'माता-पिता IAS, फिर भी आरक्षण?' क्रीमी लेयर रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए तीखे सवाल, क्या है पूरा मामला
Supreme Court Questions Reservation for Creamy Layer: देश में आरक्षण व्यवस्था को लेकर दशकों से चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर ऐसा सवाल उठाया है, जिसने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
अदालत ने पूछा है कि अगर किसी परिवार ने आरक्षण का लाभ लेकर सामाजिक और आर्थिक रूप से पर्याप्त उन्नति कर ली है, तो क्या अगली पीढ़ी को भी उसी तरह आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए? सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की टिप्पणी-"अगर माता-पिता दोनों IAS अधिकारी हैं, तो उन्हें आरक्षण क्यों मिलना चाहिए?"-अब इस बहस का केंद्र बन गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना है। लेकिन जब कोई परिवार शिक्षा, नौकरी और आर्थिक स्थिति में काफी आगे बढ़ चुका हो, तब अगली पीढ़ी को भी वही लाभ देना न्यायसंगत है या नहीं, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। ऐसे में यदि हर पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेती रहेगी, तो यह व्यवस्था कभी अपने वास्तविक उद्देश्य तक नहीं पहुंच पाएगी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला कर्नाटक के कुरुबा समुदाय से जुड़े एक उम्मीदवार का है, जिसे ओबीसी श्रेणी के तहत सहायक अभियंता पद पर चयन मिला था। हालांकि जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने उसे 'क्रीमी लेयर' में मानते हुए जाति वैधता प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया।
समिति ने पाया कि उम्मीदवार के माता-पिता दोनों सरकारी कर्मचारी हैं और परिवार की वार्षिक आय करीब 19.48 लाख रुपये है, जो निर्धारित सीमा से अधिक है। इसी आधार पर उसे आरक्षण लाभ के लिए अयोग्य माना गया।
याचिकाकर्ता ने क्या दी दलील
उम्मीदवार की ओर से पेश अधिवक्ता शशांक रत्नू ने अदालत में दलील दी कि केवल वेतन आय के आधार पर किसी को क्रीमी लेयर नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मौजूदा नियमों में सरकारी कर्मचारियों की स्थिति-जैसे वे ग्रुप 'A' या 'B' सेवा में हैं-ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केवल वेतन आय को आधार बनाया गया, तो महंगाई और वेतन संरचना के कारण चपरासी, ड्राइवर और क्लर्क जैसे निचले स्तर के कर्मचारी भी आरक्षण से बाहर हो सकते हैं, जबकि वे सामाजिक रूप से अब भी पिछड़े हो सकते हैं।
'सामाजिक उन्नति के बाद भी क्यों चाहिए आरक्षण?'
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए कि आर्थिक और शैक्षिक उन्नति का सामाजिक स्थिति पर असर पड़ता है। अदालत ने कहा कि यदि माता-पिता पहले ही आरक्षण का लाभ लेकर उच्च पदों और बेहतर जीवन स्तर तक पहुंच चुके हैं, तो अगली पीढ़ी को उसी आधार पर लगातार लाभ देना पुनर्विचार का विषय है।
पीठ ने कहा कि आरक्षण व्यवस्था में संतुलन जरूरी है, ताकि इसका लाभ वास्तव में जरूरतमंद और अब भी पिछड़े वर्गों तक पहुंच सके।
SC/ST में भी क्रीमी लेयर पर बहस तेज
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी वर्गों के भीतर भी 'क्रीमी लेयर' लागू करने को लेकर बहस तेज हो चुकी है। अगस्त 2024 में सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की थी। हालांकि केंद्र सरकार ने बाद में साफ किया था कि फिलहाल एससी/एसटी वर्गों में क्रीमी लेयर लागू करने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
देशभर में फिर शुरू हुई नई चर्चा
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब देशभर में यह बहस तेज हो गई है कि क्या आरक्षण का लाभ बार-बार उन्हीं परिवारों तक सीमित होता जा रहा है, जो पहले से सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके हैं। वहीं दूसरी ओर कई विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक उन्नति के बावजूद सामाजिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं होता, इसलिए आरक्षण की जरूरत अब भी बनी हुई है।












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