TVK Vijay: स्टालिन vs विजय, कहां बिगड़ा खेल? कैसे पलटी सियासी तस्वीर? पूरा गेमचेंजर फैक्टर

TVK Vijay: 4 मई को आए चुनावी नतीजों ने पूरे तमिलनाडु की सियासी तस्वीर को बदल दिया है, DMK का सूरज इस तरह से अस्त होगा, ये किसी ने सोचा भी नहीं था, यहां तक की सत्ता वापसी का ख्वाब देख रहे एमके स्टालिन खुद अपनी ही सीट हार गए। तो वहीं दूसरी और फिल्मी पर्दे का एक सुपरस्टार अब सियासत का जननायक बन गया है। अभिनेता से राजनेता बने विजय ने जिस तरह से चुनाव में बंपर जीत हासिल की है, उसे देखकर राजनीति के जानकार भी हैरान है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर स्टालिन से कहां चूक हुई जिसका फायदा TVK को मिला?

मालूम हो कि TVK ने 108 सीटों पर कब्जा किया है तो वहीं DMK प्लस के खाते में मात्र 73 सीटें आई हैं। आपको बता दें कि TVK बिना किसी गठबंधन के चुनावी मैदान में उतरी थी जिसकी जीत ने राज्य का सियासी समीकरण ही बदलकर रख दिया है।

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स्टालिन के लिए क्या गलत हुआ?

तमिल की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार मथिवानन रेड्डी ने कहा कि 'एमके स्टालिन सरकार के खिलाफ जनता में एंटी-इंकम्बेंसी धीरे-धीरे बढ़ रही थी। बेरोजगारी, महंगाई और लोकल लेवल पर भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर लोगों की नाराजगी साफ दिख रही थी लेकिन डीएमके नेतृत्व इन संकेतों को समय रहते भांप नहीं पाया, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा।'

विजय को हल्के में लेना स्टालिन को भारी पड़ा

DMK सरकार ने शासन और कल्याणकारी योजनाओं के मामले में अच्छा काम किया था। वित्तीय सहायता कार्यक्रमों और इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने जैसी पहलों से प्रशासनिक स्थिरता की एक धारणा बनी थी। फिर भी, चुनाव शायद ही कभी सिर्फ़ शासन के आधार पर तय होते हैं। DMK की पहली चूक विजय की राजनीतिक पकड़ को कम आंकना था। स्टालिन की लगभग पूरी तरह चुप रहने की रणनीति भी उनके खिलाफ काम कर गई, राजनीति में, चुप्पी हमेशा फायदेमंद नहीं होती, कभी-कभी इसे हिचकिचाहट या ढिलाई के तौर पर समझा जाता है, यही बात उनके खिलाफ गई।

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ग्राउंड कनेक्ट की कमी

चुनाव के दौरान यह देखने को मिला कि डीएमके के कई नेता जमीनी स्तर पर उतने सक्रिय नहीं थे। दूसरी ओर, विजय ने सीधे जनता से जुड़ने की रणनीति अपनाई रैलियों, सोशल मीडिया और युवाओं के बीच उनकी पकड़ मजबूत रही।

गठबंधन और सीट बंटवारे की गड़बड़ी

डीएमके के गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर असंतोष भी सामने आया। इससे कई जगह वोट ट्रांसफर सही तरीके से नहीं हो पाया, जिसका सीधा नुकसान पार्टी को हुआ।

युवाओं का झुकाव विजय की ओर, लोगों को उननें फ्रेशनेस दिखी

विजय का करिश्मा और उनकी 'नई राजनीति' की छवि युवाओं को आकर्षित करने में सफल रही। उन्होंने रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, जिससे पहली बार वोट देने वाले मतदाता बड़ी संख्या में उनके साथ आए।

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सोशल मीडिया और इमेज बिल्डिंग का असर

जहां डीएमके पारंपरिक प्रचार में व्यस्त रही, वहीं विजय की टीम ने डिजिटल प्लेटफॉर्म का जबरदस्त इस्तेमाल किया। वायरल कैंपेन, छोटे वीडियो और सीधे संवाद ने उन्हें खासकर शहरी वोटर्स में बढ़त दिलाई।

विजय के लिए क्या काम आया?

विजय का सबसे बड़ा दांव अकेले चुनाव लड़ना उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। गठबंधन करने से इनकार करके, उन्होंने TVK को एक साफ़-सुथरे विकल्प के तौर पर पेश किया, जिस पर पुरानी पार्टियों का कोई बोझ नहीं था। इससे उन्हें जाति, उम्र और यहाँ तक कि पारंपरिक पार्टी निष्ठाओं से परे जाकर वोट हासिल करने में मदद मिली।

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स्टालिन vs विजय, कहां बिगड़ा खेल?

स्टालिन की सरकार जहां एंटी-इंकम्बेंसी और रणनीतिक चूक का शिकार हुई, वहीं विजय ने नए विजन, युवा अपील और स्मार्ट कैंपेनिंग के दम पर खुद को मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया, तमिलनाडु चुनाव के नतीजों से स्पष्ट है कि सिर्फ पुराना राजनीतिक अनुभव ही जीत की गारंटी नहीं है। जनता अब बदलाव चाहती है और उसी दिशा में वोट करती है।

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