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SPECIAL REPORT: गुस्से में हैं चरमपंथी हमले में मारे गए कश्मीरी सैनिकों के घरवाले

SPECIAL REPORT: गुस्से में हैं चरमपंथी हमले में मारे गए कश्मीरी सैनिकों के घरवाले

भारत प्रशासित कश्मीर के सुंजवान आर्मी कैंप में मारे गए सैनिकों के परिवारवालों से मंगलवार को जिस वक़्त मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती मुलाक़ात कर रही थीं, तक़रीबन उसी समय समाचार एजेंसियों पर ख़बर आई कि सुजवान कैंप में एक और जवान की लाश बरामद हुई है.

इसके साथ ही इस चरमपंथी हमले में मरने वाले सैनिकों की संख्या बढ़कर छह हो गई है. हमले में एक आम नागरिक की भी गोली लगने से मौत हो गई थी.

उधर, कश्मीर घाटी में कुपवाड़ा कस्बे का बटपोरा इलाक़े में ऊंची पहाड़ी पर बसे हबीबुल्लाह क़ुरैशी के घर में सन्नाटा है. एक परिवार है जो सदमे में है.

इस घर से क़रीब पच्चीस किलोमीटर दूर है मैदानपोरा, जहां मोहम्मद अशरफ़ मीर के घर में भी महिलाओं के मातम की आवाज़ें बाहर तक सुनाई दे रही हैं.

दोनों घरों के बाहर कुछ मर्द शवों के इंतज़ार में बैठे हैं. सोमवार देर शाम तक भी हबीबुल्लाह और मोहम्मद अशरफ़ के शवों को जम्मू से श्रीनगर नहीं लाया जा सका था.

हबीबुल्लाह और मोहम्मद अशरफ़ चार दिन पहले जम्मू में एक चरमपंथी हमले में मारे गए थे.

इस हमले में मारे गए सेना के सभी जवान भारत प्रशासित कश्मीर के हैं. अशरफ़ सेना में जूनियर कमीशंड अफ़सर थे और हबीबुल्लाह हवलदार थे.

'फ़ख्र है कि बेटा शहीद हुआ'

मोहम्मद अशरफ़ के पिता ग़ुलाम मोहिउद्दीन मीर घर की चौखठ से लेकर गली के मुहाने तक चक्कर काट रहे थे. वे बार-बार सड़क की ओर देखते कि कहीं उनके बेटे का शव तो नहीं पहुंच गया.

"कैसे एक बेटे को पालकर बड़ा किया..." सिर्फ़ इतना कहकर ग़ुलाम मोहिउद्दीन मीर एक लंबी आह भरते हैं. वो आगे कहते हैं, "बेटे को पालकर कैसे बड़ा किया, वो एक बाप ही जान सकता है. वो पूरे परिवार को चलाता था. मैंने अशरफ़ के लिए बड़ी मुश्किलें उठाईं. मुझे फ़ख्र है कि वो देश के लिए शहीद हुआ. ख़ुदा उसको उसका दर्जा दे."

मीर कहते हैं, "जब तक भारत और पाकिस्तान, दोनों देश आपस में बातचीत नहीं करेंगे तब तक ये सब होता रहेगा. आज मेरा बेटा मारा गया है तो कल किसी और का होगा. चरमपंथी हों या सेना के जवान, सभी तो हमारे ही बच्चे हैं. सब मारे जा रहे हैं. मुसलमान-मुसलमान को मार रहा है. ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि भारत और पाकिस्तान आपस में बातचीत नहीं कर रहे हैं. कश्मीर का मसला अब हल किया ही जाना चाहिए."

छोटे भाई के चेहरे पर दिखाई देता गुस्सा

अशरफ़ की बहन शहज़ादा और मां लैला को दिलासा देने आईं महिलाएं उन्हें चुप कराने की नाकाम कोशिशें करती हैं.

मोहम्मद अशरफ़ दो बेटों और एक बेटी के पिता थे. उनके दूसरे भाई भी भारतीय सेना में ही हैं. वहीं उनका सबसे छोटा भाई किसी से बात करने के लिए तैयार नहीं है. आक्रोश उसके चेहरे पर साफ़ दिखता है.

वहीं हबीबुल्लाह क़ुरैशी के घर के बाहर कुछ लोग खड़े हैं. उनके पिता अमानुल्लाह क़ुरैशी एक कोने में खड़े थे.

हमले से एक दिन पहले ही उनकी अपने बेटे से फ़ोन पर बात हुई थी. वो कहते हैं, "उसने घर में सबका हालचाल पूछा. पूरे परिवार का ख़र्च वही उठाता था. घर चलाने का दूसरा कोई ज़रिया नहीं है. ग़रीबी इतनी ज़्यादा थी कि बमुश्किल उसे सातवीं क्लास तक पढ़ा पाया था."

अमानुल्लाह कहते हैं, "कश्मीर में हाल के दिनों में तनाव बेहद ज़्यादा बढ़ा है. सेना और चरमपंथियों के बीच हो रही मुठभेड़ों में बड़ी तादाद में लोग मारे जा रहे हैं."

कश्मीर पर फ़ैसला चाहिए

कश्मीर में रोज़-रोज़ उठ रहे जनाज़ों पर वो कहते हैं, "यहां हर दिन कोई न कोई मारा जा रहा है. मरने वाला तो मर जाता है लेकिन अपने पीछे ज़िंदों के लिए परेशानियां छोड़ जाता है. बच्चे रोते रह जाते हैं, बीवी रोती रह जाती है. बूढ़े मां-बाप के लिए हालात मुश्किल हो जाते हैं. बड़े-बड़े नेताओं को बैठकर बातचीत करनी चाहिए और कश्मीर का फ़ैसला करना चाहिए."

ये कहते-कहते अमानुल्लाह ख़ामोश हो गए. उनकी आंखों से आंसू बहने लगे.

हबीबुल्लाह की बेटी मसरत कहती हैं, "हमने कभी नहीं सोचा था कि अब्बा के बारे में इतनी बुरी ख़बर हमें सुननी पड़ेगी. हमारे अब्बा शहीद हो गए. सरकार अब हमारे बारे में कुछ सोचे. एक विधवा मां के साथ अब हम छह बेटियां हैं."

हबीबुल्लाह की पत्नी ने अपने आंसुओं को थामने की हरसंभव कोशिश की. लेकिन उनके शब्दों पर आंसुओं का क़ब्ज़ा है. वो बस इतना ही कह पाईं कि मेरा सहारा चला गया. अब मैं और मेरी छह बेटियां किसकी तरफ़ देखें.

हबीबुल्लाह ने 23 साल पहले जबकि मोहम्मद अशरफ़ ने 18 साल पहले भारतीय फ़ौज में नौकरी शुरू की थी.

दोनों ही कुपवाड़ा के थे. अब दोनों के ही घरों में मातम है.

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