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झारखंड : नोट फॉर वोट मामले में चार्जशीटेड शिबू सोरेन की बहू, क्या जामा में लगा पाएंगी जीत की हैट्रिक ?

क्या शिबू सोरेन की बहू जामा में लगा पाएंगी जीत की हैट्रिक

नई दिल्ली। झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन जामा की मौजूदा विधायक हैं। 2019 में भी वे चुनाव मैदान में हैं। सीता सोरेन के खिलाफ नोट फॉर वोट का आपराधिक मामला चल रहा है। इस मामले में चार्जशीट भी दाखिल हो गयी है। सीता सोरेन पर आरोप है कि राज्यसभा चुनाव में वोट देने के लिए उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी आरके अग्रवाल से 1.5 करोड़ रुपये लिये थे। सीता सोरेन के विवादों की वजह से शिबू सोरेन और झामुमो की किरकिरी होती रही है। लेकिन पारिवार में उत्तराधिकार का संतुलन बनाये रखने के लिए शिबू सोरन सब कुछ सहने पर मजबूर हैं। जामा में पांचवें और आखिरी चरण के तहत 20 दिसम्बर को वोट पड़ेंगे। झामुमो उम्मीदवार और विधायक सीता सोरेन का मुकाबला भाजपा के सुरेश मुर्मू से हैं। पिछले चुनाव में सुरेश मुर्मू करीब दो हजार वोटों के मामूली अंतर से ही हारे थे। इस बार उन्होंने पूरा जोर लगाया है।

शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन

शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन

शिबू सोरन के तीन पुत्रों में दुर्गा सोरेन सबसे बड़े थे। दुर्गा सोरेन का 2009 में असामयिक निधन हो गया था। दुर्गा सोरेन सबसे पहले राजनीति में आये थे। शिबू ने उन्हें 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में दुमका के जामा से चुनाव में उतारा था। वे जीते भी। 2000 में भी दुर्गा सोरेन विधायक बने थे। लेकिन 2005 में वे भाजपा के सुनील सोरेन से हार गये थे। 2009 में दुर्गा सोरेन के निधन के बाद सीता सोरेन ने अपने पति की सीट जामा पर दावा ठोक दिया। शिबू सोरेन बहू को मना नहीं कर सके। इसके बाद सीता सोरेन झामुमो के टिकट पर 2009 में जामा से विधायक बनीं। 2014 में भी वे जीतीं। शिबू सोरेन के दूसरे पुत्र हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। तीसरे पुत्र बसंत सोरेन अभी पार्टी की युवा शाखा के अध्यक्ष हैं। वे भी पिछले कुछ समय से राजनीति पारी शुरू करने के लिए जोर लगाते रहे हैं लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल पा रहा है। शिबू के परिवार में सबकी अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं।

नोट ऑर वोट का मामला

नोट ऑर वोट का मामला

2012 में राज्यसभा की दो सीटों के लिए झारखंड में चुनाव हुआ था। इस चुनाव में ऐसा भ्रष्टाचार हुआ था कि इसकी गूंज पूरे देश में हुई थी। उस समय भी सीता सोरेन झामुमो की विधायक थीं। उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने राज्यसभा के निर्दलीय उम्मीदवार आरके अग्रवाल को वोट देने के बदले 1.5 करोड़ रुपये लिये थे। आरोप के मुताबिक रिश्वत का पैसा सीता सोरेन के पिता बोध नारायण मांझी ने लिया था। वे बहुत समय तक फरार रहीं। घर की कुर्की जब्ती तक हुई। फिर जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा। उनके पिता बोध नारायण भी गिरफ्तार हुए थे। इस मामले की जांच सीबीआइ कर रही है। जांच मुकम्मल होने के बाद सीबीआइ ने चार्जशीट फाइल कर चुकी है। सीता सोरेन के इस मामले ने शिबू सोरेन की भी मुसीबत बढ़ा दी।

सीता सोरेन की वजह से शिबू भी परेशान

सीता सोरेन की वजह से शिबू भी परेशान

मार्च 2019 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सीता सोरेन की मामले की सुनवाई के दौरान शिबू सोरेन के नोट फॉर वोट मामले की समीक्षा का आदेश दिया था। शिबू इस मामले में बरी हो चुके थे। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट दोबारा इस मामले पर विचार करेगा। यानी सीता सोरेन की वजह से शिबू सोरेन की भी परेशानी बढ़ गयी। सीता सोरेन ने नोट फॉर वोट मामले को रद्द करने के लिए झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। फिर सीता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने सीता के मामले की सुनवाई के दौरान शिबू सोरेन के पुराने मामले का जिक्र आया। आरोप लगा था कि 1993 में केन्द्र की नरसिम्हा राव सरकार को बचाने के लिए झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन और पार्टी के तीन सांसदों शैलेन्द्र महतो, सूरज मंडल और साइमन मरांडी ने तीन करोड़ रुपये की रिश्वत ली। इन चारों सांसदों ने विश्वास मत के दौरान नोट लेकर नरसिम्हा राव सरकार के समर्थन में वोट किया था। शिबू सोरेन का मामला भी कोर्ट में गया था लेकिन वे बरी हो गये थे। अब इस मामले में सप्रीम कोर्ट विचार करेगा कि क्या किसी सांसद या विधायक को सदन में बोलने या वोट देने के बदले नोट लेने की छूट है ? क्या वह ऐसा कर के आपराधिक मुकदमे से बचने का दावा कर सकता है ?

शिबू सोरेन भी रहे हैं जामा के विधायक

शिबू सोरेन भी रहे हैं जामा के विधायक

जामा विधानसभा क्षेत्र दुमका लोकसभा सीट का हिस्सा है। दुमका झामुमो का गढ़ रहा है। शिबू सोरेन भी जामा से विधायक रहे हैं। शिबू सोरेन 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव में जामा से विधायक चुने गये थे। शिबू के प्रभाव के कारण ही उनके पुत्र दुर्गा यहां से विधायक बने। अब यहां शिबू की विरासत सीता संभाल रही हैं। विवादों के बाद भी वे दिशोम गुरू के नाम पर चुनाव जीतती रही हैं। इस बार जामा में कांटे की टक्कर है।

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