Strong Room Explained: क्या है स्ट्रॉन्ग रूम जहां रखी जाती है EVM, कैसे होती है सुरक्षा और क्यों हो रहा विवाद?

Strong Room Explained: एक साथ 4 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश West Bengal, Tamil Nadu, Kerala, Assam और Puducherry के विधानसभा चुनाव खत्म हुए लेकिन विवाद होने की वजह से बंगाल में एक सीट पर 2 मई को दोबारा वोटिंग करानी पड़ी। बाकी चार जगह तो मामला शांत रहा लेकिन एग्जिट पोल में बंगाल में TMC के लिए नतीजे उलझाने वाले रहे। लिहाजा EVM पर ठीकरा फोड़ना शुरू हो गया। हर बार की तरह इस बार भी सबसे ज्यादा चर्चा EVM और उन स्ट्रॉन्ग रूम की हो रही है, जहां वोटिंग मशीनें रखी जाती हैं। ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है कि विवाद क्या है और स्ट्रॉन्ग रूम- EVM को लेकर क्या नियम हैं।

वोटिंग खत्म स्ट्रॉन्ग के बाहर क्लेश

खास तौर पर West Bengal में स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद अक्सर देखने को मिलते हैं। इस बार भी गुरुवार रात Kolkata के माणिकतला विधानसभा क्षेत्र में एक स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर All India Trinamool Congress (TMC) नेताओं ने धरना दिया। इस प्रदर्शन में Kunal Ghosh और Shashi Panja सबसे पहले पहुंचे और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर EVM के साथ छेड़छाड़ के आरोप लगाए, जिस पर चुनाव आयोग ने सफाई भी दी।

Strong Room Explained

आखिर स्ट्रॉन्ग रूम होता क्या है?

बहुत से लोग सोचते हैं कि आखिर स्ट्रॉन्ग रूम क्या होता है। दरअसल, यह चुनाव प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह कोई सामान्य कमरा नहीं बल्कि हाई-सिक्योरिटी कंट्रोल्ड एरिया होता है, जहां मतदान खत्म होने से लेकर मतगणना तक EVM और VVPAT मशीनों को सुरक्षित रखा जाता है।

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स्ट्रॉन्ग रूम कहां बनाए जाते हैं?

आमतौर पर स्ट्रॉन्ग रूम सरकारी इमारतों, कॉलेजों, पॉलिटेक्निक संस्थानों, गोदामों या प्रशासनिक परिसरों में बनाए जाते हैं। इन जगहों का चयन जिला चुनाव अधिकारी सुरक्षा मानकों को देखकर करते हैं।

कैसे स्ट्रॉन्ग रूम पहुंचती हैं EVM?

मतदान समाप्त होने के बाद पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत चलती है। सबसे पहले EVM और VVPAT मशीनों को मतदान केंद्र पर ही सील किया जाता है। इसके बाद इन्हें कड़ी सुरक्षा में स्ट्रॉन्ग रूम तक लाया जाता है। उम्मीदवारों या उनके एजेंटों की मौजूदगी में मशीनें जमा होती हैं और फिर स्ट्रॉन्ग रूम को भी सील कर दिया जाता है। ताकि इसे बाहरी हस्तक्षेप से पूरी तरह दूर रखा जा सके। इस पूरे प्रोसेस की रिकॉर्डिंग भी करवाई जाती है। अगर इलाका ज्यादा संवेदनशील होता है तो वीडियोग्राफी भी की जाती है।

कितनी मजबूत होती है सुरक्षा?

स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा बहुस्तरीय यानी multi-layered होती है। बाहर 24 घंटे पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात रहते हैं। CCTV कैमरों से हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है। कई जगह उम्मीदवारों को लाइव फीड भी दी जाती है। दरवाजे पर खास सील लगती है, जिस पर उम्मीदवारों के हस्ताक्षर होते हैं। कई बार दोहरे ताले लगाए जाते हैं, जिनकी चाबियां अलग-अलग अधिकारियों के पास रहती हैं।

अंदर कौन जा सकता है?

स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर जाने के लिए सख्त नियम हैं। केवल रिटर्निंग ऑफिसर, जिला चुनाव अधिकारी, ऑथराइज चुनाव कर्मचारी और मतगणना के दिन नियुक्त स्टाफ ही अंदर जा सकते हैं।

कौन अंदर नहीं जा सकता?

आम नागरिक, मीडियाकर्मी और यहां तक कि उम्मीदवार भी स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर नहीं जा सकते। हालांकि उम्मीदवारों और उनके एजेंटों को बाहर निगरानी करने की पूरी छूट होती है। कई बार वे 24 घंटे तक बाहर डेरा डालकर बैठे रहते हैं।

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काउंटिंग वाले दिन क्या होता है?

काउंटिंग वाले दिन सुबह करीब 7 बजे रिटर्निंग ऑफिसर और चुनाव आयोग के पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में स्ट्रॉन्ग रूम खोला जाता है। इसके बाद EVM को कड़ी सुरक्षा में काउंटिंग सेंटर तक ले जाया जाता है। पूरे रास्ते की वीडियोग्राफी की जाती है। ताले खुलने के समय उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों की मौजूदगी रहती है।

काउंटिंग हॉल में कौन रहता है?

चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार हर काउंटिंग टेबल पर प्रत्येक उम्मीदवार का एक एजेंट मौजूद रह सकता है। एक हॉल में अधिकतम 15 एजेंटों को अनुमति होती है। इन एजेंटों के नाम उम्मीदवार पहले ही जिला चुनाव अधिकारी को दे देते हैं।

पारदर्शिता कैसे रखी जाती है?

चुनाव आयोग का दावा है कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए जाते हैं। राजनीतिक दलों को हर स्तर पर शामिल किया जाता है। सीलिंग प्रक्रिया में सभी पक्षों को बुलाया जाता है। CCTV निगरानी होती है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत शिकायत की जा सकती है।

फिर विवाद क्यों होता है?

इतनी सुरक्षा के बावजूद विवाद खत्म नहीं होते। सबसे बड़ा कारण राजनीति में अविश्वास है। हार की आशंका रखने वाली पार्टियां पहले से ही सवाल उठाने लगती हैं। कई दल लंबे समय से EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं, जिससे स्ट्रॉन्ग रूम भी संदेह के घेरे में आ जाता है।

छोटी गलती, बड़ा विवाद

कई बार छोटी प्रशासनिक चूकें भी बड़े विवाद में बदल जाती हैं। जैसे EVM का गलत जगह मिलना, सुरक्षा में थोड़ी ढील या मशीनों के काउंटिंग सेंटर पहुंचने में देरी। ऐसी घटनाएं तुरंत राजनीतिक मुद्दा बन जाती हैं।

पश्चिम बंगाल में ज्यादा हंगामा क्यों?

पश्चिम बंगाल में स्ट्रॉन्ग रूम विवाद ज्यादा देखने को मिलते हैं क्योंकि यहां चुनाव इस बार कांटे की टक्कर का होते दिख रहा है। लगभग हर सीट पर कड़ा मुकाबला पहले से ज्यादा कड़ा हो गया है। पुराने चुनावी तनाव और हिंसा की घटनाओं के कारण लोगों में अविश्वास ज्यादा है। साथ ही पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप लगाने की आदी हो चुकी हैं।

सोशल मीडिया भी बड़ा कारण

आज सोशल मीडिया भी बड़ा फैक्टर बन गया है। कोई भी वीडियो या फोटो तुरंत वायरल होकर माहौल बिगाड़ सकता है, चाहे वह अधूरी जानकारी पर आधारित हो या फेक हो। गुरुवार रात बंगाल में हुए हंगामे को भी एक वायरल CCTV क्लिप ने हवा दी थी, जिसे बाद में चुनाव आयोग ने फर्जी बताया।

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क्या सिस्टम पूरी तरह परफेक्ट है?

हालांकि तकनीकी रूप से सिस्टम मजबूत है, फिर भी स्थानीय स्तर पर मानवीय त्रुटि की संभावना हो सकती है। सुरक्षा में चूक के आरोप कभी-कभी सामने आते हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जिससे साबित हो कि स्ट्रॉन्ग रूम के जरिए चुनाव नतीजे बदले गए हों।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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