यह अधिकार तो सिर्फ CJI का है, सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच ने सौंपा मामला तो चिढ़ गए जज

सुप्रीम कोर्ट की दो खंडपीठों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गया है। दरअसल, यह मामला सुप्रीम कोर्ट की स्थापित प्रक्रिया का है, जिसमें एक बेंच ने दूसरी बेंच में मामला सीधे भेज दिया था।

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सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच से दूसरी बेंच में किसी मामले को सीधे भेज दिया गया, तो जिस बेंच को मामला भेजा गया था उसके जज इस बात पर काफी नाखुश हो गए। संबंधित बेंच ने यह कहकर मामले पर सुनवाई से इनकार कर दिया कि केस को किसी दूसरी बेंच के सामने सूचीबद्ध करने का अधिकार सिर्फ भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) को है और यही सर्वोच्च अदालत की परंपरा रही है। दरअसल, जिस बेंच ने दूसरी बेंच में मामले को रेफर किया था, वह जूनियर जजों वाली खंडपीठ है। दरअसल, यह पूरा विवाद 'मास्टर ऑफ रोस्टर' को लेकर है, जो अधिकार सिर्फ देश के प्रधान न्यायाधीश के पास है।

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'यह अधिकार तो सिर्फ CJI का है'
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक दुर्लभ वाक्या देखने को मिला। सर्वोच्च अदालत की एक बेंच ने खुलकर दूसरी बेंच के कदम पर आपत्ति जाहिर कर दी। दरअसल, एक बेंच ने केस को दूसरी बेंच के पास भेजा तो उस बेंच के जज भड़क गए। उन्होंने उसे अपनी अदालत में सुनवाई के लिए लेने से साफ मना कर दिया। दरअसल, भारत के प्रधान न्यायाधीश ही 'मास्टर ऑफ रोस्टर' होते हैं और यह एक स्थापित प्रक्रिया है कि वही विभिन्न बेंचों को सुनवाई के लिए केस सौंपते हैं।

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जस्टिस शाह और जस्टिस रविकुमार की अदालत ने दिया था निर्देश
प्रक्रिया के तहत जूनियर जज की अगुवाई वाली बेंच यह निर्देश नहीं दे सकती कि किसी केस को दूसरी बेंच में सूचीबद्ध किया जाए। इस प्रक्रिया के उल्लंघन ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस विक्रम सेठ की अदालत को नाखुश कर दिया। बेंच की इस नाखुशी के पीछे 27 फरवरी को जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की अदालत द्वारा पास एक आदेश है, जिसमें एक केस को जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली बेंच के सामने सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया था।

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    जस्टिस गवई की बेंच ने जताई आपत्ति
    जस्टिस शाह की अगुवाई वाली बेंच का ऐसा निर्देश देने के पीछे वजह ये थी कि संबंधित मामला एक बार पहले जस्टिस गवई की बेंच में सूचीबद्ध हो चुका था। जस्टिस शाह की बेंच ने निर्देश दिया था,'इस याचिका को जल्द से जल्द जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने रखा जाए।' लेकिन, जब यह केस जस्टिस गवई की बेंच के सामने रखा गया तो उन्होंने इसपर आपत्ति जता दी। जस्टिस गवई की बेंच ने दूसरी अदालत के इस आदेश को नकारते हुए कहा, 'अगर कोई खास बेंच किसी खास परिस्थिति में यह पाती है कि किसी मामले को किसी दूसरी बेंच में रखने की जरूरत है, तब यह आवश्यक है कि वह मामले को पहले प्रधान न्यायाधीश के सामने रखे जाने का निर्देश दे ताकि उचित आदेश जारी हो सके।'

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    सीजेआई के सामने रखने को कहा
    जस्टिस गवई ने यह भी कहा कि जब सितंबर 2022 में वह केस उनकी बेंच के सामने सूचीबद्ध हुआ था, तो कोई भी प्रभावी आदेश नहीं जारी हुआ था। जस्टिस गवई ने यह भी कहा, इस कोर्ट की एक सामान्य परंपरा है कि जिस बेंच ने कोई फैसला दिया होता है, उसके जज के पास ही उस केस को भेजा जाता है। इस मामले में रिटायरमेंट से पहले जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस सीटी रविकुमार की खंडपीठ ने फैसला सुनाया था। यही वजह है कि इसे दोबारा जस्टिस सीटी रविकुमार की खंडपीठ के सामने ही सूचीबद्ध किया गया था। उन्होंने कहा कि इस नजरिए से यह उचित होगा कि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को इसपर उचित आदेश लेने के लिए चीफ जस्टिस के सामने रखा जाए।

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    सुप्रीम कोर्ट की प्रथा और प्रक्रिया
    अगर किसी बेंच को किसी खास परिस्थिति में लगता है कि किसी मामले को दूसरी बेंच के सामने रखा जाना चाहिए तो वह उस मामले को पहले सीजेआई के सामने रखने का निर्देश देती है, जहां से उचित आदेश जारी होता है। सुप्रीम कोर्ट की यह भी सामान्य प्रक्रिया है कि मामला उसी अदालत में भेजा जाता है, जो जज उस बेंच के हिस्सा रह चुके हों और जिसने उसमें कोई प्रभावी आदेश जारी किया हो।

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