Telangana Election: BRS के लिए कांग्रेस इस बार तेलंगाना में कैसे बन गई है बड़ी चुनौती?

तेलंगाना में विधानसभा चुनाव का माहौल जैसे-जैसे तैयार हो रहा है, लड़ाई ज्यादा स्पष्ट होती नजर आ रही है। राजनीति में पांच साल का वक्त बहुत बड़ा होता है। 2018 में सत्ताधारी बीआरएस (तब टीआरएस) की स्थिति ऐसी थी कि मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने समय से पहले विधानसभा भंग करवाकर चुनाव करवाई और धमाकेदार जीत के साथ सत्ता में वापसी की थी।

लेकिन, आज की तारीख में कम से कम एक ओपिनियन पोल की मानें तो सत्ताधारी बीआरएस और कांग्रेस के बीच लड़ाई तगड़ी नजर आ रही है। वैसे भारत राष्ट्र समिति (तब तेलंगाना राष्ट्र समिति थी) का 2018 में जो प्रभाव था, वह अगले साल हुए 2019 के लोकसभा चुनावों से ही कमजोर पड़ता नजर आया था।

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पांच साल में बदल गया तेलंगाना का सियासी समीकरण
तेलंगाना की 17 लोकसभा सीटों में से आधी से ज्यादा बीआरएस ने जरूर जीती, लेकिन कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन विधानसभा चुनावों के मुकाबले कहीं बेहतर हुआ था। एक समय ऐसा भी आया कि प्रदेश में बीआरएस को बीजेपी मुख्य टक्कर देती नजर आ रही थी। लेकिन, आज की तारीख में कांग्रेस और केसीआर की पार्टी के मुकाबले वह काफी पीछे नजर आती है। वहीं एक समय जिस कांग्रेस के 12 एमएलए बीआरएस में चले गए थे, चुनाव पूर्व एक सर्वेक्षेण के हिसाब से वह केसीआर की हैट्रिक की उम्मीदों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरती नजर आ रही है।

बीआरएस का बदला हुआ चुनावी समीकरण
2014 में अलग राज्य के गठन के बाद से केसीआर सरकार ने राज्य की कल्याण की दिशा में बड़े मुद्दों पर फोकस किया। रोजगार पैदा करना, सूखे क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था, किसानों की सहायता के अलावा दबे-कुचले लोगों की सहायता के लिए कई सारी योजनाएं चलाईं। अनेकों कल्याणकारी और विकास योजनाओं पर काम किया गया। 15 अक्टूबर को बीआरएस ने जो चुनावी घोषणापत्र जारी किया है, उसमें भी कई कल्याणकारी वादे किए गए हैं और एक तरह से उनकी पिछली योजनाओं का ही विस्तार का वादा किया गया है।

गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 93 लाख परिवारों को 5 लाख रुपए का मुफ्त बीमा, सभी राशन कार्डधारियों को पीडीएस के माध्यम से सुपरफाइन चावल देने और वरिष्ठ नागरिकों, अकेली महिला और दिव्यांगों को मिलने वाली पेंशन में बढ़ोतरी जैसे भरोसे दिए गए हैं। केसीआर की सियासी रणनीतियों में ये ऐसी योजनाएं हैं, जिसके दम पर उन्होंने अपनी पार्टी का नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति से भारत राष्ट्र समिति किया है।

एक साल पहले तक वह राष्ट्रीय राजनीति में खुद को बड़े दावेदार के तौर पर पेश कर रहे थे। उन्होंने कुछ महीने पहले दिल्ली में पार्टी का दफ्तर भी राष्ट्रीय एजेंडे के साथ ही खोला था। लेकिन, आज जमीनी परिस्थितियां वैसी नहीं नजर आ रही हैं। उन्हें जेडीएस का भी समर्थन मिल रहा था, लेकिन आज असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम को छोड़कर उनके साथ कोई मजबूती से खड़ा नजर नहीं आ रहा है।

बीआरएस आज भी पूरी तरह से सीएम के चंद्रशेखर राव की लोकप्रियता पर निर्भर है। उनके बाद उनके परिवार के कुछ सदस्यों को भी काफी लोकप्रियता मिली हुई है, जिसमें उनके बेटे केटी रामा राव और भतीजे टी हरीश राव शामिल हैं।

लेकिन, इनके अलावा पार्टी में कोई और प्रदेश स्तर पर नहीं उभर पाया है। ऊपर से तथ्य यह है कि बीआरएस को लगातार दो कार्यकालों की एंटी-इंकंबेंसी का सामना करना पड़ रहा है। अलग तेलंगाना राज्य बनने की वजह से लोगों में उनके प्रति एक भावनात्मक समर्थन तो है, लेकिन कांग्रेस अपनी गारंटियों वाले हथियार से उन्हें बहुत कड़ी टक्कर देती हुई नजर आ रही है।

कर्नाटक में जीत के बाद से कांग्रेस का बदल गया समीकरण
6 महीने पहले तक तेलंगाना में अगर विपक्ष की चर्चा होती थी तो बीजेपी ही नजर आती थी। लेकिन, पड़ोसी राज्य कर्नाटक में मिली सफलता ने कांग्रेस के भीतर जैसे संजीवनी डाल दी। पार्टी ने यहां विधानसभा चुनावों में एंट्री ही महिलाओं, किसानों और समाज के निचले तबके के लिए लोक-लुभावन चुनाव-पूर्व गारंटियों के साथ की। जैसे-जैसे समय बढ़ रहा है, कांग्रेस के ये वादे उसके कार्यकर्ताओं को जोश से भर रहे हैं। ऊपर से पड़ोसी राज्य में मजबूत सरकार होने से भी उसे जमीन पर फायदा होता नजर आ रहा है।

तेलंगाना में जातिगत जनगणना कांग्रेस के लिए पेच
चुनावी गांरटियों के साथ ही कांग्रेस ने जातिगत जनगणना को अन्य राज्यों में भी अपना बड़ा हथियार बनाया है। पार्टी ने सीएम केसीआर से तेलंगाना के लिए भी इसकी मांग की है। लेकिन, इसे यहां वह बड़ा मुद्दा बना पाएगी, इसमें संदेह है। क्योंकि, तेलंगाना में कांग्रेस को कई बार 'रेड्डी पार्टी' भी कह दिया जाता है। क्योंकि, पार्टी में इस सवर्ण जाति का काफी दबदबा रहा है। पार्टी ने 55 उम्मीदवारों की जो पहली लिस्ट जारी की उसमें भी 15 रेड्डियों को ही टिकट दिए हैं।

पूर्ववर्ती आंध्र प्रदेश में मंत्री रहे पोन्नाला लक्ष्मैया पार्टी से पहले ही यही आरोप लगाकर निकल चुके हैं कि कांग्रेस में कथित रूप से ओबीसी नेताओं को साइडलाइन कर दिया गया है। संभावना है कि वे बीआरएस में शामिल हो सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में जातिगत जनगणना का मुद्दा ज्यादा उठाना इसके लिए जोखिम से भरा साबित हो सकता है।

वैसे केसीआर सरकार 2014 में एक विस्तृत सर्वे करवा भी चुकी है, जिसमें जातिगत आंकड़ों के अलावा सामाजिक-आर्थिक डेटा भी जुटाए गए थे। इसके मुताबिक राज्य में 53.5% ओबीसी, 18.5% दलित और 11.7% अनुसूचित जनजाति के लोग हैं। जबकि, सामान्य वर्ग की जनसंख्या 16% बताई गई थी।

भाजपा का समीकरण दिख रहा है कमजोर
वहीं एक समय में जब राज्य में विपक्ष के नाम पर सिर्फ भाजपा ही नजर आने लगी थी, वह हालात कुछ महीनों में ही काफी बदल चुके हैं। पार्टी ने एक के बाद कई उपचुनावों में जीत दर्ज करके बीआरएस के सामने अच्छी चुनौती पेश की थी। हैदराबाद निगम चुनाव के बाद तो लग रहा था कि विधानसभा चुनावों में वह दमदार भूमिका में होगी। लेकिन, बंदी संजय के प्रदेश अध्यक्ष से हटाए जाने के बाद पार्टी की वह आक्रमकता अचानक कम हो गई, जिसने उसका जनाधार बढ़ाना शुरू किया था।

उनकी जगह केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी को लाया गया है, लेकिन पार्टी जिस हिंदुत्व वाली आक्रामक राजनीति के लिए जानी जाती है, वह धार फिलहाल नजर नहीं आती है। वैसे चर्चा है कि पार्टी लोकसभा सांसद बंदी संजय और जी किशन रेड्डी समेत अन्य सांसदों को भी अन्य राज्यों की तरह ही विधानसभा का टिकट दे सकती है। इसी तरह से विवादित बयानों की वजह से पार्टी से निलंबित विधायक राजा सिंह की वापसी की भी चर्चा जोरों पर है।

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ओवैसी की पार्टी का समीकरण
जहां तक असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम की बात है तो वह अभी भी हैदराबाद के पुराने इलाकों में काफी मजबूत मानी जा सकती है। संभावना है कि वह फिर वही सात सीटें जीत सकती है, जो पिछले दो चुनावों से जीतती रही है। केसीआर के लिए यह भी देखने वाली बात है कि इस बार ओवैसी पुराने हैदराबाद के बाहर मुसलमानों का कितना वोट बीआरएस को ट्रांसफर करवा पाते हैं। क्योंकि, इस बार कांग्रेस भी मुस्लिम वोटों की बहुत बड़ी दावेदार बनती नजर आ रही है। हमास-इजराइल युद्ध में पार्टी का जो स्टैंड है, उसके बारे में कहा जा रहा है कि वह इसी वोट बैंक को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है।

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