"रेल कोच के टॉयलेट के बीच वाली जगह में सोता था सोनू सूद, उसे मजदूरों का दर्द पता है"

नई दिल्ली- कोरोना लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों के मसीहा बने सोनू सूद के जीवन का एक पक्ष आज सारी दुनिया देख रही है। लेकिन,आज हम आपको उनकी जिंदगी की उस पहलू से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जिसके बारे में शायद उनके परिवार के अलावा किसी को भी नहीं पता है। सोनू सूद की जिस छवि को आज चारों ओर वाहवाही मिल रही है, उसका जज्बा उनके दिल में कहां से आया। वो कौन सी पीड़ा है, जिसके चलते महानगरों में फंसे हुए मजदूरों की असहनीय तकलीफों ने उनके मन को विचलित कर रखा है। असल में उनके व्यक्तित्व के इस पहलू की जड़ें उनके परिवार में हैं, उनके माता-पिता की शिक्षा में है; और यह बात उनकी पंजाबियत वाले आदर्श में भी महसूस की जा सकती है।

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    "रेल कोच के टॉयलेट के बीच वाली जगह में सोता था"

    47 साल के ऐक्टर सोनू सूद के माता-पिता आज इस संसार में नहीं हैं। उनकी बहन के मुताबिक करियर स्थापित करने के दौरान उन्होंने संघर्ष का जो जीवन गुजारा है, शायद उसी वजह से वो प्रवासी मजदूरों के दर्द को दूसरों से ज्यादा महसूस कर पा रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस में उनकी छोटी बन मल्विका सूद से हुई बातचीत का कुछ हिस्सा छापा है, जिसमें उन्होंने अपने भाई के मानवीय पहलू और उनके संघर्ष के दिनों की एक तरह से सजीव चित्रण कर दिया है। पंजाब के मोगा में रह रहीं मल्विका के मुताबिक, 'जब मेरा भाई नागपुर में इंजीनियरिंग का छात्र था, वह ट्रेन के कंपार्टमेंट में टॉयलेट के पास छोटी सी खाली जगह में सोकर घर आता था। मेरे पिता उसे पैसे भेजते थे, लेकिन उसकी कोशिश होती थी कि जितना बचा सकता था बचा ले। वह हमारे पिता की कड़ी मेहनत का बड़ा कद्र करता था। जब वह मुंबई में मॉडलिंग की करियर के लिए संघर्ष कर रहा था, ऐसे कमरे में रहता था, जहां सोने के दौरान करवट बदलने की भी जगह नहीं थी। करवट बदलने के लिए उसे खड़ा होना पड़ता था.....वहां जगह ही नहीं थी।'

    जब सोनू सूद ने कहा- आज मैं सीट पर बैठकर आया हूं

    जब सोनू सूद ने कहा- आज मैं सीट पर बैठकर आया हूं

    ऐसा नहीं था कि सोनू सूद के पिता उन्हें पैसे नहीं दे सकते थे। लेकिन, वह पिता के पैसे को बहुत ही हिफाजत से खर्च करना चाहते थे। खास बात ये है कि सोनू ट्रेन में कैसे सफर करते हैं और कैसे कमरे में रहते हैं, इस बात की भनक परिवार वालों को लगने भी नहीं देते थे। उनकी बहन ने कहा, 'उसने हम लोगों को कभी नहीं बताया, लेकिन जब उसकी पहलू मूवी रिलीज हुई और वो घर आया और कहा, "आज मैं सीट पे बैठके आया हूं, बड़ा अच्छा लग रहा है।" इसके बाद उसने हम लोगों को बताया कि वह ट्रेन में अक्सर पेपर के शीट पर बैठकर ट्रैवल करता है। '

    माता-पिता के आदर्शों पर चल रहे हैं सोनू सूद

    माता-पिता के आदर्शों पर चल रहे हैं सोनू सूद

    सोनू की बहन के मुताबिक वो अपने माता-पिता से बहुत ही ज्यादा अटैच थे और अभी वो जो कुछ भी कर रहे हैं, इसलिए कर रहे हैं ताकि वो उनपर गर्व कर सकें। मल्विका ने कहा, 'वो उन्हें इतना मिस करते हैं कि उन्होंने जो कुछ सिखाया है, उसे जिंदा रखना चाहते हैं। वह आज जो कुछ भी कर रहा है, वह वही जो हमारे माता-पिता ने हमें सिखाया है और जो उन्होंने अपने जीवन मे किया था। हम तीन भाई-बहन अपने माता-पिता को दूसरों की मदद करते हुए देखते हुए बड़े हुए हैं। मेरी मां डीएम कॉलेज मोगा में इंगलिश की लेक्चरर थीं और उनके पास जो भी जरूरतमंद स्टूडेंट ट्यूशन लेने के लिए आया उन्होंने उससे कभी भी फीस नहीं ली।'

    दूसरों को तकलीफ में नहीं देख सकते

    दूसरों को तकलीफ में नहीं देख सकते

    उन्होंने अपने पिता के बारे में बताया कि 'हमारे पिता मेन बाजार मोगा में बॉम्बे क्लोद हाउस करके एक दुकान चलाते थे और वह आज भी है। जब भी भैया आता था, वह पापा की दुकान पर जरूर जाता था। हमारे पास घर से लेकर दुकान तक करीब 15 कर्मचारी थे और वह हर किसी से निजी तौर पर जुड़े थे, उनके मेडिकल का खर्चा देते थे और उनकी और जरूरतों को भी देखते थे।' सोनू सूद के बारे में उनकी बहन ने हाल की एक बहुत ही अच्छी जानकारी दी है, 'जब उसने घर भेजो प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना बनाई और पहली बस का इंतजाम किया, उसने मुझसे कहा, "पंजाबी होने के नाते हम दूसरी तरह से देखने की सोच भी नहीं कर सकते, जबकि हमें पता है कि कोई कितनी तकलीफ में है"'

    मेरी मां अक्सर कहा करती थीं.......

    मेरी मां अक्सर कहा करती थीं.......

    सोनू सूद ने भी यही बात कही है। उनके मुताबिक प्रवासियों को पैदल अपने घरों की ओर निकलते हुए देखकर उन्हें सहानुभूति आ गई। ऊपर से पंजाबी होने के नाते और मां-बाप ने उन्हें जो सिखाया था, वह हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रह सकते थे। सोनू सूद ने कहा है, 'मैं खुद को उनके (प्रवासियों) साथ जोड़ सकता हूं। जब मैं मुंबई आया, मैं ट्रेन से आया और रिजर्वेशन नहीं था। जब मैं नागपुर में इंजीनियरिंग कर रहा था, मैं अक्सर बसों और ट्रेनों में बिना रिजर्वेशन ही सफर करता था। जब मैनें प्रवासियों को रोड पर पैदल जाते हुए देखा, बच्चों, बुजर्गों के साथ, वह मेरी जिंदगी के सबसे परेशान वाले दृश्य थे। मैंने फैसला किया कि मैं घर पर नहीं बैठूंगा और इनके लिए कुछ करूंगा। मेरी मॉम बच्चों को मुफ्त में पढ़ाती थीं, मेरे पिता अपनी दुकान के बाहर अक्सर लंगर लगाते थे। मैं पंजाब में उन वैल्यू के बीच में बड़ा हुआ हूं। मेरी मां अक्सर कहा करती थी, अगर तुम किसी की मदद नहीं कर सकते तो तुम खुद को कामयाब मत मानो। मेरा बैकग्राउंड, मेरे माता-पिता ने जो मुझमें संस्कार भरे हैं, मैं जो भी कर रहा हूं उसके पीछे की वजह वही है। '

    18,000 प्रवासियों को घर भेज चुके हैं

    18,000 प्रवासियों को घर भेज चुके हैं

    सोनू सूद का कहना है कि उन्होंने अबतक 18,000 प्रवासियों को उनके घर भेजने में सहायता की है। उन्होंने सबसे पहले 350 प्रवासियों को बस से कर्नाटक भेजकर यह सिलसिला शुरू किया और फिर करते ही चले गए। शुरुआत में उन्होंने मुंबई के जुहू में अपना होटल नर्सों और पारामेडिकल स्टाफ को आराप करने के लिए दे दिया। फिर उन्होंने जरूरतमंदों को खाना खिलाने का भी काम शुरू करवाया। उनका कहना है कि अब वह प्रवासियों को उनके घर भेज रहे हैं और यह काम तबतक नहीं रुकेगा जबतक कि अंतिम प्रवासी अपने घर नहीं पहुंच जाता।

    'सोनू सूद श्रीवास्तव' हमेशा याद रहेगा

    'सोनू सूद श्रीवास्तव' हमेशा याद रहेगा

    जब सूद से ये सवाल किया गया कि उन्हें प्रवासियों को उनके घर भेजकर सबसे ज्यादा खुशी का अनुभव कब हुआ। तब उन्होंने कहा कि उन्होंने एक प्रवासी से सुना कि उन्होंने अपने बच्चे का नाम सोनू सूद श्रीवास्तव रखा है। उनके मुताबिक इस बात को वह कभी नहीं भूल पाएंगे। सोनू सूद का कहना है कि अपने माता-पिता को गर्व महसूस कराने के लिए वह उन्हीं के रास्ते चलेंगे, जो वो उन्हें दिखाकर गए हैं।
    (कुछ तस्वीरों के लिए इंडियन एक्सप्रेस का आभार)

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