पूर्व जस्टिस दीपक गुप्ता बोले-जजों को रिटारमेंट के बाद नहीं स्वीकारने चाहिए सरकारी पद
नई दिल्ली। पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई द्वारा राज्यसभा की सदस्यता को स्वीकारने के बाद लगातार उठ रहे सवाल थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। अब उनके साथ काम कर चुके जस्टिस दीपक गुप्ता ने इस मामले पर कहा है कि, न्यायपालिका के प्रति जनता की धारणा बदल गई है। लोग संदेह करने लगते हैं जब कोई न्यायाधीश अपनी सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद कोई अन्य सरकारी पद स्वीकार कर लेता है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि शीर्ष अदालत को अल्पसंख्यकों और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहिए। जस्टिस दीपक गुप्ता सुप्रीम कोर्ट में तीन साल की सेवा के बाद 6 मई, 2020 को रिटायर हो गए।

न्यूज 18 को दिए इंटरव्यू में पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के राज्यसभा संसद बनने और पी सदाशिवम द्वारा राज्यपाल का पद स्वीकारने पर जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि, मेरे विचार में, जनता बहुत खुशी से इसे स्वीकार नहीं करती है जब न्यायाधीश अपनी सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद सरकारी कार्यभार ग्रहण करते हैं। उन्हें इसे लेकर संदेह रहता है। जनता को लगता है कि शायद जज को किसी बाहरी कारण से यह पद मिला है। बड़ी संख्या में लोगों की यह धारणा है। यह कई मामलों में सही हो सकता है या हो सकता है कि जनता की धारणा हो।
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि, मैं उन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के पक्ष में नहीं हूं जो रिटायर होने के बाद राजनीतिक पद स्वीकार करते हैं। आम तौर पर उन्हें ऐसे पदों को स्वीकार नहीं करना चाहिए। मैं इसके पक्ष में नहीं हूं। मैंने ऐसा नहीं किया और ना ही मैं ऐसा कोई पद स्वीकार करूंगा। जजों के रिटारमेंट के बाद सरकारी पदों को स्वीकारने के सवाल पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि, मेरे दिवंगत मित्र अरुण जेटली कहते थे कि न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई जानी चाहिए, लेकिन उन्हे सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए।
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि, कुछ पद ऐसे हैं जिन्हें सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा भरा जाता है, लेकिन कुछ न्यायाधीशों ने न्यायाधिकरणों में असाधारण रूप से अच्छा काम किया है। हालांकि व्यक्तिगत रूप से मैं सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरी के पक्ष में नहीं हूं और मैं इस तरह का कोई पद नहीं लूँगा। इससे पहले बुधवार को रिटायर के बाद जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा था कि ''सिस्टम का काम करना अमीरों और शक्तिशाली लोगों के पक्ष में अधिक लगता है। यदि एक अमीर व्यक्ति सलाखों के पीछे है, तो सिस्टम तेजी से काम करता है। जब कोई किसी गरीब की आवाज उठाता है तो सुप्रीम कोर्ट को उसे सुनना चाहिए और जो भी गरीबों के लिए किया जा सकता है वो करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में संस्थान की अखंडता ( ईमानदारी) को दांव पर नहीं लगाया जा सकता है। न्यायपालिका को हर अवसर पर उठना चाहिए।
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