगाना में मुसलमान वोटर 13% हैं। लेकिन, इनका यह 13% वोट राज्य के 37% सीटों पर चुनाव का रुख तय कर सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो तेलंगाना की 119 विधानसभा सीटों में से 45 पर मुस्लिम वोटर निर्णायक साबित होने वाले हैं।

पिछले दो बार से अलग है तेलंगाना का चुनाव
पिछले दो विधानसभा चुनावों के मुकाबले यह चुनाव काफी अलग लग रहा है। दो बार सीएम केसीआर की पार्टी बीआरएस (पहले टीआरएस) का एकतरफा दबदबा नजर आया था। लेकिन, अबकी बार चुनावी समीकरण बहुत बदल चुका है और कांग्रेस काफी मजबूत स्थिति में लग रही है।
कर्नाटक में मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस के पक्ष में की एकतरफा वोटिंग
कुछ ही महीने हुए हैं, कर्नाटक में कांग्रेस ने बीजेपी को अप्रत्याशित हार हराई है। इसकी एक बड़ी वजह ये मानी जाती है कि करीब 90% मुस्लिम मतदाताओं ने वहां कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा मतदान किया था। वहां जेडीएस के वोट शेयर में दो चुनावों में आई तुलनात्मक गिरावट और कांग्रेस के वोट शेयर में बढ़ोतरी का आंकड़ा भी इसी बात की ओर इशारा करता है।
कांग्रेस मुसलमानों के बीच खुद को पेश कर रही है बेहतर विकल्प
कर्नाटक की वजह से कांग्रेस को तेलंगाना में मुसलमानों के सामने खुद को बेहतर विकल्प के रूप में पेश करने का मौका मिल गया है। कांग्रेस की ओर से लगातार बीआरएस और बीजेपी के बीच कथित गुप्त समझौते के दावे किए जा रहे हैं। केसीआर की पार्टी के सामने चुनौती ये है कि उनके पास कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा भी नहीं है।
उनकी पार्टी एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी और अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे मुस्लिम चेहरों के भरोसे है, जिनका दबदबा विशेष रूप से पुराने हैदराबाद की 7 सीटों से ज्यादा नहीं दिखता है। इसके अलावा उनके हक में कुछ कल्याणकारी योजनाएं हैं, जो केसीआर सरकार ने अल्पसंख्यकों के कल्याण के नाम पर चला रखे हैं।
मुस्लिम वोटरों के लिए कांग्रेस के पास प्रभावशाली मुद्दे
हालांकि, कांग्रेस के पास पूर्व मंत्री मोहम्मद अली शब्बीर जैसा मुस्लिम चेहरा जरूर है, लेकिन वे कामारेड्डी में सीएम केसीआर को चुनौती देने से ज्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। अलबत्ता कांग्रेस के पास मुस्लिम वोटरों को प्रभावित करने के लिए बीआरएस से ज्यादा प्रभावशाली मुद्दे हैं।
वह बीआरएस-बीजेपी में गुप्त तालमेल का आरोप लगाकर खुद को सबसे बड़ा सेक्युलर पार्टी साबित करने में जुटी है। उसके पास कर्नाटक का 'हलाल', 'हिजाब', 'मुस्लिम कोटा' वापस लिए जाने और 'जय बजरंग बली' के नारे जैसे उदाहरण हैं, जिनके बावजूद वहां वह भाजपा को बुरी तरह से हराने में सफल हो चुकी है।
इसके अलावा अल्पसंख्यकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की भरमार कांग्रेस के खजाने में ऐसे चुनावी हथियार हैं, जो बीआरएस-एआईएमआईएम के दोस्ताना गठबंधन को पूरी तरह से हिलाने में सक्षम है।
बीआरएस, ओवैसी की पार्टी और यहां तक की भाजपा को भी कांग्रेस की ओर मुस्लिम वोटरों के संभावित झुकाव की वजहों का एहसास हो चुका है। यही वजह है कि बीआरएस नेता केटी रामा राव और टी हरीश राव कांग्रेस-बीजेपी को एक ही सिक्के के दो पहलू बता रहे हैं तो ओवैसी हैदराबाद में पहले हुए सभी सांप्रदायिक दंगों के लिए कांग्रेस की पुरानी सरकारों को जिम्मेदार बताने में लगे हैं।
असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों से खुलकर अपील कर चुके हैं कि जहां भी एआईएमआईएम चुनाव मैदान में नहीं है, वहां वे भारत राष्ट्र समिति को वोट दें। जबकि, बीजेपी घोषणा कर चुकी है कि वह मुसलमानों को मिल रहे 4% आरक्षण को हटा देगी। वह कांग्रेस की तरह बीआरएस पर भी मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा रही है और उसे एआईएमआईएम की कठपुतली कह रही है।












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