अबू तबीला: महाराजा रणजीत सिंह की सेना का इतालवी सेनापति जो पेशावर का शासक बना

इतिहास से पता चलता है कि ख़ैबर पख़्तूनख़्वा की प्रांतीय राजधानी पेशावर, पर कई विदेशी हमलावरों ने हमला किया और इसका मुख्य कारण यह लगता है कि ये शहर उन हमलावरों के रास्ते में पड़ता था जो ख़ैबर दर्रे के रास्ते भारत पर हमला करते थे.

साल 1818 में उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत (ख़ैबर पख़्तूनख़्वा) पर सिखों के हमले की शुरुआत हुई और साल 1826 में रणजीत सिंह पश्तूनों के इस क्षेत्र के शासक बन गए.

इतालवी सैनिक पाउलो आवीताबले (जिन्हें पेशावर के स्थानीय लोग को अबू तबीला कहते थे) की भूमिका भी रणजीत सिंह के समय में ही सामने आती है, जिन्हें रणजीत सिंह ने पेशावर का गवर्नर नियुक्त किया था. लेकिन ये इतालवी सैनिक पेशावर कैसे पहुंचे और उनके शासन काल में पेशावर और वहां रहने वालों पर क्या बीती, यह एक दिलचस्प कहानी है.

पाउलो आवीताबले (अबू तबीला) पेशावर कैसे पहुंचे?

नेपोलियन का दौर ख़त्म होने के बाद, ग्रैंड आर्मी के बहुत से पूर्व सैनिक रोज़गार की तलाश में भारत आए. अबू तबीला भी उन्हीं सैनिकों में से एक थे, जिन्होंने बाद में फ़ारस और पंजाब में सैन्य सलाहकार के रूप में सेवाएं दीं.

यहां उन्हें वज़ीराबाद और फिर पेशावर का गवर्नर नियुक्त किया गया. पेशावर में, उन्होंने स्थानीय रीति-रिवाज़ों और यूरोपीय सिद्धांतों को मिलाकर यहां रहने वाले स्थानीय क़बाइलियों पर अपनी पकड़ मज़बूत की.

इस सामरिक स्थिति पर अपने नियंत्रण की वजह से, वह पहले एंग्लो अफ़ग़ान युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना के संपर्क में आये, और अबू तबीला ने 400 सर्वश्रेष्ठ सैनिकों की सुविधा उपलब्ध करके महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राजनीतिक अधिकारियों के बीच काफ़ी मशहूर हो गए.

पहला एंग्लो-सिख युद्ध
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पहला एंग्लो-सिख युद्ध

अबू तबीला के जीवन की परिस्थितियों पर शोध करने वाले पुरातत्व विभाग के एक उप-क्षेत्रीय अधिकारी नवाज़-उद-दीन के अनुसार, पेशावर के गवर्नर के रूप में अबू तबीला ने ख़ैबर दर्रे के दक्षिणी दरवाज़े को नियंत्रित किया, हालांकि महाराजा ने अंग्रेज़ों को सिख सम्राज्य से गुज़रकर ख़ैबर दर्रे तक जाने की अनुमति नहीं दी थी. लेकिन उन्होंने अबू तबीला को ख़ैबर दर्रे तक अंग्रेज़ों की सहायता करने का आदेश दिया.

नवाज़-उद-दीन के अनुसार, साल 1839 में अंग्रेज़ों की कार्रवाई के दौरान, पेशावर में उनका (अंग्रेज़ों का) स्वागत किया गया और उनके अधिकारियों के साथ अच्छा व्यवहार किया गया. एक ब्रिटिश अधिकारी, कैप्टन हेवलैक ने पेशावर में एक महीना बिताया, और अपने संस्मरणों में अबू तबीला के बारे में लिखा कि "वह गवर्नर के तौर पर एक अनुकूल व्यक्तित्व होने के अलावा एक बे तकल्लुफ़ ख़ुश मिजाज़ और हुनरमंद अधिकारी हैं.

दूसरी ओर, उनके दो जीवनी लेखकों, जूलियन जेम्स कॉटन और चार्ल्स ग्रे, ने उनके करियर अभियानों और स्थानीय राज्यों के बीच संबंधों के बारे में बात करते हुए, उनकी छवि एक अत्याचारी, क्रूर और लगभग दुखी शासक के रूप में बनाई है.

अबू तबीला कौन थे?

पाउलो आवीताबले (अबू तबीला) के जीवनीकारों ने उनके शुरुआती करियर और जीवन पर कुछ प्रकाश डाला है, जिसके अनुसार अबू तबीला का जन्म 25 अक्टूबर, 1791 को इटली के एक छोटे से गाँव अजीरोला में एक किसान के यहां हुआ था. महज़ सोलह वर्ष की उम्र में ही वह फ्रांसीसी योद्धा नेपोलियन की सेना के तोपखाने की ब्रांच में शामिल हो गया था.

वह साल 1810 में फ्रांसीसी तोपखाने में शामिल हुए और पांच साल के छोटे समय में ही लेफ्टिनेंट के पद तक पहुंच गए. एक साल बाद, यानी साल 1816 में, ब्रिटिश योद्धा लॉर्ड वेलिंगटन के हाथों नेपोलियन की सेना की हार के बाद, उनसे उनका पद छीन लिया गया, जिसके बाद वो आधे वेतन पर रिज़र्व इन्फैंट्री रेजिमेंट में काम करने के लिए मजबूर हो गए.

नेपोलियन की सेना में करियर में तरक़्क़ी होने की कोई और संभावना नज़र न आने पर, उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और साल 1817 में एशिया में सैन्य सेवा की तलाश में कॉन्स्टेंटिनोपल पहुंचे. वहां उन्हें फ़ारस के बादशाह फ़तेह अली ने दूत के तौर पर भर्ती कर लिया, जहां उन्होंने 1818 से 1826 तक फ़ारस में एक सैन्य प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया.

आठ साल तक उस पद पर सेवा देने के बाद, वह साल 1826 में अपने देश इटली लौट गए. अबू तबीला इटली में थोड़े ही समय के लिए रुके और केवल एक साल बाद, यानी साल 1827 में, उन्होंने एक बार फिर इटली छोड़ा और इस बार उनकी मंज़िल एशिया थी.

वह फ़ारस में अपने दो पूर्व साथियों, जीन-फ्रेंसुओइस एलार्ड और जीन-बैप्टिस्ट वेंटुरा के सुझाव पर, जो उस समय पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के अधीन सैन्य कमांडरों के रूप में सेवा कर रहे थे, भारत आ गए.

यह पंजाब के सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह का दौर था, जिनकी सेना में अबू तबीला को 'किराये के कमांडर' के रूप में नियुक्त किया गया था और साथ ही वे रणजीत सिंह की सेना में तोपख़ाने के इंस्ट्रक्टर का भी काम कर रहे थे.

उन्होंने जल्द ही अपने बेहतरीन प्रबंधन कौशल से तोपख़ाने को पूरी तरह से व्यवस्थित किया और यूरोपीय मॉडल पर इन्फैट्री ब्रिगेड की स्थापना की.

रणजीत सिंह ने अबू तबीला को स्वीकार किया

रणजीत सिंह
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रणजीत सिंह

रणजीत सिंह अबू तबीला के सैन्य और प्रशासनिक गुणों से अच्छी तरह वाक़िफ़ हो चुके थे, इसलिए दिसंबर 1829 में, अबू तबीला के जीवन ने उस समय एक नया मोड़ लिया जब रणजीत सिंह ने अबू तबीला को पंजाब में वज़ीराबाद का गवर्नर नियुक्त किया.

गवर्नर के रूप में, उनका मुख्य काम यूरोपीय सैन्य सिद्धांतों पर पैदल सेना को व्यवस्थित करना था. उन्होंने पंजाब में व्यापार को बढ़ावा देने और स्थिर करने के लिए यूरोपीय व्यवस्था को लागू करना शुरू किया, शासन की एक अनूठी शैली का निर्माण किया, जिसके तहत राजस्व और व्यापार प्रबंधन में यूरोपीय सिद्धांतों को स्थानीय परंपराओं के साथ जोड़ दिया.

उन्होंने नई चौड़ी सड़कों और बाज़ारों के साथ शहर का पुनर्निर्माण किया.

उनका शासन आदर्शवादी सिद्धांतों से नहीं बल्कि व्यावहारिकता से प्रभावित था, जो कई जातीय समूहों, धर्मों और रीति-रिवाज़ों वाले देश पर प्रभावी ढंग से शासन करने के लिए आवश्यक था.

उनके शासन में वज़ीराबाद में शांति और आर्थिक विकास में ज़बरदस्त वृद्धि हुई, जिसे बहुत से ब्रिटिश और भारतीय पर्यवेक्षकों ने भी सराहा.

लेकिन यहां यह बात उल्लेखनीय है कि अपनी सत्ता के बावजूद उन्होंने धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक रीति-रिवाज़ों और परंपराओं से छेड़छाड़ या उनमे बदलाव करने का प्रयास नहीं किया.

पेशावर में गवर्नर

अबू तबीला
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अबू तबीला

छह साल तक वज़ीराबाद के गवर्नर तैनात रहने के बाद, साल 1835 में उन्हें पेशावर के गवर्नर हरि सिंह नालवा का राजस्व अधिकारी नियुक्त किया गया. अप्रैल 1837 में जमरूद किले में हरि सिंह नालवा की हत्या के बाद, महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें पश्तूनों को नियंत्रित करने के लिए असीमित अधिकार देते हुए, पेशावर के गवर्नर के पद पर पदोन्नत कर दिया.

अबू तबीला के जीवन पर शोध करने वाले पुरातत्व विभाग के एक उप-क्षेत्रीय अधिकारी नवाज़-उद-दीन के अनुसार, सिखों ने लंबे समय तक ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के बड़े क्षेत्रों पर शासन किया. उस समय पेशावर में रहने वाले क़बाइलियों में भी सिखों की कठोर शासन शैली के ख़िलाफ़ सख़्त गुस्सा और नफ़रत थी.

नवाज़-उद-दीन के अनुसार, ऐतिहासिक संदर्भों से पता चलता है कि पश्तूनों ने भी उसी नफ़रत के तहत, सिख सैनिकों और नागरिकों को लूटने या मारने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा. बस मौक़ा मिलने की देर होती और वो उनपर हमलावर हो जाते थे, और चूंकि अबू तबीला भी महाराजा रणजीत सिंह के लिए ही काम कर रहे थे, इसलिए स्वाभाविक रूप से उनकी सहानुभूति सिखों की तरफ़ थी.

नतीजतन, उन्होंने शहर में अपना सिक्का स्थापित करने और सिखों पर होने वाले हमलों को रोकने के लिए बहुत सख़्त क़ानून बनाए. यहां तक कि इस बारे में बनाई गई उनकी न्यायिक व्यवस्था दुनिया की सबसे विवादित न्यायिक व्यवस्था में गिनी जाती है.

अबू तबीला ने विदेशी हमलावरों को रोकने और शहर की रक्षा करने के लिए शहर के चारो तरफ़ एक चारदीवारी का निर्माण कराया और चारदीवारी के बाहर फाँसी घाट भी बनवाए.

विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, क़ानून के शासन को सुनिश्चित करने के लिए रोज़ाना 50 से 60 लोगों को इन फांसी घाटों पर लटका दिया जाता था.

सर हेनरी लॉरेंस के अनुसार, महाबत ख़ान मस्जिद (जो साल 1630 में बनाई गई थी) की मीनारों से लोगों को फेंकना और उन्हें फांसी देना उनकी (अबू तबीला) ऐसी प्रथा थी जो पेशावर के दौरे पर आने वाले यूरोपीय लोगों के लिए भी बर्बरता का प्रतीक था. अबू तबीला झूठ बोलने वालों को उनकी जीभ काटकर सज़ा देता था.

प्रसिद्ध लोक कथाओं में दर्ज है कि पेशावर में एक समय था जब माताएं अपने बच्चों से कहती थीं कि सो जाओ वरना अबू तबीला आ जाएगा. अबू तबीला चूंकि गवर्नर बनने से पहले पेशावर में राजस्व अधिकारी भी रह चुके थे इसलिए टेक्स इकट्ठा करने में भी वह बहुत सख़्त थे.

कुछ लोक कथाओं में यह भी दावा किया गया है कि अबू तबीला टैक्स चोरों को दीवार में चुनवा देता था, यानी टैक्स अदा न करने वालों का अंत दर्दनाक मौत था.

'पेशावर ज़िले का गज़ट' नाम की किताब में लिखा गया है कि उन्होंने टैक्स इकठ्ठा करने के लिए 'रिकॉर्ड बुक' की व्यवस्था शुरू की हुई थी और टैक्स की एक निश्चित दर तय करने की शुरुआत की थी. इस किताब में इतिहास के कई विश्वसनीय सन्दर्भों के माध्यम से बताया गया है कि उस दौर में पेशावर की आय में लगातार वृद्धि हुई, जो दुर्रानी सरकार के राजस्व से काफ़ी अधिक थी. आर्थिक संपन्नता अपनी जगह थी लेकिन उनके दौर में स्थानीय लोगों के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाना आम बात थी.

'स्टॉर्म एंड सनशाइन ऑफ़ ए सोल्जर लाइफ़' में कॉलिन मैकेंज़ी लिखते हैं कि छोटी-छोटी बातों पर जनता को कोड़ों और जूतों से पीटना आम बात थी और कहा जाता है कि साल 1842 में अफ़रीदी क़बीलों से हारने वाले सिख सैनिकों को अबू तबीला ने पेशावर के बाज़ारों में जूतों से पीटा था.

अबू तबीला का फ़ारसी में लिखवाया गया एक 'फ़रमान बनाम क़मर-उद-दीन ख़ान मोहमंद' के अनुसार, दो गांवों, गढ़ी चंदन और शमशतों की संपत्ति, क़मर-उद-दीन को इस शर्त पर सौंप दी गई थी कि 'वह हर साल पचास अफ़रीदियों का सिर काट कर दरबार में पेश करेंगे,नहीं तो उन्हें जुर्माना भरना होगा."

अंग्रेज़ों और सिखों का युद्ध
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अंग्रेज़ों और सिखों का युद्ध

ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पुरातत्व विभाग के निदेशक डॉक्टर अब्दुल समद के अनुसार, ऐतिहासिक संदर्भों से पता चलता है कि अबू तबीला पेशावर की गोर खत्री तहसील में रोज़ाना न्यायिक परिषद (दरबार) लगाते थे, जहां अत्याचारों की नई कहानियां जन्म लेती थीं. इस अवसर पर मुस्लिम क़ाज़ी, सिख जज, हिंदू जज, यानी सभी धर्मों के जजों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाती, जिनकी मदद से वे अपराधियों को उनके धर्म में प्रचलित दंड देते थे.

उन्होंने कहा कि चोरी और डकैती के साथ-साथ हत्या के लिए सज़ा-ए-मौत और क्षत-विक्षत करने का रिवाज़ आम किया गया और आपराधिक न्याय में इस्लामी क़ानून का सख़्त उपयोग और पुलिस की अत्यधिक प्रभावी कार्रवाई अपराध दर में कमी की मुख्य वजह बनी.

कॉलिन मैकेंज़ी और सर हेनरी लॉरेंस दोनों ने अबू तबीला पर लिखी अपनी किताबों में कहा है कि सिखों पर हमला करने वाले मुसलमानों के लिए, अबू तबीला ने मुग़ल निर्मित मस्जिद महाबत ख़ान को आतंक का प्रतीक बना दिया था, जिसकी मीनार से अपराध करने वालों को कई-कई दिनों तक लटका कर रखा जाता था. विद्रोहियों की सज़ा उलटा लटकाने और गला में फंदा लटका कर दी जाती थी. बाहरी क़बीलों से पेशावर में दाख़िल होने वालों को भी फांसी पर लटका दिया जाता और कुछ संदर्भों के अनुसार जलते हुए तंदूर में भी फेंक दिया जाता था.

और इस सारी कार्रवाई का मक़सद क़बाइलियों पर अपनी धाक जमाना था. यानी अपने क़ानूनों को लागू करने के लिए, वे सख़्त से सख़्त सज़ा को लागू करने में रियायत नहीं देते और इस संबंध में वे सिखों को भी नहीं बख़्श्ते थे.

वेतन पर लगाईं जाने वाली पाबंदी का विरोध करने पर अबू तबीला सिखों पर हमला कराने से भी नहीं हिचकिचाए. अबू तबीला ने "हमेशा से विद्रोही" पश्तूनों में भी डर पैदा कर दिया था.

ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद (इंडिया ऑफ़िस रिकॉर्ड्स) के आर्काइव्ज़ के अनुसार, पश्तून क़बीले पहाड़ों और सख़्त इलाक़ों में अर्ध-ख़ानाबदोश शैली की बस्तियों में रहते थे, जो धन के लिए बाबंग डाहल के मैदानों और क़स्बों पर माल लूटने के लिए हमला करते थे. अबू तबीला से पहले कोई भी सरकार इन क़ानून को न मानने वाले क़बीलों और उनकी घाटियों पर नियंत्रण का दावा करने में कामयाब नहीं हो पाई थी.

पेशावर के लोगों का अत्याचारी शासक, शहर की दीवारों का संरक्षक

अबू तबीला की क्रूरता और कठोर शासन किस हद तक ग़लत या सही था, यह एक अलग चर्चा का विषय है, लेकिन पेशावर में गवर्नर के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान किये गए निर्माण कार्य को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है.

नवाज़-उद-दीन के अनुसार, जब अबू तबीला को पेशावर का गवर्नर नियुक्त किया गया था, तब शहर दो अलग-अलग दीवारों में बंटा हुआ था और निर्माण के संबंध में स्थिति बिगड़ रही थी. अतीत में, इस क्षेत्र में सिखों और पश्तूनों के संघर्ष के कारण, निर्माण कार्य लगभग न के बराबर थे और ऐसे में अबू तबीला ने इस शहर के लिए अपनी वज़ीराबाद सरकार की शैली का मॉडल तैयार किया.

"उन्होंने सबसे पहले सिविल और सैन्य दोनों इमारतों के लिए एक विशाल निर्माण कार्यक्रम शुरू किया और पेशावर शहर में टाउन प्लानिंग करते हुए इसे एक नए और आधुनिक तरीक़े से दोबारा बनाया. यूरोपीय सिद्धांतों के अनुसार सड़कों को चौड़ा किया गया, पुलों और सड़कों की व्यवस्था में सुधार किया गया और एक नया बाज़ार भी बनाया गया.

फ़ैसल शहर का निर्माण किया गया और इसके रखरखाव में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. बाला हिसार क़िले के प्रारंभिक निर्माण के साथ, शहर में सबसे अच्छी जल निकासी व्यवस्था के लिए शाही कठा को शुरू करने का श्रेय भी अबू तबीला को ही जाता है.

यहां तक कि पेशावर में पेड़ लगाने की शुरुआत भी अबू तबीला ने ही की. पेशावर में प्रसिद्ध पुरातत्व स्थल गोर खत्री परिसर को उन्होंने अपने सरकारी निवास के रूप में इस्तेमाल किया था."

पंजाब और महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में अक्सर आने वाले कर्नल सीएम वेड ने एंग्लो-अफ़ग़ान अभियान के संगठन के दौरान लिखे गए एक लेख में लिखा है कि पश्तून शहर पर अबू तबीला का शासन है. उन्होंने अबू तबीला द्वारा दी गई सैन्य और लॉजिस्टिक सहायता और ख़ैबर क़बाइलियों के साथ लेन-देन में उनकी क़ाबिलियत और ज्ञान की भी तारीफ़ की.

इन सबके बावजूद विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों में अबू तबीला के नाम को हमेशा क्रूरता और बर्बरता से जोड़ा गया.

सबसे पहले उनके वैभवशाली और कठोर शासन का उल्लेख करने वालों में वो ब्रिटिश अधिकारी थे जो पेशावर से गुजरते थे, जिनमें अलेक्ज़ेंडर बर्न्स, कर्नल सीएम वेड, कॉलिन मैकेंज़ी और हेनरी मोंटगोमरी लॉरेंस शामिल थे.

अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग इतिहासकारों ने अबू तबीला के शासनकाल और व्यक्तित्व का अपनी परिस्थितियों के अनुसार विश्लेषण किया है, जिसमें कुछ ने उन्हें नकारात्मक और कुछ ने सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है.

अबू तबीला
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अबू तबीला

अबू तबीला का अंत

सीता राम कोहली ने अपनी आख़िरी किताब 'सन सेट ऑफ़ दि सिख एम्पायर' में लिखा है कि साल 1839 में बलूचो के हाथों रणजीत सिंह की हत्या के बाद, अबू तबीला लाहौर में भी रुके थे. रणजीत सिंह की दर्दनाक मौत और अशांत परिस्थिति में उन्हें हालात अपने लिए ठीक नहीं लगे, तो उन्होंने अपने देश वापस लौटने का फ़ैसला किया और अपने वतन लौट गए.

एक यूरोपीय पर्यटक ग्रे सी ने अपने यात्रा वृतांत में अबू तबीला की वापसी का वर्णन इस तरह किया है, कि अपने वतन वापस लौटने के फ़ैसले के बाद अबू तबीला पेशावर आए और अपने मामलों को अंतिम रूप दिया, महिलाओं का शौक़ीन होने की वजह से उनके हरम में दर्जनों महिलाएं थीं, जो उन्होंने अपने दोस्तों और क़रीबियों में बांट दी. अपनी पत्नी को भी अपने साथ नहीं ले गए और वह इतने सिर फिरे थे कि अपनी बेटी की शादी अपने ही ख़ानसामे से करा दी.

अब उनके अपने गृहनगर पहुंचने का हाल पढ़िए. साल 1843 में अबू तबीला की वापसी पर उस समय के बादशाह ने उनके स्वागत में कोई ख़ास गर्मजोशी नहीं दिखाई और लंबे समय से सत्ता का लुत्फ़ उठा रहे अबू तबीला को अपने ही शहर में एक अजनबी की तरह ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर होना पड़ा.

हालांकि, बादशाह ने उन्हें एक सरकारी मेंशन (महल) बनाने की अनुमति दे दी.

यूरोपीय लेखक जे जे कॉटन ने अबू तबीला पर लिखी जीवनी, 'एन इटालियन एडवेंचर' में लिखा है कि महल के निर्माण के बाद उन्होंने अपनी 19 वर्षीय भतीजी (कुछ इतिहासकारों ने एक क़रीबी परिचित लिखा है) से शादी कर ली. हालांकि, उनके घरेलू मामले ठीक नहीं रहे, क्योंकि जवान पत्नी के ग़ैर-पुरुषों के साथ कथित संबंध की ख़बरें अक्सर उन्हें बेचैन कर देती थीं.

आख़िरकार 28 मार्च, 1850 को अबू तबीला की मृत्यु हो गई. अबू तबीला की मृत्यु के संबंध में भी कई मत हैं, लेकिन जिस पर सबसे अधिक सहमति है वह यही है कि धन के लालच में उनकी ही जवान पत्नी ने ज़हर देकर उनकी हत्या कर दी थी.

उनकी मृत्यु के बाद, इटली के अजीरोला शहर में उनका मक़बरा बनाया गया और नेपल्स में एक चौराहे का नाम उनके नाम पर रखा गया था. पेशावर में गोर खत्री में स्थित उनकी हवेली, दरबार और अदालत की मरम्मत और बहाली के बाद आने वाली कई सदियों तक के लिए पुरातत्व का हिस्सा बनाकर सरकार ने संरक्षित कर दिया है.

इतिहासकार उनके अंत के बारे में लिखते हैं कि अबू तबीला ने सैन्य और नेतृत्व क्षमताओं के आधार पर एक शानदार जीवन व्यतीत किया, यात्रा और अभियानों पर जाना उनका शौक़ था, उन्होंने युद्ध लड़े, प्रभावशाली राजाओं, महाराजाओं और पश्तून ख्वानियों को हराया. लेकिन अपनी ज़िंदगी अपने आख़िरी प्यार के हाथों हार गए.

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