सुप्रीम कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से चल रही थी सुनवाई, तभी आने लगी बच्चे के रोने की आवाज
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आरक्षण के एक मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान एक थोड़ा अजीब वाकया हो गया। सुनवाई के दौरान ही एक बच्चे की रोने की आवाज आने पर जज को इसको लेकर टोकना पड़ा। जज फैसला पढ़ रहे थे तो इस दौरान बच्चे के रोने की आवाज आई। इस पर जज ने कहा कि माइक बंद कर लीजिए दिक्कत हो रही है।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हो रही थी सुनवाई
कोरोना वायरस के चलते वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। जस्टिस एल नागेश्वर राव फैसला पढ़ रहे थे तो वो रुके और कहां कि माइक बंद करें बच्चे के रोने की आवाज आ रही है। उन्होंने कहा, कृप करके माइक म्यूट कर दें, बच्चा के रोने की आवाज से परेशानी हो रही है। फैसला नहीं पढ़ पा रहा हूं। जिसके बाद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर जुड़े वकीलों ने माइक की आवाज बंद कर ली।

कोरोना के चलते बदले सुप्रीम कोर्ट में नियम
कोरोना वायरस के फैलने के बाद देश में लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी है। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई कर रहे हैं। लॉकडाउन के बाद से कोर्ट केवल जरूरी मामलों की सुनवाई कर रहा है। इन सभी मामलों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए की जा रही है।

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने ने तमिलनाडु में मेडिकल सीटों पर ओबीसी आरक्षण नहीं दिए जाने के खिलाफ याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु की सभी राजनीतिक पार्टियां राज्य के ओबीसी के कल्याण के एक साथ मिलकर आगे आई हैं, यह असामान्य बात है लेकिन आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। डीएमके, एआईडीएमके, सीपीएम, तमिलनाडु सरकार और तमिलनाडु की कई पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट में NEET के तहत मेडिकल कॉलेज में सीटों को लेकर राज्य में 50 फीसदी OBC आरक्षण के मामले पर याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जस्टिस राव ने कहा कि आरक्षण कोई बुनियादी अधिकार नहीं है। सभी यचिकाएं सुप्रीम कोर्ट से वापस ली जाएं, इसके लिए आप हाईकोर्ट जाइए।












Click it and Unblock the Notifications