शशि कपूर-जेनिफ़र कैंडल की लव स्टोरी, 28 साल की मोहब्बत में अकेलेपन के 31 साल
त्रिशूल फ़िल्म का एक गाना है, 'मोहब्बत बड़े काम की चीज़ है, काम की चीज़ है', जिसमें शशि कपूर अपने शोख और चुलबुले अंदाज़ में माशूका हेमामालिनी के साथ बार बार ये दोहरा रहे हैं कि 'मोहब्बत बड़े काम की चीज़ है.'
ये शशि कपूर के लिए केवल एक फ़िल्म के गाने के बोल भर नहीं थे क्योंकि उनका पूरा जीवन ही प्रेम से सजा संवरा था. शशि कपूर और जेनिफ़र कैंडल की प्रेम कहानी भले आज से यही कोई 52 साल पहले शुरू हुई थी लेकिन इसे आज भी बॉलीवुड की सबसे बेमिसाल लव स्टोरी मानने में शायद ही किसी को कोई मुश्किल होगी.
ये लव स्टोरी शुरू हुई थी, 1956 में और उसके बाद शशि कपूर अपने पूरे जीवन भर इस मोहब्बत से बाहर नहीं निकल पाए थे. वैसे इसकी शुरुआत बेहद दिलचस्प अंदाज़ में हुई थी.
जेनिफ़र की छोटी बहन और ब्रिटिश रंगमंच की जानी मानी अदाकारा फैलिसिटी कैंडल ने अपनी पुस्तक 'व्हाइट कार्गो' में लिखा है, "जेनिफ़र अपने दोस्त वैंडी के साथ नाटक 'दीवार' देखने रॉयल ओपेरा हाउस गई थी. शशि तब 18 साल के थे.नाटक शुरू होने से पहले उन्होंने दर्शकों का अंदाज़ा लगाने के लिए पर्दे से झांका और उनकी नजर चौथी कतार में बैठी एक लड़की पर गई. काली लिबास और सफेद पोल्का डॉट्स पहने वो लड़की ख़ूबसूरत थी और अपनी सहेली के साथ हंस रह थी. शशि के मुताबिक वे उसे देखते ही दिलो-जान से उस पर फिदा हो गए थे."
लेकिन तब पृथ्वी थिएटर में काम करने वाले शशि कपूर की कोई बड़ी पहचान नहीं थी, उनकी उम्र महज 18 साल थी. दूसरी तरफ जेनिफ़र अपने पिता जेफ़्री कैंडल के थिएटर समूह की लीड अभिनेत्री थीं. थिएटर के चलते दोनों के पिता भी आपस में एक दूसरे को पहचानते थे. लेकिन इन सबके बाद भी शशि कपूर को जेनिफ़र से दोस्ती के लिए इंतज़ार करना पड़ा.
शशि कपूर ने अपनी पुस्तक पृथ्वीवालाज में लिखा है, "मैंने जेनिफर के कई नाटक भी देखे, लेकिन उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया. कुछ दिनों के बाद एक दिन रॉयल ओपेरा हाउस में उन्होंने कहा कि मैं बंबई में रहती हूं और हम लोग मिल सकते हैं."
शशि कपूर को गे समझ बैठी थीं जेनिफ़र
इसके बाद शशि कपूर रोजाना ही जेनिफ़र से मिलने लगे. जेनिफ़र तब शशि कूपर से पांच साल बड़ी थीं. इसके लिए वे मुंबई की लोकल से एक स्टेशन ज़्यादा दूर तक जाते थे ताकि जेनिफ़र के साथ फिर वे थिएटर के अभ्यास के लिए रॉयल ऑपेरा हाउस तक साथ साथ जाते थे.
उन्होंने अपने इन मुलाकातों के बारे में लिखा है, "रॉयल ऑपेरा हाउस के पास एक ढाबा हुआ करता था, मथुरा डेयरी फर्म. हम लोग तब पूरी भाजी की प्लेट खाते थे. तब एक प्लेट चार आने का मिलता था. साथ ही खाते थे."
वैसे दिलचस्प ये ही तब शशि कपूर बेहद शर्मीले हुआ करते थे, इतने शर्मीले कि जेनिफ़र उन्हें गे समझने लगी थीं. इस बारे में शशि कपूर ने पृथ्वीवालाज़ में लिखा है, "जेनिफ़र ने मुझे बाद में बताया कि वो मुझे गे समझने लगी थी."
हालांकि इसकी वजह भी बेहद दिलचस्प थी. शशि कपूर भारतीय मानसिकताओं के मुताबिक जब जेनिफ़र के साथ होते थे, तब उनका हाथ पकड़ बैठे रहते थे. जेनिफ़र जिस संस्कृति से आई थीं, वहां हाथ में हाथ लेकर बैठने को असहज माना जाता था.
लेकिन दोनों के बीच प्यार परवान चढ़ता गया, इस प्यार के चलते ही शशि कपूर अपने होने वाले श्वसुर की थिएटर कंपनी से भी जुड़ गए थे. लेकिन जेफ्री कैंडल अपनी बेटी को लेकर काफ़ी पजेसिव थे और नहीं चाहते थे कि शशि कपूर की उनसे शादी हो.
लेकिन शशि कपूर धीरे धीरे कैंडल परिवार के बाक़ी सदस्यों के दिल में समाते जा रहे थे.
इसके बारे में फेलिसिटी कैंडल ने व्हाइट कार्गो में लिखा है, "वे काफी हंसमुख और आकर्षक थे. मैं इतने ज़्यादा इश्कबाज़ इंसान से कभी नहीं मिली. वो प्यार से तारीफ़ें करने और साथ ही हड़काने का काम बखूबी अंजाम देते, वो भी मोहक अंदाज में कि कोई उन्हें रोक नहीं सकता. वो बेहद दुबले थे, लेकिन आंखें खूब बड़ी-बड़ी, लंबी घनी पलकों का किनारा लगता कि और बहका रही हों. उनके चमकदार सफेद दांत और गालों पर पड़ते शरारती डिंपल के साथ वह महिलाओं और पुरुषों में किसी के भी दिल में अपना रास्ता बना लेते."
हालांकि शशि कपूर और जेनिफ़र की शादी आनन फ़ानन में तब हुई, जब वे जेफ्री कैंडल के थिएटर समूह शेक्सपीयराना के साथ सिंगापुर में थिएटर कर रहे थे, वहां एक दिन जेनिफ़र ने उनके साथ अपने पिता का घर छोड़ दिया. गुस्से में जेफ्री कैंडल ने शशि के काम के पैसे भी नहीं दिए.
बाद में राजकपूर ने उन दोनों को वापस भारत लाने की व्यवस्था की और 1958 में शशि कपूर और जेनिफ़र की शादी कपूर खानदान ने करा दी. हालांकि कपूर खानदान अपने लिए विदेशी बहू को लेकर बहुत सहज नहीं हो पाया था. पर शशि कपूर ने सबको मना लिया.
वो दौर तब था जब शशि कपूर का फ़िल्मी करियर शुरू भी नहीं हुआ था. एक साल के अंदर शशि कपूर पिता बन गए और उनके पिता ने आर्थिक दिक्कतों और स्वास्थ्यगत समस्याओं के चलते पृथ्वी थिएटर को बंद करने का फ़ैसला कर लिया था.
लिहाजा शशि कपूर के पास कोई काम नहीं था, लेकिन जेनिफर के साथ ने उन्हें गढ़ना शुरू कर दिया था. जेनिफ़र ने इसके लिए अपना थिएटर प्रेम को भी कुर्बान कर दिया था.
'द कपूर्स- द फर्स्ट फैमिली ऑफ़ इंडिया' पुस्तक में मधु जैन ने कपूर परिवार के पूरे सफर का दस्तावेज तैयार किया है. इस पुस्तक में इस बात का जिक्र है कि जेनिफर ने शशि कपूर के जीवन को इस कदर संवारना शुरू किया कि वे कपूर परिवार के इकलौते अनुशासित शख्स बन गए थे.
अनुशासन का मतलब- शशि कपूर, कपूर खानदान के पहले शख्स बने जो बंगले से निकल कर फ्लैट में रहने लगा, सुबह के नाश्ता और रात का खाना घर में परिवार के साथ खाने लगे, सिगरेट-शराब सब पर अकुंश और तो और रविवार का समय केवल और केवल परिवार के लिए रखा था उन्होंने.
शशि कपूर रविवार को ना तो काम करते थे, ना दोस्तों के घर जाते और ना ही दोस्तों को अपने घर बुलाते. हां छुट्टियों पर पूरे परिवार को घुमाने फिराने ले जाने की ज़िम्मेदारी उनकी थी.
शशि कपूर की फ़िटनेस का राज
लेकिन उनका फिल्मी करियर परवान चढ़ने लगा था और देखते देखते वे बॉलीवुड के वैसे कलाकार बन गए जिसके पास इतना काम था कि उन्हें शिफ्टों में काम करना पड़ रहा था, इसी वजह से राजकपूर उन्हें टैक्सी कहने लगे थे.
इन सबके बीच अपने मोटापे के लिए मशहूर कपूर खानदान के शशि कपूर छरहरे बने रहे, जेनिफ़र ने उनके खान पान को ऐसे नियंत्रित किया कि शशि कपूर की कमर और पेट पर एक इंच चर्बी नहीं चढ़ी.
हिंदी फिल्मों के अलावा इंटरनेशनल स्तर पर भी सराहे जाने लगे थे. शशि कपूर ने इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी के साथ मिलकर 'द हाउसहोल्डर', 'शेक्सपीयर वाला', 'बॉम्बे टाकी', 'हीट एंड डस्ट' जैसी फ़िल्मों में अदाकरी के जलवे बिखेरे. कुछ फ़िल्मों में उनके साथ जेनिफ़र भी नजर आईं.
शशि कपूर की फिल्में दौड़ रही थीं और घर परिवार में सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन उनका मन कुछ और भी करने को कर रहा था, तब उन्होंने जेनिफर से सलाह ली जेनिफ़र ने उनसे कहा कि जो मन हो, वही करो. हालांकि जो मन हो वो काम करना उतना आसान भी नहीं था.
शशि कपूर ने सबसे पहले अपने पिता के पृथ्वी थिएटर को फिर से शुरू करने का बीड़ा उठाया. उनके इस आइडिया के बारे में जेनिफ़र ने अपने बहन फेलिसिटी कैंडल को लिखा था, "शशि पागल हो गए हैं, वो थिएटर शुरू करना चाहते हैं."
जो मन में आए वो करो
लेकिन जेनिफ़र ने अपने पति का पूरा साथ दिया. 1978 में उन्होंने अपनी पत्नी जेनिफ़र के साथ उसी जगह पर इसे शुरू किया था, जहां उनके पिता के समय पर इसका पर्दा गिरा था. पृथ्वी थिएटर को शुरू करने के लिए राज कपूर और शम्मी कपूर सामने नहीं आए, ये काम शशि कपूर ने किया और इसके लिए उन्होंने अपनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा लगाया, क्योंकि पृथ्वी थिएटर के लिए ज़मीन उन्हें बजाज परिवार से खरीदनी पड़ी थी.
इस ज़मीन पर पृथ्वी थिएटर के निर्माण की एक एक बारीकी को जेनिफ़र ने ही संभाला और जब पृथ्वी थिएटर बनकर तैयार हुआ था तब उस तरह का थिएटर मुंबई में वो इकलौता था.
इस थिएटर में हर नाटक का शो देखने शशि कपूर और जेनिफ़र साथ ही पहुंचते थे, हमेशा टिकट ख़रीदकर देखते थे.
साथ ही शशि कपूर ने 'फिल्मवालाज़' की स्थापना करके उन्होंने 'जुनून', '36 चौरंगी लेन', 'कलयुग', 'विजेता', 'उत्सव' और 'अजूबा' जैसी फिल्में बनाई. इनमें 'जुनून', '36 चौरंगी लेन' और 'कलयुग' को समानांतर फिल्मों में बेहद अहम माना जाता है. श्यान बेनेगल, अपर्णा सेन, गोविंद निहलानी जैसे फ़िल्मकारों को मौका देने का काम भी शशि कपूर ने कर दिखाया था.
इन सब कामों को कर भले शशि कपूर रहे थे लेकिन इन सबके पीछे जेनिफ़र एक ताक़त की तरह लगी हुई थीं.
लेकिन शायद जेनिफ़र के पास बहुत समय नहीं था, 1982 में वो कैंसर की चपेट में आ गईं. शशि कपूर ने कोई कसर नहीं रखी, मुंबई से लेकर लंदन तक के डॉक्टरों से इलाज कराया लेकिन 7 सितंबर, 1984 को जेनिफ़र का निधन हो गया.
इसके साथ ही शशि कपूर की दुनिया में एक ऐसा सूनापन आ गया जो कभी नहीं भरा.
'शशि कपूर- द हाउसहोल्डर, द स्टार' में असीम छाबड़ा ने जेनिफ़र के बाद शशि कपूर के जीवन पर एक चैप्टर लिखा. जिसमें शशि कपूर के बेटे कुणाल कपूर के हवाले से बताया गया कि जेनिफर की मौत के बाद पहली बार शशि तब रोए जब वे गोवा के समुद्री तट से एक बोट लेकर समुद्र के काफी अंदर तक चले गए थे.
अब जरा इस दृश्य की कल्पना कर लीजिए. एक नाव पर और समुद्र के भीषण सन्नाटे में जार जार रोते शशि कपूर. अपनी पत्नी की मौत के बाद वे इस तरह टूटे कि शशि कपूर पहले जैसे कभी नहीं हो पाए. वे घंटों तक अपने अपार्टमेंट में अकेले चुपचाप बैठते रहे थे.
वे खाने और पीने की अपनी पुरानी खानदानी कमजोरी की चपेट में आ गए. क्योंकि 28 सालों तक जेनिफ़र की मोहब्बत में शशि कपूर बॉलीवुड के सबसे फिट स्टार बने रहे, वहीं उनके निधन के बाद उनका मोटापा बढ़ने लगा. उन्होंने फिर कभी अपना ध्यान नहीं रखा.
शशि और जेनिफ़र एक दूसरे से कितनी मोहब्बत करते थे या बाद में उनकी कितनी कमी महसूस करते थे, इन सबके बारे में 1991 में इंडिया टुडे के लिए एक इंटरव्यू में उनसे कई बार पूछा गया लेकिन हर बार शशि कपूर ने यही कहा, "वो मेरा जातीय मसला है, मैं उस बारे में भी कुछ नहीं बोलूंगा. एक लाइन भी नहीं बोलूंगा."
हालांकि उन्होंने उस इंटरव्यू में ये भी कहा था कि उन्होंने कभी दूसरे शादी के बारे में सोचा ही नहीं क्योंकि उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं है. 4 दिसंबर, 2017 तक अपनी मौत के समय तक शशि कपूर, जेनिफ़र की यादों के साथ जीवित रहे.
28 साल के प्यार के सहारे 31 साल अकेलेपन में गुजारने का हौसला कोई शशि कपूर तभी कर पाता है जब उसके पास जेनिफ़र जैसी मोहब्बत हो.
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