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दूसरे राज्यों में भी महाराष्‍ट्र की तरह बीजेपी का खेल बिगाड़ सकते हैं शरद पवार!

बेंगलुरु। महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार के अंतिम दिन सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई। ये तस्वीर शरद पवार की सतारा में एक चुनाव प्रचार के दौरान की तस्वीर थी, जिसमें मूसलाधार बारिश में बिना रुके पवार भाषण दे रहे थे। महाराष्‍ट्र विधान सभा परिणाम जो आए उसमें इस तस्वीर की अहम भूमिका रही। इस तस्वीर ने गेम चेंजर का काम किया। इस तस्वीर के वायरल होने के साथ ही लोगों ने पवार के जुझारुपन और उनकी डटे रहने की क्षमता के बारे में बातें करनी शुरू कर दी।

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परिणाम आने के बाद से शरद पवार आखिर तक कहते रहे कि वो जनादेश के साथ जाएंगे, लेकिन उन्‍होंने शिवसेना को अपना हाथ थमाकर अपनी मनमुताबिक अघाडी सरकार बनवा डाली। शरद पवार ने उद्धव ठाकरे का मूड पहले ही भांप लिया था। उन्हें मालूम था कि इस बार शिवसेना भाजपा के साथ नहीं जाएगी। सोनिया गांधी अपना समर्थन शरद को देंगी कि नहीं, सब लोग यही भांपते रहे। लेकिन शरद ने कांग्रेस को चुपचाप रहने को कहा। ये लोग इंतज़ार करते रहे और अंत में जब शिवसेना के पास कोई रास्ता नहीं बचा तब शरद पवार ने अपना खेल शुरू किया।

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जो पहले कह रहे थे कि शरद पवार चुपचाप अजित का साथ दे रहे हैं, वो गलत साबित हुए। धीरे-धीरे शरद पवार ने ये जता दिया कि अजित पवार ने पार्टी से धोखा किया। पार्टी असल में अभी तक शरद पवार के साथ है। बीजेपी ने बेहद जल्दबाज़ी में सरकार बनाने का दावा कर दिया। अपना मुख्यमंत्री बनाकर अजित को उप-मुख्यमंत्री बना दिया। अजित के बीजेपी में जाने को 'बग़ावत' करार दिया और महज़ 12 घंटे के अंदर 54 में से 42 विधायक उनके साथ दोबारा खड़े हो गए।

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महाराष्ट्र में एनसीपी प्रमुख के लिए किसी की भी जीत से ज़्यादा ज़रूरी थी भाजपा की हार। पिछले लोकसभा चुनाव के पहले भी शरद पवार ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया था, लेकिन कामयाब नहीं हुए। लेकिन ईडी के एफआईआर के बाद से अब तक शरद पवार जिस तरह आक्रमक रुख अपनाए हुए हैं उससे यही लग रहा है कि वह दिल्ली और बिहार में भी वह महाराष्‍ट्र वाला पैतरा चलने की तैयारी कर रहे हैं। पवार के नये सिरे से सक्रिय होने की संभावना इसलिए भी लगती है क्योंकि विपक्षी खेमा उनके अनुभव से प्रभावित रहा है और महाराष्ट्र में तो एनसीपी नेता ने खुद को नये सिरे से साबित कर दिया है।

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गौरतलब है कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार पिछले दो दिनों से लगातार भाजपा और प्रधानमंत्री के विरोध में लगातार बयान दे रहे हैं। पहले उन्‍होंने बयान दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें साथ मिलकर काम करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि लेकिन, उनकी बेटी सुप्रिया सुले, बेजो पुणे जिला में बारामती से सांसद हैं, मोदी के नेतृत्व वाली कैबिनेट में सुप्रिया (सुले) को मंत्री बनाने का एक प्रस्ताव दिया था।

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पवार ने कहा कि उन्होंने मोदी को साफ कर दिया कि उनके लिए प्रधानमंत्री के साथ मिलकर काम करना संभव नहीं है। वहीं मंगलवार को एक साक्षात्कार में पवार ने कहा कि उन्हें पता था कि भतीजे अजित पवार भाजपा और देवेंद्र फडणवीस से संपर्क में हैं, लेकिन सोचा नहीं था कि इस हद तक चले जाएंगे। इन बयानों से जहां एक ओर भाजपा और पीएम नरेन्‍द्र मोदी पर निशाना साध रहे वहीं वह यह साबित कर रहे हैं कि भविष्‍य में भी वह भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर स‍कते हैं। माना जा रहा है कि महाराष्‍ट्र एपिसोड के बाद अन्‍य राज्यों की राजनीति शरद पवार अहम भूमिका निभांएगे।

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महाराष्ट्र में भी शरद पवार ने परदे के पीछे वही राजनीति की जो आम चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर कर रहे थे। अंतर सिर्फ इतना था कि आमचुनाव से पहले उन्‍हें यह किया लेकिन महाराष्ट्र में सब कुछ चुनाव परिणाम आने के बाद हो रहा था। महाराष्‍ट्र में जो भी समीकरण बन या बिगड़ते लग रहे थे वे आंकड़ों पर आधारित रहे। अगर महाराष्ट्र में बीजेपी की सीटें कम नहीं आयी होतीं तो इन समीकरणों की दूर दूर तक कोई संभावना ही नहीं थी।

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बता दें झारखंड चुनाव के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। शरद पवार की बातें इस बार पहले के मुकाबले ज्यादा दमदार हो सकती हैं क्योंकि महाराष्‍ट्र मिशन को वो सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचा चुके हैं। अगर महाराष्ट्र मॉडल पर कांग्रेस और आप दिल्ली के लिए राजी हो गये तो बीजेपी के लिए मुश्किल तो खड़ी हो ही सकती है। हालांकि, दिल्ली और बिहार चुनाव की तैयारियों की दशा और दिशा दोनों ही झारखंड विधानसभा के नतीजे आने के बाद ही तय हो पाएंगी। झारखंड का चुनाव बीजेपी के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि वही रास्ता दिखाएगा कि बीजेपी के लिए आगे कि राह कितनी आसान या मुश्किल है।

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दिल्ली के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होंगे। महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव के नतीजे आने के बाद से नीतीश कुमार और उनके जेडीयू के साथी भी बदले हुए नजर आ रहे हैं। बीजेपी को बिहार की सत्ता से बाहर करने को लेकर बिहार की राजनीतिक पार्टियां भी महाराष्‍ट्र से सीख लेकर अपना पैतरा बदल सकती है। वहीं बिहार चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होगे। लंबे समय से बीजेपी इन राज्यों में अपना वर्चस्‍व बनाने के प्रयास में जुटी हुई है।

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इसलिए इन तीन राज्यों में बीजेपी का सबसे ज्यादा जोर रहेगा। इसमें पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी तो भाजपा के टारगेट पर सबसे ऊपर हैं। बता दें पश्चिम बंगाल में तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के समय से ही सक्रिय हैं। वहीं केरल की बात करें तो काग्रेंस के पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गांधी के केरल पहुंचना भाजपा को आंखो में तभी से खटक रहा है।

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